फोटो में कोई बेइमानी नहीं की गई है। समाचार छापने और दिखाने में भी कोई बेइमानी नहीं की गई है। जनरल साहब गये थे। हरेक को हक है चाहे जहां जाए। वो भी गए। दीक्षा लेने गए। पूरी तैयारी से गये। पत्नी के साथ गए। और फुल मिलिट्री ड्रेस में गए। जैसे ऑन ड्यूटी जा रहे हों। तो जनरल साहब गये। एक ज्ञानी ने कहा - अभी उनको रिटायरमेंट में समय है। पहले सेना में सेनाध्यक्ष सबसे बड़ा पद होता था। अब एक और पद का सृजन कर दिया गया है। सी डी एस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। तो हर कोई की चाहत होगी कि जीवन में धरा क्या है। सब नश्वर है। पद तो अमर है। तो क्यों न उसे हासिल कर लिया जाए। यदि ऊपर वाला खुश हो तो फिर सब कुछ हो जाता है। ऊपर वाले को खुश करने के लिए नीचे वाले को खुश करना होगा। खबर जहां पंहुचना थी वहां पंहुच गई कि दीक्षा हो गई है।
तो सार ये है कि जनरल साहब जगदगुरू रामभद्राचार्य जी की पीठ पर गये। उनसे फुल आर्मी ड्रेस में दीक्षा ली। गुरूमंत्र लिया। उनने भी दीक्षा दी। फिर गुरू दक्षिणा की बात आई तो उनने कहा कि मुझे पी ओ के चाहिए। जनरल साहब ने कहा-दिया। डोरीलाल की परेशानी ये है कि जब देने वाला मुक्त हस्त से दे रहा है तो केवल पी ओ के ही क्यों मांगा ? पूरा पाकिस्तान मांग सकते थे। अफगानिस्तान मांग सकते थे। बांगलादेश मांग सकते थे। मांगने को क्या ईरान भी मांग सकते थे। बल्कि ये तो सही मौका था पूरा अखंड भारत मांगा जा सकता था। पिछले दस सालों में जबसे ’आजादी’ आई है तबसे सदियों से चली आ रही समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। हाय, अखंड भारत की समस्या सुलझते सुलझते रह गई। एक जिज्ञासा है डोरीलाल की। जब पी ओ के भारत को मिल जाएगा तो जमीन के साथ उस जमीन पर रहने वाले लोग भी मिलेंगे। उनका क्या करोगे ? पी ओ के में कोई आजादी का आंदोलन तो चल नहीं रहा जहां के लोग भारत का कब्जा होते ही आकर गले मिलने लगेंगे। और वो सब ’वो लोग’ हैं। अभी जितने कश्मीरी हैं वो ही तो सम्हाले नहीं सम्हल रहे फिर और आ गये तो कैसा करेंगे ?
डोरीलाल के मन में एक जिज्ञासा और है। जैसे जनरल साहब ने अपनी आस्था के अनुसार पूरी ड्रेस पहन कर रामभद्राचार्य जी से दीक्षा ली वैसा ही किसी अन्य धर्म का सेनाधिकारी अपने धर्माचार्य के पास जाए तो चलेगा कि नहीं। क्या ये सामान्य बात होगी या बर्दाश्त से बाहर। जनरल साहब के दीक्षा ग्रहण समारोह को बिना किसी चूं चपड़ के भारत की जनता ने स्वीकार किया। क्योंकि मामला अपने लोगों का था।
इस समय जगदगुरू रामभद्राचार्य जी शीर्ष पर हैं। यू ट्यूब पर उनके ज्ञानवर्धक रील चल रहे हैं। इससे बहुत सद्भावना फैल रही है। देश के संस्थानों में होड़ लग गई है कि वो उनके लिए कुछ न कुछ करें। हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर ने पिछले 79 सालों का रिकार्ड तोड़ दिया। ऐसा दावा वहां की यशस्वी कुलगुरू ने किया है। उस विश्वविद्यालय ने किसी को डी लिट नहीं दी थी। लेकिन रामभद्राचार्य जी को डी लिट प्रदान कर विश्वविद्यालय की कुलपति धन्य हो गईं। भारत में ज्ञानपीठ पुरस्कार की बड़ी प्रतिष्ठा रही है। ये साहित्य का नोबल पुरस्कार जैसा था भारत में। ज्ञानपीठ ट्रस्ट ने रामभद्राचार्य जी को सन् 2024 में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया। भारत सरकार ने पद्मविभूषण प्रदान किया ही है।
