मध्यप्रदेश में कलेक्टर एस पी की वीडियो कान्फ्रेंस में मुख्य सचिव ने कहा कि सीएम बोलते हैं कि कोई भी कलेक्टर बिना पैसे लिए काम ही नहीं करते। सी एस ने सी एम से कहा कि ऐसी बात नहीं है। जो भी ऐसा भ्रष्टाचार कर रहा है, उन्हें हटा दीजिए। सी एस ने बताया कि एक जिले में नामांतरण का केस था। पैसे मांगे जाने की शिकायत थी। जवाब आया कि जांच की गई। ऐसा कुछ नहीं है। शिकायतकर्ता को बता दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं है। उसने खबर भेजी कि एसडीएम पटवारी आए थे और साढ़े सात लाख में लेन देन तय करके गये हैं।
उपरोक्त उद्धरण दैनिक समाचार पत्र से लिया गया है। इसमें लेखक कहता है कि जिस तरह से रक्त हृदय से पंप होकर मस्तिष्क तक जाता है और उसी कारण पूरा शरीर गति करता है उसी प्रकार रिश्वत नीचे से ऊपर की ओर गति करती है। जब रिश्वत नीचे ही संग्रहीत कर ली जाती है तब ऊपर का हिस्सा सुन्न पड़ने लगता है। ऊपर के हिस्से को कार्य संपादन में रूकावट आती है। तब ऊपर से नीचे की ओर कड़ा संदेश भेजा जाता है। तब पूर्व के समान ही रिश्वत नीचे से ऊपर की ओर संचरित होने लगती है। पूरा तंत्र सामान्य गति को प्राप्त हो जाता है। रिश्वत को हमेशा मिल बांट कर खाने का नियम है। जहां भी रिश्वत खाई जाती है वहां से ऊपर वालों को भी देना होता है। यह बंटवारा सहकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। जब ऊपर बैठे स्वच्छ निर्मल व्यक्ति तक नीचे से पैसा नहीं पंहुचता तब वह विकल होकर कह देता है - ’मैं किसी को छोड़ूंगा नहीं’। यही लेखक का संदेश है।
रिश्वत लेना नियम है। रिश्वत न लेना अपवाद है। और रिश्वत लेने से मना करना अनैतिक है। नैतिकता का तकाजा है कि परम्पराओं का पालन किया जाए। जिस काम का जो रेट है उसे हर उपभोक्ता को भुगतान करना चाहिए नहीं तो वो भुक्तभोगी बन जाएगा। हमें समरस समाज बनाना है। देने वाले को देना चाहिए नहीं तो उसे देख लिया जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि सभी तय रेट पर तय व्यक्ति को भुगतान करें। इससे सद्भाव बनता है। शांतिपूर्ण धर्मप्राण समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है।
रिश्वत प्रेम से दी जाती है। घूस गुस्से में दी जाती है। घूस शब्द घूंसे से बना है। रिश्वत में एक विश्वास छुपा है। दे दी है तो काम हो जाएगा। बिलकुल ’तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ वाला पवित्र रिश्ता बन जाता है। रिश्वत लेना हिम्मत का काम है। रिश्वत लेने के लिए शिकार को मुसीबत में डालना पड़ता है। कुछ ही दिनों में शिकारी घूंस लेने के काम में निष्णात, निर्भीक और बेशर्म हो जाता है। वह योगी अवस्था को प्राप्त हो जाता है। सिर घुटाए, तेरहीं निपटा कर पिता की मृत्यु के बाद पेंशन पाने के लिए पंहुचे बालक से या मृतक की विधवा से रिश्वत खसोट लेना इसी योगी अवस्था में संभव हो पाता है।
