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Sunday, 24 August 2025

निराधार आधार

कामवाली बाई आज अपने साथ 6 साल के बच्चे को लेकर आई। उससे पूछा क्यों तुम स्कूल क्यों नहीं गये। उसने कहा कि मेरा नाम कट गया है। क्यों कट गया है ? उसकी मां ने बताया कि इसका आधार कार्ड नहीं बना है। इसलिए स्कूल वालों ने कहा है कि स्कूल में नहीं पढ़ सकते। बच्चे से पूछा तुम्हें नाम लिखना आता है। उसने कहा कि नहीं आता। गिनती आती है। नहीं आती। 

डोरीलाल को खुशी है कि सरकार छोटे छोटे बच्चों की पहचान करने में सजग है। पहचान जरूरी है। पढ़ाई तो कभी भी हो सकती है। या न भी होगी तो क्या फर्क पड़ता है। मगर आधार कार्ड जरूरी है। आधार कार्ड होगा तो वो शान से इस देश में रह सकता है। आधार कार्ड के बिना लावारिस बच्चे सड़कों पर घूम रहे हैं। मां बाप के साथ काम पर जा रहे हैं। मगर पढ़ नहीं सकते। ’सासन का आदेस है।’ 

आधार कार्ड, वोटर कार्ड से नागरिकता साबित नहीं होती। नागरिक ही वोटर हो सकता है। जो नागरिक नहीं है वो घुसपैठिया है। जो घुसपैठिया है वो विपक्ष को वोट देता है। जो विपक्ष को वोट देता है उसके वोट की हमें कोई जरूरत नहीं है। विशेष गहन पुनरीक्षण किया ही इसलिए जा रहा है कि जो वोट देने के लिए बहुत मचल रहा है वो साबित करे कि वो वोटर बनने लायक है। यानी वो सरकार को वोट देने को तैयार है या नहीं। ऐसे वोटर का क्या अचार डालें जो सरकार को वोट देने में आनाकानी करता है। उसे अब वोट देने की जरूरत नहीं है।  उसका नाम कट गया है। 

बात बिलकुल सीधी है। यदि आपके पास भारत सरकार द्वारा दिया गया आधार कार्ड है, वोटर आई डी कार्ड है तो आप भारत के नागरिक नहीं हैं। यही आधार कार्ड गैस नंबर, पैन कार्ड, मोबाइल नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस से लिंक है मगर इससे साबित नहीं होता कि तुम भारत में पैदा हुए, तुम्हारे मां बाप भारतीय हैं। तुम भारत में रहते हो। तो इस आधार कार्ड से साबित क्या होता है ? ये वोटर कार्ड दिखाकर पिछले चुनाव तक जो हम वोट डाल रहे थे क्या वो अपराध था? 

  बच्चे का आधार कार्ड नहीं बना तो उसे स्कूल में घुसने नहीं दे रहे। और आधार कार्ड है तो उसके मां बाप को वोट नहीं देने दे रहे। ये हो क्या रहा है ?

सारे संकट की जड़ ये जनता - इसे राइट करना है। पिछले लोकसभा चुनाव में धोखा हो गया। पूरी सैटिंग के बावजूद अबकी बार 400 पार की जगह 240 पर आ गये। लगभग हार गये। इसका कारण है ये जनता। चुनाव के लिए जनता का वोट हासिल करना पड़ता है। यदि ऐसी व्यवस्था हो जाए कि जनता वोट न दे। यदि दे तो हमें ही दे तो फिर हम युगों युगों तक राज करेंगे। इसका सीधा सरल तरीका है कि जनता सरकार की मनपसंद हो। वही उसको वोट देती रहे।

