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Wednesday, 28 May 2025
दुनिया कैसे चलती है
डोरीलाल से बंदे ने पूछा कि ये दुनिया कैसे चलती है। मैंने कहा - ये प्रश्न है या परीक्षा ? इसका उत्तर देना खतरे से खाली नहीं है। कुछ भी हो सकता है। मान लो मैं कह दूं कि तुम सही सोच रहे हो। दुनिया को वही चलाते हैं जिनकी रगों में वो नहीं बहता जो सेना के जवानों की रगों में बहता है। सिन्दूरररररररररररररररररर
बंदे ने आश्वस्त किया कि आप यदि अपने मन की बात बोलेंगे तो आपके ऊपर कोई एक्शन नहीं होगा। मैंने कहा कि मुझे अब भी तुम्हारे ऊपर शक है, तुम रिपोर्ट कर सकते हो। क्योंकि मेरे पास दिमाग है। मैं सोच सकता हूं। मैं मन की नहीं दिमाग की बात बोलूंगा। मैं सच बोलूंगा। उसने कहा सच बोलने वालों को कोई सत्ता, कोई राजा कभी पसंद नहीं करता। क्योंकि दुनिया सच बोलने वालों के चलाए नहीं चलती।
मैंने झपटकर पूछा जब तुम्हें मालूम है तो फिर तुमने मुझसे क्यों पूछा कि दुनिया कैसे चलती है ? उसने कहा कि जो जिस सवाल का जवाब दे सकता है उसी से पूछा जा सकता है। बात समझो डोरीलाल जी। गली गली में प्रवचन हो रहे हैं। यज्ञ हो रहे हैं। भागवत हो रही है। मंदिरों का निर्माण हो रहा है। नए नए लोकों का निर्माण हो रहा है। हजारों करोड़ रूपये इन पर खर्च हो रहे हैं। शहरों महानगरों में प्रवचन हो रहे हैं। चारों ओर भक्ति का समुद्र ठांठें मार रहा है। दीवाली दशहरे पर लाखों दीपक जलाने का कीर्तिमान बनाया जा रहा है। हर तरफ धर्माचार्यों की चरण वंदना हो रही है और उनके आशीर्वादों, उनके शापों से धरा आप्लावित है। जब इतना कुछ हो रहा है तो मनुष्य सुखी क्यों नहीं है ? इतना अनाचार, अत्याचार भ्रष्टाचार क्यों हो रहा है ? इसलिए मैंने आपसे पूछा कि बताओ डोरीलाल इस दुनिया को कौन चला रहा है ? इतनी सी बात है। एक पीड़ित की जिज्ञासा है।
डोरीलाल ने कहा कि इस दुनिया को काम करने वाले चलाते हैं। दो तरह के लोग हैं - काम करने वाले और काम करवाने वाले। काम करने वाले लगातार काम करते हैं। यदि उन्हें जीवित रहना है तो काम करना ही है। इसलिए छोटे छोटे बच्चे काम करते दिखते हैं। औरतें मर्द काम करते दिखते हैं। और अस्सी साल का बुजुर्ग भी काम करता दिखता है। काम करे बिना पेट नहीं भरेगा। बिना खाये जियेगा कैसे ? तो डोरीलाल के हिसाब से दुनिया चल रही है क्योंकि काम करने वाले काम कर रहे हैं। समझो यात्रियों से भरी एक ट्रेन है। इंजन चालू है। मगर आगे नहीं बढ़ रही है। क्यों ? क्योंकि ड्राइवर नहीं है। यानी काम करने वाला नहीं है। ट्रेन, हवाई जहाज, मोटर गाड़ी, बैंक, दुकान, शो रूम, दफतर, कारखाना, अस्पताल, घर हर किसी को चलाने के लिए काम करने वाला जरूरी होता है।
काम करवाने वाले, काम करने वालों से काम लेते हैं और उनकी मेहनत से कमाई करते हैं। उनका यही काम है। धूमिल की प्रसिद्ध कविता है - एक आदमी/ रोटी बेलता है/एक आदमी रोटी खाता है/ एक तीसरा आदमी भी है/जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है, वो सिर्फ रोटी से खेलता है/मैं पूछता हूं-/ये तीसरा आदमी कौन है,/मेरे देश की संसद मौन है/ तो जो तीसरा आदमी रोटी से खेलता है उसकी ताकत और उसके पैसे के आगे सब झुकते हैं। वही दुनिया चलाते हैं। देश, दुनिया, युद्ध, शांति सुख दुख जीवन मरण सब उनके हाथ में है। वो सर्वशक्तिमान हैं। दुनिया उनसे चलती है।
तो उस बड़े आदमी के पास कितना पैसा होगा ? बड़े भालेपन से उसने पूछा। डोरीलाल ने कहा कि जिनकी बात में कर रहा हूं वो कोई एक आदमी नहीं है। वो एक वर्ग है। उनके पास पैसा नहीं पूरी सत्ता होती है, ताकत होती है। जो तुम पूछ रहे हो न कि दुनिया कैसे चलती है। तो समझो कि दुनिया यही लोग चलाते हैं। काम करने वाले अपनी मेहनत का पूरा पैसा चाहते हैं। और काम लेने वाले कम से कम देकर अपने मुनाफे को बढ़ाना चाहते हैं। सारा झगड़ा यहीं हैं। पैसे वाले चाहते हैं कि इस पृथ्वी पर जो लोग हैं वो उनके लिए मुनाफा कमा कर दें नहीं तो मर जाएं। मेहनत करने वाले अपनी मेहनत का पैसा मांगते हैं। अच्छा जीवन जीने का अधिकार मांगते हैं। तो वो जब तब उठ खड़े होते हैं। लड़ते हैं, हारते हैं। हर हार के बाद वो कुछ आगे बढ़ जाते हैं। ये लड़ाई चलती रहती है। और दुनिया भी चलती रहती है।
आजकल ये लोकतंत्र के राजा हैं। तुम इनकी प्रजा हो। राजा प्रजा के वोट से बनते हैं। प्रजा को भ्रम होता है कि उसने राजा चुना है।
बंदा भड़क गया। मैं आपके पास ज्ञान लेने आया था और आप मुझे ये राजा प्रजा क्या क्या बता रहे हैं? आप मुझे बेवकूफ समझते हैं ? दिन रात खटकर मेहनत करने के बाद हम बस केवल जिन्दा हैं। हमारे हाथ में क्या है बताओ ? हम किसे चुनें ?
