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Monday, 30 June 2025

भक्तिकाल का गोबर

        फोटो में कोई बेइमानी नहीं की गई है। समाचार छापने और दिखाने में भी कोई बेइमानी नहीं की गई है। जनरल साहब गये थे। हरेक को हक है चाहे जहां जाए। वो भी गए। दीक्षा लेने गए। पूरी तैयारी से गये। पत्नी के साथ गए। और फुल मिलिट्री ड्रेस में गए। जैसे ऑन ड्यूटी जा रहे हों। तो जनरल साहब गये। एक ज्ञानी ने कहा - अभी उनको रिटायरमेंट में समय है। पहले सेना में सेनाध्यक्ष सबसे बड़ा पद होता था। अब एक और पद का सृजन कर दिया गया है। सी डी एस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। तो हर कोई की चाहत होगी कि जीवन में धरा क्या है। सब नश्वर है। पद तो अमर है। तो क्यों न उसे हासिल कर लिया जाए। यदि ऊपर वाला खुश हो तो फिर सब कुछ हो जाता है। ऊपर वाले को खुश करने के लिए नीचे वाले को खुश करना होगा। खबर जहां पंहुचना थी वहां पंहुच गई कि दीक्षा हो गई है।  

       तो सार ये है कि जनरल साहब जगदगुरू रामभद्राचार्य जी की पीठ पर गये। उनसे फुल आर्मी ड्रेस में दीक्षा ली। गुरूमंत्र लिया। उनने भी दीक्षा दी। फिर गुरू दक्षिणा की बात आई तो उनने कहा कि मुझे पी ओ के चाहिए। जनरल साहब ने कहा-दिया। डोरीलाल की परेशानी ये है कि जब देने वाला मुक्त हस्त से दे रहा है तो केवल पी ओ के ही क्यों मांगा ? पूरा पाकिस्तान मांग सकते थे। अफगानिस्तान मांग सकते थे। बांगलादेश मांग सकते थे। मांगने को क्या ईरान भी मांग सकते थे।  बल्कि ये तो सही मौका था पूरा अखंड भारत मांगा जा सकता था। पिछले दस सालों में जबसे ’आजादी’ आई है तबसे सदियों से चली आ रही समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। हाय, अखंड भारत की समस्या सुलझते सुलझते रह गई। एक जिज्ञासा है डोरीलाल की। जब पी ओ के भारत को मिल जाएगा तो जमीन के साथ उस जमीन पर रहने वाले लोग भी मिलेंगे। उनका क्या करोगे ? पी ओ के में कोई आजादी का आंदोलन तो चल नहीं रहा जहां के लोग भारत का कब्जा होते ही आकर गले मिलने लगेंगे। और वो सब ’वो लोग’ हैं। अभी जितने कश्मीरी हैं वो ही तो सम्हाले नहीं सम्हल रहे फिर और आ गये तो कैसा करेंगे ? 

           डोरीलाल के मन में एक जिज्ञासा और है। जैसे जनरल साहब ने अपनी आस्था के अनुसार पूरी ड्रेस पहन कर रामभद्राचार्य जी से दीक्षा ली वैसा ही किसी अन्य धर्म का सेनाधिकारी अपने धर्माचार्य के पास जाए तो चलेगा कि नहीं। क्या ये सामान्य बात होगी या बर्दाश्त से बाहर। जनरल साहब के दीक्षा ग्रहण समारोह को बिना किसी चूं चपड़ के भारत की जनता ने स्वीकार किया। क्योंकि मामला अपने लोगों का था। 