  उच्च वर्ग और मध्य वर्ग की जनता को पूरी तरह साध लिया गया है। वो ताली बजाने और थाली बजाने में उस्ताद हो गई है। जब कहो तब बजाती है। बल्कि बिना कहे भी बजाती रहती है। दिक्कत इन भुखमरों से हो रही है। इनको पांच किलो राशन दो, हर महीने नगद पैसा दो, लाडली बहना का पैसा दो, मकान दो, किसान निधि दो, मनरेगा दो फिर भी वही भूखे के भूखे, पूरे समय काम मांगते हैं। अस्पताल, स्कूल, सड़क मांगते हैं। जेब में दो रूपया नहीं है और कहते हैं कि मंहगाई है। देश के लिए त्याग करने को तैयार ही नहीं। ऐसे तो सीधे साधे मूर्ख बने रहेंगे लेकिन वोट देने का मौका आया तो बादशाह हो जाते हैं। विपक्ष को वोट दे देते हैं। विधर्मी को वोट दे देते हैं। तो इसकी काट तो निकालनी पड़ेगी। 

इनको वोट देने की जरूरत क्या है ? इनको क्या समझता है ? जो हमें वोट नहीं देता वो अब वोटर नहीं रहेगा। ऐसी स्कीम बनाओ कि ये गरीब लोग वोटर न बन पायें। तो ये स्कीम लाई है। फार्म भरो। एक महीने के अंदर भरो। फोटो लगाओ। जन्मप्रमाण पत्र लगाओ। घर का कागज लगाओ। नहीं है तो वैरी सॉरी। गेट आउट। अब तुम वोटर नहीं रहे। ये आधार कार्ड, वोटर कार्ड, मनरेगा कार्ड नहीं चलेगा। एक बोरा चावल में से बीस कंकड़ निकालना है। कंकड़ नहीं बीनेंगे। पूरा एक बोरा चावल बीनेंगे। ये है एस आई आर।

  आज तक नहीं बताया कि भारत में कितने बंगलादेशी और कितने रोहिंग्या हैं ? मंत्रियों के भाषण से ऐसा लगता है कि भारत में उन्हीं का बहुमत है। ये भी नहीं बताते कि सरकार तुम्हारी, सेना तुम्हारी, पुलिस तुम्हारी, फिर वो विदेशी देश में घुसे कैसे ? और घुसे हैं तो पकड़ते क्यों नहीं ? और ये विदेशी विपक्ष को वोट क्यों देंगे ? तुमने उन्हें घुसने दिया, शरण दी तो एहसान वो तुम्हारा मानेंगे कि विपक्ष का? इस पूरी कवायद में एक भी विदेशी रिपोर्ट नहीं हुआ।  

समझ में नहीं आ रहा कि कौन पागल है ? 

बिहार प्रदेश की सरकार और पूरा अमला इस समय बहुत उत्पादक कार्य में व्यस्त है। गरीब, किसान, मजदूर जिनने पिछले चुनावों में वोट दिये हैं वो अगले चुनाव में वोट न दे पायें। ये खतरनाक लोग हैं। ऐसे कानून बनाओ, ऐसी शर्तें लगाओ कि ये गरीब लोग वोट न दे पायें। अब केवल मुकदमे हैं, पेशियां हैं। कानूनी दांव पेंच हैं। न्यायालय में जो बहसें होती हैं और जो निर्णय होते हैं उससे लगता है कि ये सब किसी और ग्रह में हो रहा है। भारत का नागरिक कौन है ? नागरिक ही वोट दे सकता है ? नागरिक होने का प्रमाण क्या है ? ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ये राजा अमीरों के मनमाफिक है। खूब मुनाफा करवा रहा है। इसलिए आज की सत्ता और इस राजा को बरकरार रखना है।   

देश के सारे संस्थान ’आपका आज्ञाकारी सेवक’ बनाए जा चुके हैं। संस्थाएं नतमस्तक हैं। फिर भी इतना डर ? ये डर इसलिए है कि इन गरीबों के पास खोने को कुछ नहीं है। जैसा जीवन ये जीते हैं उससे बुरा हो नहीं सकता। इसलिए इनको डर नहीं लगता। पर जब ये खड़े होते हैं तो महल गिर जाते हैं।

  महलों की दीवारें हिलने लगी हैं। महल गिर जाएंगे।

दुष्यंत ने लिखा है

’फिर धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है’