एक अच्छे सशक्त, एकीकृत संगठित समाज के निर्माण के लिए जरूरी है कि धर्म और जाति का भेदभाव छोड़कर, सभी लोग रिश्वत दें और रिश्वत लें। सवर्ण, पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक में समाज को बांटना नहीं चाहिए। रिश्वत लेना देना अब हमारे खून में घुल गया है। इसे लागत के अलावा होने वाला ऊपर का खर्च माना जाता है। दूल्हे के चुनाव में ऊपर की कमाई देखते हैं। मेहनत की कमाई वाले को बेचारा और मूर्ख माना जाता है। ऊपरी कमाई वाला प्रतिष्ठित, धर्मप्राण और दानदाता होता है। उसके बंगले पर दरबान और कुत्ते होते हैं।
रिश्वत लेने का एक सैद्धांतिक पक्ष भी है। रिश्वत लेने वाले दो तरह के होते हैं। एक कठोर यानी फिक्स रेट। दूसरे मुलायम याने मोल भाव वाले। प्रायः रिश्वतखोर इतने सिद्धांतवादी होते हैं कि अपने बाप को भी नहीं छोड़ते। एक कलेक्टर साहब की कुछ जमीन थी। उनका तबादला हो चुका था। उनने अपने मित्र को उस जमीन के संबंध में कुछ काम करवाने के लिए कहा तो साथ में 500 रू का ड्राफ्ट भी भेजा। उन्हें मालूम था कि पटवारी लोग सिद्धांतवादी होते हैं। उसे देना ही होंगे।
रक्षा सौदे अरबों रूपये के होते हैं। इसमें दलाली हजारों करोड़ की होती है। दलाली दलाल को और रिश्वत खरीदने वाले को दी जाती है। भारत ने फ्रांस से राफेल विमान खरीदे। दलाली खाई गई। ठीक है। मगर रिश्वत भी खाई गई। भारत के सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार को क्लीन चिट मिल गई। मिलना ही थी। कोई रिश्वत नहीं खाई गई। मगर हाय, उधर फ्रांस में राफेल बेचने हेतु भारतीयों को रिश्वत खिलाने के लिए कई लोगों को जेल की सजा हो गई। देने वाले को सजा और पाने वाले को मजा।
भारत के युग पुरूष अडानी जी ने अमेरिका में बॉन्ड बेचकर अमेरिकियों से पैसे जमा किए और उन पैसों से भारत में ठेके लेने के लिए भारतीय अधिकारियों को दी। कितनी रकम ? 2200 करोड़ रूपये। अब अमेरिका में अडानी को सम्मन जारी हो रहे हैं। अडानी के अमेरिका के तिहाड़ जेल जाने की नौबत है। भारत सरकार बचाये पड़ी है। भारत में किन अधिकारियों को ये 2200 करोड़ रूपये की रिश्वत दी गई ? पहचान करना क्या मुश्किल है ? क्या ये छलिये कभी सामने आएंगे ? भारत सरकार ( न खाऊंगा न खाने दूंगा ) की दुविधा देखिये - एक तरफ रिश्वत देने वाले को बचाना है दूसरी तरफ रिश्वत लेने वालों को बचाना है।
आप को कभी नहीं लगेगा कि ये विचारणीय प्रश्न हैं। क्योंकि अभी आप बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली की जीत से खुश हैं। एस आइ आर से खुश हैं। करोड़ों भारतीय मतदाताओं के वोट छीने जाने से खुश हैं। ईडी, सीबीआई के छापों से खुश हैं। बेकसूर लोगों को जेल और उनको जमानत न मिलने से खुश हैं। सोनम वांगचुक को जेल में बेड़े जाने से खुश हैं। बुलडोजर से बेकसूरों के घर गिराये जाने से खुश हैं। निर्भीक निर्णय देने वाले जजों के तबादले से खुश हैं। नए नए भव्य मंदिरों के निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा से गौरवान्वित हैं। आप खुश रहें। आपकी खुशी में ही सत्ता की सलामती है। जय हिन्द।
डोरीलाल रिश्वत प्रेमी
25 01 2026