             इस समय जगदगुरू रामभद्राचार्य जी शीर्ष पर हैं। यू ट्यूब पर उनके ज्ञानवर्धक रील चल रहे हैं। इससे बहुत सद्भावना फैल रही है। देश के संस्थानों में होड़ लग गई है कि वो उनके लिए कुछ न कुछ करें। हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर ने पिछले 79 सालों का रिकार्ड तोड़ दिया। ऐसा दावा वहां की यशस्वी कुलगुरू ने किया है। उस विश्वविद्यालय ने किसी को डी लिट नहीं दी थी। लेकिन रामभद्राचार्य जी को डी लिट प्रदान कर विश्वविद्यालय की कुलपति धन्य हो गईं। भारत में ज्ञानपीठ पुरस्कार की बड़ी प्रतिष्ठा रही है। ये साहित्य का नोबल पुरस्कार जैसा था भारत में। ज्ञानपीठ ट्रस्ट ने रामभद्राचार्य जी को सन् 2024 में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया। भारत सरकार ने पद्मविभूषण प्रदान किया ही है। 

          देश में भक्तिकाल चल रहा है। विश्वविद्यालयों में जबरदस्त गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। कुछ दिन पहले लखनऊ विश्वविद्यालय का चित्र छपा था जहां छात्र, महिला प्रोफेसर कनिष्ठ व वरिष्ठ सभी प्रधानमंत्री मोदी का चित्र रखकर कुछ आरती टाइप का कर रही थीं। कुछ संस्कृत श्लोकों की आवाज भी आ रही थी। फोटो फ्रेम के चारों ओर फूल ही फूल रखे थे। डोरीलाल तो कुछ घबरा गए। अरे ये क्या हुआ। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की कुलपति ने अपने गोबर प्रेम से पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने कक्षाओं की दीवारों पर गोबर पुतवा दिया। गोबर की सुगंध के बीच बैठ छात्र छात्राएं विद्या ग्रहण करने लगे। गोबर दीवार में पोतने से भरी गर्मी में छात्र गण ठंड से ठिठुरने लगे। उनके दिमागों में गोबर छाने लगा। छात्रों ने कुलपति कक्ष में घुसकर उनका एसी निकाल दिया और उनके कक्ष में गोबर ही गोबर कर दिया। शायद यही एनइपी है। न्यू ऐजुकेशन पॉलिसी। आप नहीं समझे होंगे। नई शिक्षा नीति। ज्ञान परंपरा। गोबर जहां तहां है। दीवारों पर, दिमागों पर, संस्थाओं पर, साहब लोगों पर। विज्ञान भगा भगा फिर रहा है। देश में प्रयोगशालाएं सूनी पड़ी हैं। वैज्ञानिक कथा सुन रहे हैं। वेदपाठ कर रहे हैं। यज्ञशालाओं से 24 घंटे दिन रात धुंआ उठ रहा है। प्रयोगशालाएं उदास हैं। ग्रंथालयों में पढ़ने वाले डंडे मार मार कर भगाए जा रहे हैं।  

               पहले भारत एक कृषि प्रधान देश था। अब भारत एक धर्म प्रधान देश है। चारों ओर धर्म ही धर्म है। धर्माचार्य ही धर्माचार्य। धर्म संसद। धर्म अखाड़ा। तरह तरह के बाबा। तरह तरह के योगाचार्य। तरह तरह के कथा वाचक। तरह तरह के मंदिर। तरह तरह के भगवान। तरह तरह के त्यौहार। जर्मन टेंट में भागवत कथा। लाखों-करोड़ों रूपये के आयोजन। इतने जगद्गुरू, इतने शंकराचार्य, इतने महामंडलेश्वर, इतने मंडलेश्वर, इतनी पीठें, इतने आश्रम, इतने अखाड़े। सब चुनाव प्रचारक और कार्यकर्ता में बदले जा चुके हैं। हर राजनैतिज्ञ को दो-चार बाबा चाहिए। हर बाबा को कुछ राजनैतिज्ञ चाहिए। बड़े राजनीतिज्ञों को बड़े बाबा चाहिए। अंग्रेजी बोलने वाले। साक्षात भगवान के अवतार। ये धर्माचार्य ईश्वर और मनुष्य के बीच की कड़ी हैं। ईश्वर से इनकी रोज बात होती है।  