डोरीलाल को अच्छा लगा। बहुत दिनों बाद किसी को गुस्सा होते देखा। मैंने कहा ये गुस्सा बनाए रखो। प्रजा पहले अपना दुश्मन तो पहचान ले। तुम भूल जाओ कि राजा तुम चुनते हो, वो तुम्हारा भला करेगा। प्रजा अपना राजा चुने उसके पहले एक और चुनाव होता है जिसमें अमीर लोग एक आदमी चुनते हैं जो प्रजा के लिए राजा बने और उनका मुनाफा बढ़ाये। जो राजा होने का बढ़िया अभिनय करता है, तरह तरह के कपड़े पहनकर दिखाता है, तरह तरह के मेकअप करता है, बढ़िया डायलॉग बोलता है। बोलते बोलते रो पड़ता है। झूठ आत्मविश्वास से बोलता है। अपनी बातों में लोगों को बहा ले जाता है और महाबली होने का भ्रम देता है। ऐसे सिद्ध अभिनेता को मैदान में उतारा जाता है। तुम उसे चुन लेते हो।
अब समझ में आया दुनिया कैसे चलती है ?
डोरीलाल दुनियाप्रेमी
25 05 2025
Thursday, 15 May 2025
राष्ट्रीय संकट और देश सेवा
वो काफी हड़बड़ाया हुआ था। जल्दी में था। उसे तत्काल उसकी समस्या का समाधान चाहिए था। उसने आते ही कहा कि डोरीलाल जी देश संकट में है। युद्ध छिड़ गया है। यही मौका है कि पाकिस्तान का फन कुचल देना चाहिए। कश्मीर पर पूरा कब्जा करने का समय आ गया है। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम लोग पाकिस्तान को मिटा डालेंगे। आतंकवाद को जड़ से खत्म करना है। आप यहां घर में आराम से बैठे हैं। चलिए समय आ गया है कि देश के लिए हम अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दें। उसने कुछ नारे भी लगाए।
मैंने उसे बैठाया। पानी पिलाया। उससे कहा कि बात क्या है ? और तुम मेरे पास ही क्यों आए हो ? उसने कहा कि देश संकट में है ये जानकर मैं सब काम धंधा छोड़ कर देश सेवा में लग गया हूं। मैं लगातार टी वी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूजों पर नजर गड़ाए हुए हूं। लगातार फेसबुक और व्हाट्सएप पर हर पोस्ट दो दो बार पढ़ रहा हूं। मेरा मोबाइल राइफल के समान दनादन पोस्ट मार रहा है। मैंने कहा कि तुम तो देश के लिए काफी काम कर रहे हो फिर तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम कुछ नहीं कर रहे हो। देश के लिए तुम्हें काम धंधा बंद करने की जरूरत नहीं है। तुम देश और धंधा दोनों एक साथ सम्हाल सकते हो। सब लोग यही कर रहे हैं। तुम चारों ओर देखो किसी ने कोई काम बंद नहीं किया है। सब लोग अपनी नौकरी, अपना धंधा कर रहे हैं। वो सब अपने मोबाइल पर लगातार आन लाइन हैं। मोबाइल बार बार डिसचार्ज होता है। वो बार बार चार्ज करते हैं।
उसे संतोष नहीं हुआ। उसने कहा कि मैं पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहता हूं। मैं पाकिस्तान का नाम दुनिया के नक्शे से मिटा दूंगा। मैं पाकिस्तान को मिट्टी में मिला दूंगा। जो भारत की तरफ आंख उठाकर देखेगा उसकी आंखें फोड़ दूंगा। मैंने उससे कहा कि इसके लिए भारतीय फौज है।
मैंने कहा अब समय बदल गया है। लड़ाई का तरीका बदल गया है। अब तुम अपने मोबाइल से फेसबुक और व्हाट्स एप पर विस्फोटक जहरीली पोस्ट लगा करके भी पाकिस्तान को नष्ट कर सकते हो। पाकिस्तान को नष्ट करने तुम इतनी दूर कहां जाओगे ? तुम ऐसा करो कि देश के अंदर दुश्मन बनाओ और उन्हें खत्म कर दो। खत्म करने के लिए तुम्हें कोई फौजदारी एक्शन नहीं लेना है। वो तुम कर भी नहीं सकते। तुम विशेषज्ञ वरिष्ठ लोगों का मार्गदर्शन प्राप्त करो। उनका लेखन देखो। कैसे दुश्मन की पहचान की जाती है, कैसे उसे धमकाया जाता है। कैसे उसका नामकरण किया जाता है।
वो बोला कि अब मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है। मैंने कहा कि हर लड़ाई की कुछ शब्दावली होती है। उसे सीखो। वैसे तुम इतने भोले नहीं हो। जितने भोले दिखने की कोशिश कर रहे हो। तुम राष्ट्रभक्ति की मिडिल क्लास तक तो पढ़ चुके हो। हायर सेकेन्डरी में हो। तो जो लोग इस विषय में बी. ए., एम. ए. कर चुके हैं उनकी पोस्ट पढ़ो। कई पी एच डी भी हैं। उनसे सीखो। आई टी सैल से रेडीमेड माल 24 घंटे सप्लाई किया जाता है। तुम्हें भी 24 घंटे जुटकर ये माल जन जन तक पंहुचाना है। ये काम तुम्हें तुरंत करना होगा क्योंकि महाभारत का युद्ध भी 18 दिन ही चला था। ये युद्ध आखिर कितने दिन चलेगा।
अब तुम्हें इतना करना है कि अपने परिचितों, दोस्तों में तुम्हें उन लोगों की खोज करना है जो शांति, प्रेम, सभी धर्मों में सदभाव की बात करते हैं। जो कहते हैं कि युद्ध बुरा है। जब तक जरूरी न हो युद्ध नहीं होना चाहिए। उसमें सेना के लोग और निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। बस इन लोगों को पहचानो और इन्हें देशद्रोही, पाकिस्तान परस्त, स्लीपर सैल वगैरह बोलना शुरू कर दो। तुम्हारा स्तर यदि ऊंचा हो जाए तो तुम इन लोगों को लिबरल्स कह सकते हो। वामपंथी कह सकते हो। ये भी एक गाली है। इसका मतलब तुम्हें समझ नहीं आएगा। मगर तुम बोल सकते हो। इससे तुम अनपढ़ भी न लगोगे।