देश में भक्तिकाल चल रहा है। विश्वविद्यालयों में जबरदस्त गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। कुछ दिन पहले लखनऊ विश्वविद्यालय का चित्र छपा था जहां छात्र, महिला प्रोफेसर कनिष्ठ व वरिष्ठ सभी प्रधानमंत्री मोदी का चित्र रखकर कुछ आरती टाइप का कर रही थीं। कुछ संस्कृत श्लोकों की आवाज भी आ रही थी। फोटो फ्रेम के चारों ओर फूल ही फूल रखे थे। डोरीलाल तो कुछ घबरा गए। अरे ये क्या हुआ। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की कुलपति ने अपने गोबर प्रेम से पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने कक्षाओं की दीवारों पर गोबर पुतवा दिया। गोबर की सुगंध के बीच बैठ छात्र छात्राएं विद्या ग्रहण करने लगे। गोबर दीवार में पोतने से भरी गर्मी में छात्र गण ठंड से ठिठुरने लगे। उनके दिमागों में गोबर छाने लगा। छात्रों ने कुलपति कक्ष में घुसकर उनका एसी निकाल दिया और उनके कक्ष में गोबर ही गोबर कर दिया। शायद यही एनइपी है। न्यू ऐजुकेशन पॉलिसी। आप नहीं समझे होंगे। नई शिक्षा नीति। ज्ञान परंपरा। गोबर जहां तहां है। दीवारों पर, दिमागों पर, संस्थाओं पर, साहब लोगों पर। विज्ञान भगा भगा फिर रहा है। देश में प्रयोगशालाएं सूनी पड़ी हैं। वैज्ञानिक कथा सुन रहे हैं। वेदपाठ कर रहे हैं। यज्ञशालाओं से 24 घंटे दिन रात धुंआ उठ रहा है। प्रयोगशालाएं उदास हैं। ग्रंथालयों में पढ़ने वाले डंडे मार मार कर भगाए जा रहे हैं।
पहले भारत एक कृषि प्रधान देश था। अब भारत एक धर्म प्रधान देश है। चारों ओर धर्म ही धर्म है। धर्माचार्य ही धर्माचार्य। धर्म संसद। धर्म अखाड़ा। तरह तरह के बाबा। तरह तरह के योगाचार्य। तरह तरह के कथा वाचक। तरह तरह के मंदिर। तरह तरह के भगवान। तरह तरह के त्यौहार। जर्मन टेंट में भागवत कथा। लाखों-करोड़ों रूपये के आयोजन। इतने जगद्गुरू, इतने शंकराचार्य, इतने महामंडलेश्वर, इतने मंडलेश्वर, इतनी पीठें, इतने आश्रम, इतने अखाड़े। सब चुनाव प्रचारक और कार्यकर्ता में बदले जा चुके हैं। हर राजनैतिज्ञ को दो-चार बाबा चाहिए। हर बाबा को कुछ राजनैतिज्ञ चाहिए। बड़े राजनीतिज्ञों को बड़े बाबा चाहिए। अंग्रेजी बोलने वाले। साक्षात भगवान के अवतार। ये धर्माचार्य ईश्वर और मनुष्य के बीच की कड़ी हैं। ईश्वर से इनकी रोज बात होती है।
ज्ञान और विज्ञान के सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं। स्कूल बंद, कालेज बंद, पढ़ाई बंद, परीक्षाएं बंद। केवल मोबाइल, व्हाट्सएप और टी वी-इंटरनेट चालू है। देश को भोंदूओं और मूर्खों से लबालब कर दो। इतिहास बदल दो। वर्तमान बदल दो। भविष्य अपने आप गढ्ढे में चला जाएगा।
कर लो जो करना है।
डोरीलाल दीक्षाप्रेमी
27 06 2025