          ज्ञान और विज्ञान के सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं। स्कूल बंद, कालेज बंद, पढ़ाई बंद, परीक्षाएं बंद। केवल मोबाइल, व्हाट्सएप और टी वी-इंटरनेट चालू है। देश को भोंदूओं और मूर्खों से लबालब कर दो। इतिहास बदल दो। वर्तमान बदल दो। भविष्य अपने आप गढ्ढे में चला जाएगा। 

 कर लो जो करना है। 


डोरीलाल दीक्षाप्रेमी

27 06 2025

Saturday, 21 June 2025

अखबार पढ़ने की कला और कलाबाजी

आज पूरे देश के सारे अखबारों में जस्टिस यशवंत वर्मा की एक ही फोटो के साथ एक ही समाचार प्रकाशित हुआ है। समाचार की ड्राफ्टिंग एक ही व्यक्ति ने की है। हर अखबार ने अपनी न्यूज डेस्क से जारी बताया है। अखबार में प्रथम पेज पर चार कॉलम में प्रकाशित है। एक तरफ विवरण लिखा है। एक तरफ बॉक्स बनाकर गवाहों के बयान लिखे गये हैं। ऐसा क्यों हुआ है? ऐसा इसलिए हुआ है कि आम पाठक अखबार में छपी हर खबर को जस का तस स्वीकार कर लेता है।

अब अखबार पढ़ना एक कला हो गई है। क्योंकि अखबार छापना अब कलाबाजी हो गई है। अब आपको समाचार भर नहीं पढ़ना है समाचार क्यों छापा गया है ये भी पढ़ना है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक तीन जजों की समिति ने जांच रिपोर्ट 4 मई को दे दी थी। ये रिपोर्ट केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के पास थी। फिर आज डेढ़ महीने बाद आज अखबारों में कैसे छप गई ? तीनों में से किसने अखबारों को दी ? आज ही उस रिपोर्ट का खुलासा क्यों किया गया ? डोरीलाल अखबार पढ़ने की कला में थोड़े जानकार हो गए हैं। ज्योंहि आज अखबार में खबर छपी देखी तुरंत समझ में आ गया कि ये खबर क्यों छपी है।