उसने पूछा कि क्या मैं अमेरिका चीन रूस और भारत के पड़ोसी देशों को गाली दे सकता हूं। ये लोग कोई भारत का साथ नहीं दे रहे हैं। मैंने समझाया कि देखो गाली देने में संकोच मत करो। किसी को भी गाली दो पर दो। यह युद्ध का समय है। जी भर के गाली दो। अमेरिका चीन को गाली देकर तुम उनका क्या बिगाड़ लोगे ? उनको हमारी सरकार गाली नहीं दे रही है। तुम तो अपने दोस्तों, मुहल्ले पड़ोस के लोगों में दुश्मनों को ढूंढो और उन्हें गाली दो। सोशल मीडिया नाम का ये बिजूका बनाया ही इसलिए है कि सब कोई गाली बकें। अभी तुमने देखा तुम्हारे वरिष्ठ और अनुभवी लोगों ने शहीदों की विधवाओं को गालियां दीं। भारत के विदेश सचिव को ही नहीं उसकी लड़की को भी गालियां दीं। ये प्रतिभा बहुत अनुभव और साधना से विकसित होती है। गाली बक बक कर हम दुश्मन को खत्म कर सकते हैं।
कभी बुद्धि जाग जाए, कभी मन में सवाल उठने लगें, कभी मन में सत्य, अहिंसा, सर्व धर्म सद्भाव के भाव मन में आने लगें तो क्रूरता से उन्हें कुचल देना। कभी लगे कि हम सब एक हैं, हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई, तो तुरंत सावधान हो जाना। ये बहुत हानिकारक विचार हैं। जो तुम्हें सिखाया गया है घृणा, घृणा और घृणा वही हमेशा दोहराते रहो। घृणा की चरम अवस्था को प्राप्त करना तुम्हारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। प्रेम से घृणा करो। घृणा से प्रेम करो।
इस युद्ध का नशा अभी कुछ दिन रहेगा। फिर ज्योंहि यह नशा उतरने लगेगा, फिर से कुछ किया जाएगा। हमें किसी को सोने नहीं देना है। हमेशा जागते रहो। हमेशा घृणा करते रहो। प्राचीनकाल में जाओ, मध्यकाल में जाओ, आधुनिक काल में जाओ मगर वर्तमान काल में न आओ। तभी 110 रूपये लीटर का पेट्रोल खरीद पाओगे। तभी अपने टैक्स से बने सरकारी एयरपोर्ट पर अडानी एयरपोर्ट्स नाम देखकर गर्व से फूल सकोगे।
डोरीलाल घृणा प्रेमी
12 05 2025
सत्यान्वेषी
डोरीलाल को सत्यान्वेषी जी मिल गये। जहां तहां से कपड़े फटे हुए थे। खून से लथपथ थे। पूछा ये आपको क्या हुआ ? आप क्या करते हैं ? उन्होंने कहा कि मैं सत्य का अन्वेषण करता हूं। इसीलिए पिटाई हुई है। डोरीलाल से रहा न गया। क्यों भाई आप सत्य की खोज क्यों करते हैं ? जब सत्य की खोज करने पर पिट चुके हो तो जब सत्य को पा लोगे तब तो जिन्दा न बचोगे। जब पूरी दुनिया झूठ से इतनी खुश है। झूम झूम कर नाच नाच कर झूठ का उत्सव मना रही है तो आप काहे सत्य के पीछे पड़े हैं। अभी भी देर नहीं हुई है। सच की खोज छोड़ो झूठ का दामन पकड़ो, पद प्रतिष्ठा मान सम्मान सब मिल जाएगा।
सत्यान्वेषी जी ने कहा डोरीलाल जी झूठ के कारण ही सत्य की खोज करना होती है। जब तक सत्य कपड़े लत्ते पहन कर तैयार होता है तब तक झूठ सूटबूट पहनकर पूरी दुनिया का चक्कर लगा आता है। झूठ आग की तरह फैलता है। पर आसानी से पकड़ में आ जाता है। झूठ के साथ हजारों लोग खड़े मिलेंगे मगर सत्य अकेला होता है। टैगोर भुक्तभोगी थे कहते थे, सचाई की राह में अकेले ही चलो। कोई साथ न देगा।
डोरीलाल को इतना ज्ञान एक साथ मिलने लगा तो मन मचलने लगा, पूछा सत्यान्वेषी जी ये तो बताइये जिस सत्य की खोज आप कर रहे हैं वो मिल भी गया तो हम कैसे मानेंगे कि वही सच है। सत्यान्वेषी जी प्रसन्न हुए। बोले - सत्य पर शंका करना ही सत्य की सही समझ है। झूठ को जस का तस स्वीकार कर लिया जाता है। सत्य पर हमेशा प्रश्नचिन्ह रहता है। विज्ञान हमेशा इसके लिए तैयार रहता है। डार्विन के सि़द्धांत के आने के पहले मानव विकास की समझ अलग थी। अब अलग है।
वैज्ञानिक नोअल हरारी ने कहा है- सत्य बहुत मंहगा होता है। दिमाग, समय, पैसा खर्च करना होता है। सत्य की खोज बहुत कठिन है। झूठ बहुत सस्ता है। आसानी से मिल जाता है। उठाईये कागज कलम और लिख डालिये एक मनोहर कहानी। झूठ कल्पना से रचा जाता है। इसलिए झूठ सुलभ और सत्य दुर्लभ है।
झूठ बहुत लोकप्रिय होता है। सत्य बहुत अप्रिय होता है। कड़वा होता है। झूठ आसानी से मान लिया जाता है। झूठ के किले के अंदर राजा सुरक्षित रहता है। दंगे फसाद झूठी अफवाह फैलाने भर से हो जाते हैं। झूठ के साथ बड़ी भीड़ होती है। इसे बस छू कहने की जरूरत है। आदमी में मूर्ख बनने की सहज प्रवृत्ति है। आप सब लोगों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकते हैं। आप कुछ लोगों को हमेशा के लिए मूर्ख बना सकते हैं। मगर आप सभी लोगों को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते।
सत्यान्वेषी पहले सबूत ढूंढता है। तब किसी निष्कर्ष पर पंहुचता है। वो तैयार रहता है कि उसका निष्कर्ष उसकी मान्यता से विपरीत हो। मूर्ख पहले निष्कर्ष निकालता है और उसके बाद अपने निष्कर्ष को सिद्ध करने के लिए सबूत ढूंढता है। गैलीलियो को सजा इसलिए मिली क्योंकि उसने कहा कि धरती गोल है और सूर्य का चक्कर लगाती है। उसे कोई सपना नहीं आया था। उसके प्रयोगों और अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला था। मगर चर्च ने कहा कि तुम्हारे निष्कर्ष गलत हैं। धर्म विरूद्ध हैं। उसे सजा देने का निर्णय भी बहुमत से लिया गया। (चार सौ साल बाद इटली के चर्च ने गैलीलियो से माफी मांगी तुम सही थे हम गलत थे।)