डोरीलाल गरीब प्रेमी

23 08 2025 



Wednesday, 6 August 2025

वह तोड़ती पत्थर


                

                भारतीय नारी पत्थर तोड़ रही है। निराला ने उसे इलाहाबाद के पथ पर देखा था। वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर। निराला की प्रसिद्ध पंक्ति है। निराला ने ऐसा क्यां कहा था ? सदियों से भारतीय नारी पत्थर तोड़ रही है। उसके सामने पत्थर का विशाल पहाड़ है जिसे भेदना असंभव है। पर वह इस पत्थर को लगातार तोड़ने की कोशिश कर रही है।

              अभी अभी अदिति शर्मा ने इस्तीफा दे दिया। उसने उसी दिन इस्तीफा दे दिया जिस दिन जिला जज राजेश कुमार गुप्ता को पदोन्नत करके मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में जज बनाया गया। ये लोग कौन हैं ? अदिति शर्मा शहडोल में जूनियर सिविल जज हैं/थीं। उनके वरिष्ठ जिला जज राजेश कुमार थे। अदिति शर्मा उन छः महिला जजों में शामिल थीं जिन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। फिर हाईकोर्ट ने चार को बहाल कर दिया पर अदिति और सरिता चौधरी को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट में महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने बर्खास्त महिला जजों को बहाल किया। अदिति शर्मा ने जिला जज राजेश कुमार गुप्ता पर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। उन्होंने लगातार इस दुर्व्यवहार के विरूद्ध लड़ाई लड़ी। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक गुहार लगाई। पर कहीं कभी कोई सुनवाई नहीं हुई। अदिति शर्मा के आरोप गंभीर थे। उनके आरोपों की न जांच हुई न सुनवाई हुई बल्कि राजेश कुमार गुप्ता का नाम हाईकोर्ट जज के लिए कालेजियम को भेजा गया तब भी अदिति शर्मा ने इसका विरोध किया।

                 अपने त्यागपत्र में अदिति शर्मा ने लिखा “मैं इस संस्था को बिना किसी पदक, बिना किसी उत्सव और बिना किसी कड़वाहट के छोड़ रही हूँ - केवल इस कड़वे सच के साथ कि न्यायपालिका ने मुझे निराश किया। लेकिन इससे भी बदतर - यह खुद ही विफल रही। यह त्यागपत्र खात्मा नहीं है। यह विरोध का एक बयान है। इसे अपने संग्रहालय में एक यादगार के रूप में रहने दें कि मध्य प्रदेश में एक महिला न्यायाधीश थीं जिन्होंने न्याय के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था, और उस व्यवस्था ने उसे तोड़ दिया जिसने इसका प्रबल प्रचार किया था,“ उन्होंने लिखा। गुप्ता की पदोन्नति को “न्याय शब्द के साथ एक क्रूर मज़ाक“ बताते हुए, शर्मा ने कहा कि यह कदम “न्यायपालिका की अपनी बेटियों की सुरक्षा करने में विफलता“ को दर्शाता है और महिला अधिकारियों को संकेत देता है कि “सच्चाई की क़ीमत ख़ामोशी से ज़्यादा भारी होती है।“

               महात्मा गांधी कहते थे कि अन्याय का विरोध न करना और उसे माफ कर देना कायरता है। अदिति शर्मा ने कायरता नहीं दिखाई।

               अब जबकि आरोपी जज को प्रमोशन मिला, अदिति ने कहा कि “संस्था को मेरी नहीं, अपनी साख की चिंता करनी चाहिए थी।“ 28 जुलाई के मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए अपने त्यागपत्र में अदिति ने लिखा-“संस्था ने मुझे नहीं, खुद को विफल किया है। “मैं न्याय मांग रही थी, बदला नहीं। लेकिन जब उत्पीड़क को सम्मान मिला, मैं टूट गई। अब न बहाली, न मुआवज़ा और न ही कोई माफी इन जख्मों को भर सकती है।” अदिति ने कहा कि “मैंने निरंतर उत्पीड़न सहा है, न केवल शरीर या मन का, बल्कि मेरी गरिमा, मेरी आवाज़ और एक महिला न्यायाधीश के रूप में मेरे अस्तित्व का, जिसने बोलने का साहस किया।“