ये खबर इसलिए छपी है कि 17 जून को सुप्रीम कोर्ट के वकील और राज्य सभा के सदस्य कपिल सिब्बल ने एक पत्रकार वार्ता की। उसमें जस्टिस वर्मा के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है उस पर सवाल उठाये। सवाल गंभीर हैं। कपिल सिब्बल ने पूरी घटना पर विस्तार से चर्चा की है परंतु उसका मुख्य स्वर यही है कि केवल शार्ट सर्किट से इतना बड़ा धमाका नहीं हो सकता। फायर ब्रिगेड वालों ने घटना की रिपोर्ट क्यों नहीं की ? यदि नोट मिले थे तो उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं की ? पुलिस आई तो उसने उन नोटों का पंचनामा क्यों नहीं किया ? एफ आई आर क्यों नहीं की ? इलाके की घेराबंदी क्यों नहीं की ? घर वालों को क्यों नहीं बताया कि जहां आग लगी वहां नोट मिले हैं ? विभिन्न चैनलों ने बताया कि पन्द्रह करोड़ रूपये मिले हैं। चार बोरों में भरे थे। पांच सौ के नोट थे। एक भी नोट की जब्ती नहीं है। ये पन्द्रह करोड़ किसने गिने ? ये नोट वहां किसने रखे ? रखे तो आग क्यों लगाई ? अब कहां हैं ? उनकी जब्ती क्यों नहीं की गई ? यदि जस्टिस वर्मा के स्टाफ ने उन्हें रफा दफा कर दिया तो पुलिस ने क्या किया ? एक खोजी चैनल को पूरे 9 दिन बाद जस्टिस वर्मा के घर के बाहर सड़क पर एक जला हुआ नोट मिला। क्या खोज है ?
डोरीलाल का सवाल है-यदि किसी और आदमी के साथ यह घटना घटती तो उस आदमी का क्या हश्र होता ?
जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों से इन्कार किया है। उनका कहना है कि वो एक षडयंत्र का शिकार बनाए गए हैं। उनके पास से कोई नोट नहीं मिला है। उनसे कहा गया कि आप रिटायरमेंट ले लीजिए। उनने कहा कि मैं रिटायरमेंट नहीं लूंगा। मैं इस षडयंत्र के खिलाफ लडूंगा। उनका इलाहाबाद हाईकोर्ट तबादला कर दिया गया। कपिल सिब्बल का कहना है कि जस्टिस वर्मा के सामने मैं अनेक बार खड़ा हुआ हूं। वो एक विद्वान और ईमानदार जज हैं।
कपिल सिब्बल ने कहा कि मंत्री किरण रिजजू कह रहे हैं कि वे विभिन्न दलों के सांसदों से बात कर रहे हैं कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग के बजाय जो तीन जजों की समिति की जांच की जो इनहाउस रिपोर्ट है उसी के आधार पर कार्यवाही की जाए। जस्टिस वर्मा के खिलाफ अब तक कोई महाभियोग की कार्यवाही शुरू नहीं हुई है। जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव के खिलाफ जो महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है उसमें पिछले 6 माह में राज्य सभा सचिवालय 50 सांसदों के हस्ताक्षरों की जांच नहीं कर पाया। इस तरह से वो दिन आ जाएगा जब जस्टिस शेखर यादव अगले साल के शुरू में रिटायर हो जाएंगे। जस्टिस शेखर यादव ने सांप्रदायिक भाषण दिया था। उसकी रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।
कपिल सिब्बल ने कहा है कि ये पूरा मामला न्याय व्यवस्था को लक्ष्य करके उसे बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। लोगों का न्यायाधीशों और न्याय से भरोसा उठ जाए। इसीलिए न्याय व्यवस्था पर लगातार हमले हो रहे हैं। इसका अंतिम उद्देश्य यह है कि जजों की नियुक्ति का अधिकार पूरी तरह से सरकार के हाथ आ जाए और कालेजियम सिस्टम समाप्त कर दिया जाए। जिसके कारण जजों की नियुक्ति में सरकार को पूरा अधिकार नहीं है।
न्याय, न्यायालय और न्यायाधीश पर भरोसा कम होना देश के लिए बहुत घातक है। कानून और न्यायालय ही एक नागरिक को यह विश्वास दिलाते हैं कि यदि वो सही है तो उसके साथ न्याय होगा। उसी के भरोसे वो जन्म जन्मांतर तक मुकदमे लड़ता है। हर भारतीय का जन्म मुकदमा लड़ने के लिए ही हुआ है। जब लड़ते लड़ते अशक्त हो जाता है या पैसा खत्म हो जाता है या मर जाता है तो उसकी अगली पीढ़ी यह जिम्मेदारी निभाती है। मुकदमा लड़ना एक शौक है। एक जुनून है। एक संकल्प है। लगन है। भारतीय आदमी वकील साहब से सलाह लेता है कि उसे मुकदमा लड़ना चाहिए कि नहीं ? उसके बाद उसके अंदर अजस्त्र ऊर्जा का संचार होने लगता है। मुकदमा लड़ने के लिए अस्त्र शस्त्र उठा लेता है। आज मुकदमा दायर कल अपने पक्ष में निर्णय। ये कल कभी नहीं आता। यदि किसी मनुष्य को लगता है कि उसका जीवन निरर्थक है तो वो मुकदमा लड़ने लगता है। उसका जीवन सार्थक हो जाता है। उसके बाद वो मृत्युपर्यंत कर्म ही करता रहता है। रोज शाम को वकील के पास जाता है। दिन में कोर्ट जाता है। वकील साहब को कैंटीन का समोसा खिलाता है।
भारतीय आदमी के मन में ये सवाल उठना बंद हो चुका है कि संसद से सड़क तक, लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जो कुछ हो रहा है क्या वो न्याय है ? तो फिर अन्याय क्या है ?
डोरीलाल मुकदमा प्रेमी
20 06 2025