जब माता सीता का साधु वेशधारी ने अपहरण किया तो प्रभु ने पवनपुत्र से कहा कि सत्य का पता लगाओ। उसके साधु वेश पर मत जाओ। साधु वेश में डाकू, चोर, लुटेरा, बदमाश कोई भी हो सकता है। सीधा सादा आदमी साधु वेशधारी को देखते ही चरणों में गिर जाता है। इसीलिए कुटिल चालाक लोग साधु वेश में घूम घूम कर भिक्षा मांगते हैं। सीता कहां है, किस हाल में है, रावण की सेना कैसी है? और रावण की शक्ति का रहस्य क्या है ? पवनपुत्र ने लंका जाकर माता सीता का पता लगाया। इसीलिए साधु वेश में जो भी हो उसे उसकी वाणी, कर्मों और ज्ञान से परखो। फिर साधु मानो।
अच्छे कामों का, सच्चे कामों का खूब विरोध हुआ है। महात्मा फुले और सावित्री बाई फुले ने जब सन् 1848 में बच्चियों को पढ़ाने के लिए स्कूल प्रारंभ किया तो उनपर गोबर, पत्थर और कीचड़ फेंका जाता था। पर वो लड़े और अमर हो गए। उन्होंने अपना सत्य नहीं छोड़ा। ज्योतिबा फुले ने जो संस्था बनाई थी उसका नाम था सत्यशोधक समाज - सत्य का शोधन।
जब सुकरात पर मुकदमा चला तो बहुमत से फैसला हुआ कि सुकरात को जहर देकर मार दिया जाए। जब गैलीलियो को जेल भेजा गया तो फैसला बहुमत से हुआ। जब ईसा अपना सलीब ढ़ो रहे थे तब वो भी अकेले थे और शैतानी लोग चारों ओर थे। इसीलिए जब किसी के साथ भीड़ दिखे, बहुमत दिखे तो ये न समझना कि झूठ जीत गया। सच हार गया। सुकरात, ईसा, गैलीलिया इन सबको को मारने वालों को कोई नहीं पहचानता न याद करता। अपनी सचाई के कारण तीन हजार साल बाद भी सुकरात, ईसा ही याद किये जाते हैं।
सत्य की राह में चलने वाला एक आदमी हमारे समय में भी हुआ है। उस आदमी ने अपने आपको सत्य की प्रयोगशाला बना दिया। उसने जीवन भर ’सत्य के प्रयोग’ किए। इस प्रयोगशाला को गोली मारकर खत्म कर दिया गया। शरीर की हत्या हो गई पर सत्य मरा नहीं। सत्य मरता नहीं।
डोरीलाल सच्चाई प्रेमी
05 05 2025
डोरीलाल का पुनर्जन्म
डोरीलाल के विचारों से प्रभावित होकर भक्तजनों ने जलभुनकर पूछा कि आप पिछले जन्म में क्या थे ? मैंने उन्हें बताया कि कल ही मुझे पिछले जन्म के बारे में याद आया, मैं पिछले जन्म में जंगलों में रहता था और मैं एक पशु था। जंगल में तरह तरह के पशु पक्षी कीड़े मकोड़े आदि सभी प्रकार के जीव थे। जंगल में शेर, भालू, हाथी, नीलगाय, बायसन, हिरन, सियार, लकड़बघ्घे, लोमड़ी, कुत्ता, जंगली कुत्ता, सुअर, जंगली सुअर, खरगोश, बंदर और बाज, गिद्ध, चील, कौव्वे, तोते, मोर जैसे तरह तरह के उड़ने वाली पक्षी थे। पशु पक्षी कोई काम नहीं करते। ये दिन भर अपने खाने का जुगाड़ करते हैं और पानी पीते हैं। ये कोई व्यापार नहीं करते, नौकरी नहीं करते, टैक्स नहीं देते, बंगले नहीं बनाते, कपड़े नहीं पहनते। जंगल में पैदल चलते हैं, दौड़ते हैं। कोई जानवर किसी दूसरे की भाषा नहीं जानता। इसलिए वो न कोई भाषण देता है न सुनता है। उनके पास कोई मनोरंजन का साधन नहीं होता न किसी मनोरंजन की उन्हें जरूरत होती है। इन लोगों के बीच कोई झगड़ा नहीं होता। जो जिसका भोजन है उसको मारकर खा जाता है। किसी के पास कोई संपत्ति नहीं है। कोई पोलिस थाना नहीं है। कोई रिपोर्ट नहीं होती। कोई अदालत नहीं है। कोई जज वकील नहीं है। इसीलिए सभी सुखी हैं।
यहां सबकी अपनी अपनी जाति है। कोई किसी की जाति नहीं पूछता। सबका धर्म एक है जियो और जीने दो। कोई बिना भूख लगे किसी को मारता नहीं है। यहां कोई भी किसी का मटन खा सकता है। किसी भी तरह से खा सकता है। झटके से खा सकता है। धीरे धीरे रेत रेत के खा सकता है। यहां जंगल का राजा एक है। वो भी अपने खाने का जुगाड़ करता है। खाता है और सोता है। गुफा में रहता है। उसका कोई मंत्रिमंडल नहीं है। अकेले पूरी सरकार चलाता है। वो किसी से बात नहीं करता। कोई उससे बात नहीं करता। वो अपनी ताकत के दम पर राजा है। जब इकठ्ठे हो जाते हैं तो जंगली कुत्ते भी उसे दौड़ा दौड़ा कर मारते हैं। समय समय की बात है। राजा को नहीं मालूम की वो राजा है। प्रजा को भी नहीं मालूम की वो प्रजा है। कोई चुनाव नहीं होता। कोई चुनौती नहीं है। सब लोग सुखपूर्वक रहते हैं।
पशुओं, पक्षियों और कीड़े मकोड़ों में एक बात अच्छी है कि वो कोई बुरा काम नहीं करते। वो जन्म लेते हैं। जब तक जीवन चलता है जीते हैं फिर मर जाते हैं या मार दिए जाते हैं। मरने के बाद उन्हें सीधे मनुष्य योनि में भेज दिया जाता है। डोरीलाल को यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि ये सजा है या मुक्ति । जंगल में कोई शेर चीता गधा ऐसा नहीं है जो बताए कि अच्छे कर्म करो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। बुरे काम करोगे तो नर्क मिलेगा। स्वर्ग नरक का कोई चक्कर नहीं है। जैसा कि शास्त्रों में लिखा है कि पशु योनि के बाद मनुष्य योनि की टर्न आती है इसलिए मैं इस जन्म में मनुष्य हूं।