              उल्टा, आरोपित जज को हाईकोर्ट में पदोन्नत कर ’सम्मान का मंच’ दे दिया गया। अदिति ने लिखा “उन्हें न्यायमूर्ति कहा जा रहा है, ये उस शब्द के साथ क्रूर मजाक है।“ उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने न बदले की भावना से, न व्यक्तिगत द्वेष से काम लिया, बल्कि संस्थान की गरिमा को बचाने की कोशिश की। लेकिन जब उस संस्थान ने ही उन्हें ठुकरा दिया, तो वह अब ‘एक पीड़ित, एक महिला और एक इंसान’ के तौर पर पद छोड़ रही हैं।

              शर्मा ने चेतावनी दी थी कि गुप्ता की पदोन्नति “कॉलेजियम प्रणाली के ऊपर एक लंबी, काली छाया डालेगी“ और बाकी लोग अपने ताकतवर साहबों के खिलाफ शिकायत करने से बचेंगे। शर्मा ने अंत में लिखा, “इस पत्र को उन फाइलों में जगह दो, उन गलियारों में फुसफुसाने दो जहां ठंडी चुप्पी छाई रहती है। उन्होंने न्यायपालिका से यह देखने को कहा कि वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करती है जो “सच बोलने का साहस करते हैं।“

               अदिति शर्मा अकेली है। उसके साथ कोई खड़ा नहीं है। उसके बावजूद उसने वो हिम्मत दिखाई जो बड़े बड़े महाबली महापुरूष नहीं दिखा सके। अदिति शर्मा ने अपना अस्वीकृति में उठा हाथ उठा दिया। उसके त्यागपत्र ने पूरी प्रणाली को आईना दिखा दिया। अदिति ने चुपचाप इस्तीफा नहीं दिया। उसने सभी को संबोधित खुला खत लिखा। बहुत सोच विचार कर एक एक शब्द चुनकर उन्होंने अपने पत्र को इतना अर्थपूर्ण बना दिया है कि और किसी बात को कहने की जरूरत न रही।

                 सब चुप हैं। डरे हुए हैं। भारतवर्ष को अब इसकी आदत पड़ चुकी है। पुरूष तो किसी पीड़ित महिला का साथ दें न दें महिलाएं भी महिलाओं के सम्मान के लिए खड़ी नहीं होतीं। जब महिला खिलाड़ी लड़ रही थीं तब भी विश्वगुरू भारत वर्ष की महिलाएं और पुरूष उनके साथ नहीं खड़े हुए। जब कठुआ में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था तो महिलाओं का जुलूस बलात्कारियों के लिए निकला था, लड़की के लिए नहीं। बिल्कीस बानो अकेले लड़ी। आज भी लड़ रही है। उसके साथ तीस्ता सीतलवाड अंत तक खड़ी रही। उसकी भरपूर सजा उसे आज तक मिल रही है। बिल्किस बानो केस में समय से पहले रिहा हुए बलात्कारियों, हत्यारों के सार्वजनिक अभिनंदन में महिलाएं भी शामिल होती हैं।

                  अदिति तुम्हें सलाम। तुमने अन्याय सहने से इन्कार किया। तुमने झुकने से इन्कार किया।

सितम की राह पर रखते चलो सरों के चिराग़ 


के जब तक सितम की स्याह रात चले।

डोरीलाल न्याय प्रेमी

04 08 2025 

न्याय का बैडमिन्टन

डोरीलाल जी, बैडमिन्टन के खेल के बारे में कुछ प्रकाश डालिये।             बैडमिन्टन एक खेल है जिसमें एक कोर्ट होता है। एक या दो खिलाड़ी आमने स...