Wednesday, 11 June 2025

खूब कॉमेडी हो रही है

डोरीलाल जी खूब मजा आ रहा है। खूब कामेडी हो रही है। हमारी जनता को जो पसंद है। वो हो रहा है। नए नए रूपों में कामेडी हो रही है। सबसे अच्छी बात ये है कि जिन पर गंभीर रोल करने की जिम्मेदारी है वो ही कामेडी कर रहे हैं। आखिर इस देश में गंभीर रोल कौन करेगा ? सब कामेडी कर रहे हैं।

फ्रांस ने राफेल बेचे। भारत ने खरीदे। कहा गया कि भारत के दलालों ने दलाली खाई। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की। कहा एकदम झूठ। कोई दलाली नहीं खाई गई। उधर फ्रांस में, भारत को राफेल बेचने के लिए दलाली खिलाने के आरोप में कई लोगों को सजा हो गई। भारत में दलाली खाने वाले आजाद हैं। खूब कामेडी हो रही है। 

अमेरिका में अडाणी पर मुकदमा चल रहा है। अमेरिकन इन्वेस्टर से धोखाधड़ी का आरोप है। भारत के अधिकारियों को अडानी व अन्य ने ठेका लेने के लिए 250 मिलियन डालर घूस खिलाई है। अडाणी कह रहे हैं सब झूठ है। पर अमेरिका में घूस खिलाने पर मुकदमा चल रहा है। भारत में जिन लोगों ने 250 मिलियन डालर की घूस खाई उन पर कोई दाग नहीं है। कोई मुकदमा नहीं। आखिर राष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई है। खूब कामेडी हो रही है। 

भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाया। कहा कि पीओके वापस लेकर रहेंगे। इस बार निपटा देंगे। भारत के न्यूज चैनलों ने पाकिस्तान पर कब्जा कर लिया। फिर अचानक सीज़फायर हो गया। उधर डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की अदालत में हलफनाफा देकर कह रहे हैं कि मैंने दोनों देशों को व्यापार का वास्ता देकर सीज़फायर करवाया। 11 बार कह चुके हैं। भारत कह रहा है कि नहीं पाकिस्तान गिड़गिड़ाया कि हमका माफी दे दो हमसे भूल हो गई तब हमने सीज़ फायर किया। खूब कामेडी हो रही है।   

अब आइये लेटेस्ट कामेडी पर। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव हुए। तीनां जगह विपक्ष को उम्मीद थी कि हम जीतेंगे। मगर ऐसा हारे कि बुरी तरह हारे। अब सवाल ये है कि कैसे हारे ? क्यों हारे ? जीतते जीतते हार कैसे गये ? मध्यप्रदेश का मामला अच्छा रहा। यहां हारने वालों ने कहा कि बेईमानी हुई है मगर हम चुप रहेंगे। महाराष्ट्र हरियाणा में विपक्ष ने काफी रिसर्च कर ली। कहा कि ये सवाल हैं इनके जवाब दो। तो जवाब देने वालों ने कहा कि सबकुछ ईमानदारी से हुआ है। हम जवाब नहीं देंगे। ज्यादा है तो कोर्ट चले जाओ। उनको मालूम है कि कोर्ट में अभी भी कौरव पांडव अपनी फाइलें लिए वकीलों के पीछे घूम रहे हैं। 

तो ताजा मसला ये है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महाराष्ट्र चुनाव को लेकर लोकसभा में प्रश्न उठाया। फिर आम जनता के बीच उठाया। चुनाव आयोग को लिखा। पहले के चुनाव आयुक्त शेरो शायरी कहकर निकल जाते थे। इस बार जो बने हैं उन पर डबल जिम्मेदारी है। उनको पिछले का भी बचाव करना है और अपना भी बचाव करना है। वो शायरी करने लायक ढीठ भी नहीं हैं। वो चुप रहते हैं। उनका पक्ष तय है। उनको जिनने चुना है उनके लिए उन्हें निष्पक्ष रहना है। 

भारत में अखबार अब सरकारी विज्ञप्ति, सरकारी लेख, सरकारी भाषण और सरकारी विज्ञापन छापने के लिए छापे जाते हैं। इसके बाद जो जगह बचती है उसमें सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों की चरण वंदना होती है। संपादक निकाल दिए गए हैं। बिजिनेस मैनेजर अखबार चलाते हैं। अखबार में काम करने वाले लोग अभी भी पत्रकार कहलाते हैं। सैकड़ों टी वी चैनल हैं। चैनलों में तू तू मैं मैं के मैच आयोजित होते हैं। कोई भरोसे लायक नहीं है। जनता परेशान कि असली खबर कहां से मिले ? 