डोरीलाल अभी इस धरा पर मनुष्य रूप में विद्यमान हैं परंतु चिंता उन्हें अगले जन्म की सता रही है। कोई इस जन्म में सुखपूर्वक जीने की बात ही नहीं करता। जब तक पशु थे तब तक अगले जन्म की चिन्ता नहीं थी। मालूम था मनुष्य के रूप में जन्म लेंगे। जबसे मनुष्य योनि में आया हूं देख रहा हूं सब डरे हुए हैं कि अगले जन्म में क्या होगा ? मोक्ष मिलेगा कि नहीं ? स्वर्ग जाएंगे कि नरक। मैंने देखा कि मेरे साथ जंगल में जो कई सियार, लोमड़ियां थे वे इस जन्म में यहां मनुष्यों को स्वर्ग नर्क का आंखों देखा हाल बता रहे हैं। कई बता रहे हैं कि हमारे फार्मूले पर काम करो। मोक्ष मिल जाएगा। इस जनम में दुख सहोगे तो अगले जनम में सुख से रहोगे।
सियारों की तो इस योनि में बन आई है। पिछले जन्म के मेरे साथ के खरगोशों, कीडे़ मकोड़ों, कुत्ते बिल्लियों को इस जन्म में मनुष्य बनाया गया है लेकिन वो दिन रात मेहनत करते हैं और पिछली योनि वाला जीवन ही जीते हैं। पिछले जनम के सियार बड़े बड़े पंडाल लगाकर उन्हें प्रवचन देते हैं कि तुम्हें केवल कर्म करना है। फल की चिन्ता नहीं करना है। जैसे तुम कर्म करोगे वैसे ही तुम्हें फल मिलेगा। अच्छे कर्म करोगे तो तुम स्वर्ग में जाओगे। स्वर्ग मतलब काम नहीं करना, अप्सराओं के साथ मजे करना और पेल के खाना, मदिरा पीना और सोना। यानि इस जनम में जो तुम्हारे लिए सपना है वो स्वर्ग में तुम्हें मिल जाएगा। ये सियार कभी स्वर्ग नहीं जाएंगे क्योंकि इनका स्वर्ग यहीं है।
डोरीलाल को पिछले जन्म के बहुत से लकड़बघ्घे और भेड़िये दिखाई पड़ते हैं। कोई अफसर है तो कोई पुलिस में है तो कोई नेता हो गया है कोई वकील हो गया है तो कोई जज तो कोई ठेकेदार कोई सप्लायर। ये लोग सब हिलमिल कर रहते हैं। इनमें आपस में कोई झगड़ा नहीं है। ये इस योनि में भी छोटे मोटे लोगों को मार कर खाने से नहीं चूकते। इस योनि में इन्हें एक नई आदत लग गई है। ये पैसा खाते हैं। आपस में एक दूसरे को नहीं खाते। अच्छी बात है। पूरा शहर यही चलाते हैं।
डोरीलाल पूरे शहर में ढूंढ रहा था। जंगल में इतने शेर मरे ? गये कहां ? एक दिन देखा कि एक बारात जा रही है। एक भूतपूर्व सियार बघ्घी में बैठा हुआ है। सामने बैंड बज रहा था। देखा तो सारे शेर सूट बूट पहने, चश्मा लगाए, तरह तरह की दाढ़ी में संवरे हुए सियार की बारात में बैंड बजा रहे थे। देखा सारे भूतपूर्व लकड़बघ्घे, भेड़िये, गिद्ध, बाज, चील कौव्वे सूट बूट पहने, कुर्ता पाजामा पहने, बारात में चले जा रहे हैं। गलों में अलग अलग रंग के गमछे डले हैं। एक दूसरे के गले में हाथ डाले समूह नृत्य चल रहा है। सियारों, लोमड़ियों, भेड़ियां, लकड़बघ्घों का डांस चल रहा है। सीटियां बज रही हैं। हवा में फायर हो रहे हैं। आतिशबाजी हो रही है। अप्सराएं नाच रही हैं। जूते सैंडिलें थिरक रही हैं। पैरों के नीचे चीटियां, तितली, चिड़ियां, खरगोश, गिलहरी कुचले जा रहे हैं। पिछले जन्म के मेरे साथ के खरगोश, कीडे़ मकोडे़, कुत्ते बिल्लियां बिजली के लट्टू लिए बारात में रोशनी बिखेर रहे हैं।
नाच चल रहा है।
डोरीलाल पुनर्जन्म प्रेमी
28 04 2025
छोटे छोटे क्लाड ईथरली
डोरीलाल ने भक्त से पूछा क्लाड ईथरली का नाम सुना है। ’ये कौन है ? उसका स्वाभाविक प्रश्न था। मैंने कहा ये मुक्तिबोध की कहानी का शीर्षक है। ’ये मुक्तिबोध कौन है ? उसका दूसरा स्वाभाविक प्रश्न था। डोरीलाल ने कहा कि मुक्तिबोध एक कहानीकार थे। और क्लाड ईथरली वो अमेरिकन आदमी था जिसने हिरोशिमा पर अणु बम गिराया था। जब उसे पता चला कि उसके बम गिराने से कितने लोग मारे गये और कैसा विनाश हुआ है तो वो अपराध बोध से पागल हो गया और उसने आत्महत्या कर ली। ’हमें कोई फरक नहीं पड़ता हम तो भाले की नोक पर टांग कर घूमते हैं। ये कौन मुक्तिबोध है उसको हम नहीं जानते। बल्कि हम किसी लिखने पढ़ने वाले को नहीं जानते। हम किसी को नहीं पढ़ते और किसी को कुछ नहीं समझते। पढ़ना लिखना और भाईचारा निभाना हमें मना है। हमें साहित्य और बुद्धि से घृणा है। क्योंकि हमारे यहां कोई साहित्यकार नहीं है। कोई बुद्धिजीवी नहीं है। इसीलिए हम लेखकों बुद्धिजीवियों का मजाक उड़ाते हैं। एक बात बताओ तुमने क्लाड ईथरली का नाम क्यां लिया ? वो तो मर गया।
डोरीलाल ने बात को समाप्त किया। इनके मुंह लगे और अभी तक पिटे नहीं यही बहुत है। हुआ ये कि डोरीलाल ने अभी बहुत से बुलडोजर चालकों को इंटरव्यू पढ़े। भारत में आजकल गरीबों के घर बुलडोजर चलाने के लिए भारी उत्साह है। बुलडोजर के पास दिमाग नहीं है। पर चलाने वाले के पास तो है। तो देश के अलग अलग शहरों के बुलडोजर ड्राइवरों के पास पत्रकार पंहुच गए। वो हिन्दू भी थे। मुसलमान भी थे। उनसे पूछा गया कि बुलडोजर चलाकर लोगों के घर गिराने पर तुम्हें कैसा लगता है ?
ड्राइवरों ने ये बताया कि वो रात भर सो नहीं पाते। औरतों, बच्चों की चीखें उन्हें सोने नहीं देतीं। उन्हें लगता है कि दस - पन्द्रह हजार रूपयों की इस कच्ची नौकरी के लिए वो कितने लोगों की हाय ले रहे हैं जबकि वो नहीं चाहते कि किसी भी गरीब का घर गिराया जाए। जिन घरों को वो लोग गिराते हैं वैसे ही मकानों में वे खुद रहते हैं। एक ने बताया कि एक घर को गिराने जब वो पंहुचा तो वहां बच्चे पढ़ रहे थे खाना बन रहा था उन लोगों को घर का सामान निकालने का मौका नहीं मिला और 15 मिनिट में उनका घर गिरा दिया गया।
वो गरीब पूछते हैं कि अपना पेट काटकर हमने ये झोपड़ी बनाई है। आखिर हम कहीं तो रहेंगे ? हमारा जुर्म क्या है ? हमारे बुलडोजर के आगे पीछे औरतें छाती पीट पीट कर रोती हैं। बच्चे सिसकते हैं ? बुजुर्ग आंसू भरी आंखों से हमें देखते हैं ? उनकी आंखें हमसे पूछती हैं क्या हम इसी देश के वासी नहीं हैं ? हमारे साथ पुलिस होती है वो इन लोगों की पिटाई करती है। जब ये सब होता है तो इन गरीबों के साथ कोई नहीं होता।
घर गिराने का आदेश देने वाले अधिकारी दूर खड़े रहते हैं। सारी गालियां हम खाते हैं। सारा पाप हम झेलते हैं। हमें बताया जाता है कि ये घर अवैध हैं। ये घर अपराधी का है। पर सजा तो अपराधी के घर वालों और आस पड़ोस के लोगों को दी जा रही है। आदमी की जगह घर को सजा क्यों दी जा रही है। हमसे ऐसे घर गिरवाये गये जिनको गिराने से कोर्ट ने मना किया था। हमसे पूजा स्थल गिरवाये जाते हैं। ऐसा तो अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं होता था। लोग चीखते रहते हैं, पिटते रहते हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। हमें समझ नहीं आता कि हम जैसे इन सब गरीबों के घर गिराकर हम किस नर्क में जाएंगे ? कितनी बद्दुआएं मिलेंगी।
अच्छे पक्के घरों और पॉश कालोनी में रहने वालों में ही नहीं बहुत से छोटे मोटे गरीब लोगों में भी खुशी की लहर दौड़ जाती है जब उन्हें पता चलता है कि ’उन’ लोगों के घर गिरा दिए गए हैं। जैसे कुत्ता हड्डी चबाते चबाते अपने ही खून के स्वाद से खुश हो जाता है। हम अपने ही देशवासियों के दुख से खुशी पा लेते हैं। इसीलिए ऐसी सरकारों के मुखिया हीरो बन जाते हैं। श्रेय लेने की होड़ मच जाती है। हिन्दु कट्टर हिन्दू हो जाता है। मुस्लिम अधिक मुस्लिम हो जाता है। ऐसा तीखा बंटवारा दिमागों का कर दिया गया है कि ये फसल पचासों साल तक काटी जाती रहेगी। इसलिए 50 साल तक सत्ता में रहने का दावा है। सही है। यही योजना है।
जिन यहूदियों को जर्मनी में केवल यहूदी होने के कारण अकथनीय यातनाएं दी गईं। लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में डालकर मार डाला गया। आज वही यहूदी फिलिस्तीनियों को मार रहे हैं। उन्हें आसमान से बम बरसा करके मारा जा रहा है, पूरी फिलिस्तीनी नस्ल खत्म की जा रही है और दुनिया में फिलिस्तीनियों की तरफ से बोलने वाले अपराधी माने जा रहे हैं। जहर पूरी दुनिया में रग रग में फैल गया है। एक फिलिस्तीनी लड़की ने एक मार्मिक अपील जारी की है दुनिया के नाम। उसने कहा है कि कुछ दिनां बाद आप लोगों को हमें मरते हुए देखना नहीं पड़ेगा क्योंकि हम पूरे फिलिस्तीनी खत्म हो चुके होंगे।
अपने देशों में युद्ध से परेशान लोग भागते हैं सीमा पर लगे कटींले तारों के बीच से गोलियों की बौछारों के बीच। नावों में समुद्र की उछलती लहरों के बीच। जहां कहीं नाव किनारे लग जाए वहीं उतर जाते हैं और शरणार्थी कहलाते हैं। याद है आपको उस छोटे से मरे बच्चे की तस्वीर जो ऐसी ही किसी नाव से उछलकर लहरों में लहराता किनारे आ लगा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे समुद्र किनारे कोई गुड्डा (खिलौना) पड़ा हो।
धर्म जाति देश के नाम पर दिमागों में उन्माद ठूंस ठूंस कर भर दिया गया है। जो इस उन्माद में शामिल नहीं होंगे, मारे जायेंगे। शामिल होने पर भी बचने की कोई गारंटी नहीं है। आइये, चुप रहकर अपने विनाश के दिन की प्रतीक्षा करते हैं।
डोरीलाल मनुष्यताप्रेमी
21 04 2025
आचार्य डोलानंद
आचार्य डोलानंद
जबसे भारत के वाणिज्य मंत्री का भाषण सुना है मन भारत के स्टार्ट अप के लिए कुछ कर गुजरने को मचल रहा है। डोरीलाल परेशान है क्या कर डालें ? आखिर राष्ट्र का प्रश्न है। डोरीलाल ने तय किया है कि हम अपना स्टार्ट अप शुरू करेंगे। इसी बीच एक और खबर आई जिससे डोरीलाल का उत्साह और बढ़ गया।
एक भारतीय स्वामी हैं नित्यानंद। उन पर आरोप लगे बलात्कार और यौन शोषण के। वो तत्काल देश से भाग गये। उनको कोई पकड़ भी नहीं रहा। उन्होंने अपना एक स्वतंत्र देश स्थापित कर लिया। कैलासा। तो धर्म और आध्यात्म में इतना स्कोप है। इसके पहले रजनीश भी अमेरिका में अपना शहर बसा चुके हैं। नित्यानंद के लोग बोलिविया पंहुच गए और वहां की 3 जनजातियों से लगभग 5 लाख एकड़ जमीन की एक हजार साल की लीज़ का एग्रीमेंट कर लिया। एक हजार साल की फेंकने वाले केवल भारत में ही नहीं हैं और भी हैं।