अब असल बात सुनिये। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक लेख लिखा और उसमें महाराष्ट्र चुनाव में धांधली के मुद्दे उठाये। महाराष्ट्र के दो अखबारों में छपे। बाकी न किसी अखबार ने उन मुद्दों के बारे में लिखा और न किसी चैनल पर चर्चा हुई। पूरी तरह ब्लैकआउट। इन मुद्दों पर जवाब देना चाहिए चुनाव आयोग को तो जवाब दिया महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फड़नवीस ने। मगर ये सज्जन तो इस धांधली के लाभार्थी हैं। जवाब तो चुनाव आयोग को देना चाहिए। 

तो कामेडी यहां से शुरू होती है। एक समाचार एजेन्सी है एएनआई। प्राइवेट है पर सरकार के भरोसे की है। इसने चुनाव आयोग का जवाब रिलीज कर दिया। मगर एएनआई ने जो खबर जारी की है वो सूत्रों के हवाले से की है। चुनाव आयोग का यह तथाकथित जवाब एक सादे पन्ने पर बिना पैड, सील सिक्के और दस्तखत के जारी किया गया है। ये जवाब किसके पास है नहीं मालूम। केंचुआ चुप है। उसकी वेबसाइट पर भी यह जवाब नहीं है। इससे भारत में एक नई परंपरा का जन्म हो रहा है। जवाब भी दे दिया। जवाबदारी भी न रही। 

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। सरकार को शक था कि कहीं ऐसा चुनाव आयुक्त न बन जाए जो निष्पक्ष हो तो उसने प्रक्रिया बदल दी। अब दो रैफ्री सरकार के और एक विपक्ष का। वैरी सिम्पल। कोई भेदभाव नहीं। एक और मजेदार बात। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने यह व्यवस्था दी कि एक प्रधानमंत्री रहेंगे, एक मैं खुद रहूंगा और नेता प्रतिपक्ष रहेगा तीनों मिलकर चुनाव आयुक्त चुन लेंगे। तो सरकार ने एक कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश जी को हटा दिया। अपना एक मंत्री रख लिया। उनको बुरा नहीं लगा। उनके सामने अपील की गई। उस पर सुनवाई का टाइम नहीं मिला और वो रिटायर हो गए। अभी भी इस मामले की सुनवाई नहीं हुई है। टाइम कहां है। खूब कामेडी हो रही है। 

तो डोरीलाल जी अब सड़क पर आपको कोई कागज मिल जाए, बच्चे खेलते खेलते आपके पास कागज का राकेट फेंक दें, जिसमें कुछ लिखा हो तो अब उस कागज को अब सीरियसली लेना। ये भारत सरकार की सबसे उच्च कोटी की संवैधानिक संस्था का कोई जवाब हो सकता है जिसे सूत्र उड़ा रहे हों। आप उसे मूत्र समझ कर नकार न देना। भारत के उच्च संवैधानिक मूल्यों का सवाल है। भारत देश संविधान से चलता है। 

डोरीलाल जी बाबा साहब तो संविधान लिख कर चले गये। और यहां संविधान के साथ कामेडी हो रही है। 

भारतवासियां ये कामेडी नहीं है। ये ट्रेजिडी है।

डोरीलाल कामेडी प्रेमी 

        11 06 2025

 

न्याय का बैडमिन्टन

डोरीलाल जी, बैडमिन्टन के खेल के बारे में कुछ प्रकाश डालिये।             बैडमिन्टन एक खेल है जिसमें एक कोर्ट होता है। एक या दो खिलाड़ी आमने स...