बोलिविया की सरकार हिल गई है। भारत के स्वामियों का ऐसा प्रताप है। मगर ये तो कुछ भी नहीं। नित्यानंद ने दुनिया भर के पूंजीपतियों को बताया कि मुझमें वो शक्ति है कि आप अगले जन्म में कहां रहेंगे मैं जान सकता हूं। इसलिए अब मरते समय आप अपना सारी धन संपत्ति मुझे दे जाओ। मेरे इंटर लाइफ ट्रस्ट में रख दो। मरने के बाद तुम्हारे दूसरे जन्म की लोकेशन पता करके तुम्हारी सारी जमा की गई धन संपत्ति तुम्हें वापस दे दी जाएगी। तुम इस जन्म में भी अमीर और अगले जन्म में भी अमीर। हर जन्म में अमीर। इतना बड़ा काम किस देश का कौन स्वामी कर सकता है बताइये ? डोरीलाल को पूरा भरोसा है कि पूरी दुनिया के पूंजीपति नित्यानंद के ट्रस्ट में पैसा जमा करायेंगे बल्कि करा चुके होंगे। कोई बताएगा थोड़े ही। न्यूजपेपर में तो एलन मस्क का नाम भी लिखा है।
दुनिया में सारा खेला ही पिछले जन्म, इस जन्म और अगले जन्म के बीच आने जाने का है। भारत में लाखों प्रवचनकार कथावाचक स्वर्ग और नरक का आंखों देखा हाल बता रहे हैं और सुनने वाले चरणों में लोट रहे हैं। तो नित्यानंद ने एक कदम आगे बढ़कर एक स्टार्टअप चालू कर लिया। आदमी का सबसे बड़ा दुख क्या है ? यही कि मरने के बाद सारी कमाई यहीं रह जाती है। साथ नहीं जाती। ऐसे लोगों को नित्यानंद ने सुनहरा मौका दे दिया है।
इससे पहले कि स्मार्ट सिटी टाइप स्टार्ट अप योजना बंद हो जाए मैं अपना प्रोजेक्ट लांच कर रहा हूं। अब मुझे आचार्य डोलानंद के नाम से जाना जाएगा। डोरी का डो और लाल का ला लेकर डोलानंद बन गया है। स्वामी शब्द विवादित है इसीलिये आचार्य डोलानंद ठीक रहेगा। भारत में अमेरिका से एक सज्जन आए थे डोलांड। उनसे भी यह मिलता है। कॉस्ट्यूम क्या होगी ? सफेद चोगा, रंगीन धोती बहुत कॉमन है। बिना कपड़े के रहने का प्रस्ताव भी मैंने लज्जावश अस्वीकार कर दिया। कपड़ा ऐसा होना चाहिए जिससे आनंदातिरेक में नृत्य करने में दिक्कत न आए। एक विचित्र टोपी पहनने का भी जिक्र प्रोजेक्ट में है परंतु हर तरह की टोपियां - बंदर टोपी, देवानंद टोपी, जोकर टोपी पूर्व के बाबाओं और आचार्यों ने पहन ली हैं। देखते हैं क्या फाइनल होता है।
एक अंग्रेजी टीचर नियुक्त कर दिया गया है। जो मुझे आध्यात्मिक विषयों पर फर्राटेदार अंग्रेजी में बोलना सिखायेगा। एक व्यक्ति को रखा है जो गीता, रामायण, महाभारत, वेदों और उपनिषदों के कुछ श्लोक, कुछ कहानियां और कुछ उद्धरण रटा देगा। इतने में श्रोता मूर्ख बन जाता है। एक डांस टीचर भी रखा है जो कैट वॉक के स्टैप्स सिखाएगा। दाढ़ी और बाल बढ़ाना तुरंत शुरू कर दिया है। कुछ मंहगे फोटोग्राफरों के साथ समुद्र किनारे, जंगलों में, शेरों और बाघां से खेलते हुए, जल प्रपात के सामने हाथ फैलाए हुए, गांव के गरीबों पर दया करते हुए फोटो खींचे जाएंगे और जनता के बीच प्रसारित कर दिए जाएंगे। कुछ वीडियो और रील्स भी बन रहे हैं।
मेरा सबसे बड़ा प्रोडक्ट है ध्यान और योग। कुछ अनुभवी योग शिक्षक योग ध्यान का एक कैप्सूल प्रोग्राम बनाकर देंगे जिस पर आचार्य डोलानंद का छापा होगा। एक भव्य आश्रम बनाया जा रहा है। नदी, पहाड़ भी है। उस पर भगवान की भव्य मूर्ति स्थापित होगी। उसकी ऊंचाई इतनी होगी कि सुनीता विलियम्स कहे कि अंतरिक्ष से उसे आचार्य डोलानंद जी का आश्रम और मूर्ति दिखाई दे रही थी। आश्रम में फाइव स्टार सुविधाएं रहेंगी। आश्रम में ही आयुर्वेद और वैदिक उपचार होगा। दवाएं, मसाले, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री आदि आश्रम में बनाई जाएगी और दुनिया भर में मार्केट की जाएगी। एक आफिस बना दिया गया है जिसमें एम बी ए, और सी ए, लोग दिन रात काम कर रहे हैं। इवेंट मैनेजमेंट के बेस्ट ब्रेन लगा दिए गए हैं।
अच्छे गायकों और वादकों और गीतकारों को बुक कर लिया गया है। नर्तकों को अलग से बुक किया है। ये आचार्य जी के ऊपर लिखे गीतों और भजनों को फ्यूजन शैली में प्रस्तुत करेंगे। एक ए डी बैंड (आ डो) भी बन रहा है।
शहर से बहुत दूर एक गांव में एक घर को संरक्षित करवा दिया है। उसी गांव के एक स्कूल को तैयार करवा दिया है । यहां भक्त गण जाएंगे और देखेंगे कि आचार्य जी किस कमरे में पैदा हुए और किस कुंए में नहाए, कहां प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। कुछ बुजुर्गों को तैयार कर दिया गया है आचार्य जी के साथ के संस्मरण सुनाने के लिए।
फिल्म सितारों, राजनीतिज्ञों, नेताओं और कार्पोरेट जगत में प्रचार चालू है। स्थानीय व्यापारी संघों और सामाजिक संस्थाओं से बात चल रही है। वहां से थोक में शिष्य बन जाएंगे। कार्पोरेट्स से बात हो गई। सी एस आर से लंबी रकम मिल जाएगी। एडजस्टमेंट है। जितना मिलेगा उसका आधा वापस करना होगा।
भक्त तैयार करने और प्रचार प्रसार के लिए पेड कार्यकर्ता और स्वयंसेवक पूरे इलाके में फैल गये हैं। आचार्य जी के चमत्कार और योग के बारे में बतायेंगे। उन्हें पकड़ पकड़ कर सत्संग में लायेंगे। विदेशी भक्तों का इंतजाम किया जा रहा है। एक बार चेन बन जाती है फिर सब अपने आप होने लगता है।
डोरीलाल अब आचार्य डोलानंद हैं। बड़ा स्टार्ट अप प्रोजेक्ट है। काफी कठिनाईयां आ रही हैं। पर जब सब ऐसे वैसे चल रहे हैं। तो डोलानंद भी चलेंगे। दिल्ली में बात हो गई है। वो लोग बड़े साफ दिल के लोग हैं। उनने कहा है तुम हमारा काम करोगे तो हम तुम्हारा काम करेंगे। नहीं करोगे तो हम तुम्हारा काम तमाम कर देंगे। जय डोल।
डोरीलाल आश्रम प्रेमी
08 04 2025
डोरीलाल की पुणे यात्रा
डोरीलाल राजकीय यात्रा पर पुणे पंहुचे। स्टेशन पर उनका भव्य स्वागत उनके सुयोग्य पुत्र ने किया। स्टेशन पर रैड कार्पेट बिछा हुआ था परंतु अत्यंत भीड़ के कारण दिखाई नहीं पड़ रहा था। स्टेशन पर तिल धरने को जगह नहीं थी। पुणे के लिए साधारण रेलगाड़ी नहीं है। स्पेशल ट्रेन हैं। सप्ताह में एक बार चलती है। इनमें किराया दुगना है। ट्रेन के डिब्बे पर लिखा था मरता क्या न करता। डोरीलाल के सौभाग्य से ट्रेन 5 घंटे लेट पंहुची। वैसे ये आठ दस घंटे लेट आती है।
राजकीय आवास पंहुचने के बाद डोरीलाल जी ने विश्राम किया। संध्या समय डोरीलाल जी ने राजकीय अतिथि के रूप में पुणे के राष्ट्राध्यक्ष से शिष्टाचार भेंट की। उनके समक्ष लोकनृत्य पेश किए गए। पुणे के कनिष्ठ अधिकारियों से जबलपुर के कनिष्ठ अधिकारियों ने द्विपक्षीय समझौतों पर चर्चा की। उन लोगों ने सुस्वादु भोजन किया और उन्हें जबलपुर आने का न्यौता दिया। चर्चा के दौरान पाया गया कि पुणे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। इस पर उन्हें गर्व है। जबलपुर को संस्कारधानी कहा जाता है। इस पर हमें गर्व है। हमें इस बात पर भी गर्व है कि जबलपुर के पचासों हजार लोग पुणे में रहते हैं परंतु पुणे जबलपुर के बीच न ट्रेन है न हवाई जहाज। हमें भी गर्व है कि सरकार के पास कोई हवाई जहाज और हवाई अड्डा नहीं है मगर कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री हैं। सरकार का निजी कंपनियां पर, हवाई किराये पर, यहां तक कि हवाई अड्डे के चाय बेचने वाले और कार टैक्सी स्टैंड वाले पर भी कोई नियंत्रण नहीं है मगर मंत्री गण हैं और उनका राजपाट है।
दोनों शहरों के प्रतिनिधियों ने आपसी चर्चा में पाया कि दोनों के बीच व्यापार की अच्छी संभावनाएं हैं। पुणे की ओर से वड़ा पाव, मिसल पाव, भेल, थालीपीट, भाकरी लाडू आदि के निर्यात का प्रस्ताव दिया गया। जबलपुर की ओर से खोवे की जलेबी, बंगाली मिठाई, समोसे, आलूबंडे, प्याज कचौरी, मुंगौड़े का प्रस्ताव दिया गया जिसे माना गया। बिरयानी, मटन और चिकिन के व्यंजनों पर भी चर्चा हुई जिससे चर्चाकारों के मुंह में पानी आ गया मगर इस बात पर सहमति हुई कि आयात निर्यात खूब हो पर इसे गुप्त रखा जाए जैसे भारत बीफ निर्यात का सिरमौर है पर चुप्पी रखी जाती है।
जबलपुर के प्रतिनिधि ने बताया कि हमारे यहां अस्त्र शस्त्र निर्माण का गृह उद्योग है। उसे हम विकसित करना चाहते हैं। हमारे यहां अच्छे किस्म के कट्टे, रामपुरी चाकू, बका, तलवार, और सुअरमार बमों का निर्यात संभव है। पुणे के प्रतिनिधियों ने कहा कि हमारे यहां भी तलवार, भाले, बरछी, त्रिशूल तमंचे का निर्माण आदिकाल से होता रहा है। दोनों ओर के प्रतिनिधियों ने इस क्षेत्र में सहयोग पर बहुत बल दिया।
प्रतिनिधियों ने युवकों के रोजगार पर चर्चा की। हमारे प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि जबलपुर में जिन्हें वास्तव में पढ़ना लिखना है वे दूसरे शहरों और खास तौर पर पूना चले जाते हैं। बाकी बचे लोग गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, नर्मदा जयंती, कांवड़ यात्रा, वैष्णोदेवी यात्रा, कुंभ, महाकुंभ, अर्धकुंभ, सिंहस्थ इत्यादि में व्यस्त रहते हैं। इस बीच पंचायत, नगरनिगम, विधानसभा लोकसभा चुनाव भी युवाओं को व्यस्त रखते हैं। कुछ नौजवान नेताओं के साथ उनकी फारचुनर में बैठने के काम आते हैं। ये भविष्य में ठेकेदार, रंगदार और नेता बनते हैं। जुआं सट्टा तो परंपरागत खेल हैं मगर आजकल आई पी एल सट्टा आदि अनेक नए खेल आ गए हैं इसलिए समय किसी के पास नहीं है। पुणे के प्रतिनिधियों ने सहमति व्यक्त की और कहा कि संस्कृति में पूरा भारत एक है हमारे यहां गणेशोत्सव, छत्रपति शिवाजी जयंती और चुनाव आदि में युवा व्यस्त रहते हैं। जिनके पास शर्म हया है, वे मेहनत मजूरी करके, छोटे छोटे व्यापार करके जीवन यापन करते हैं।
पुणे के प्रतिनिधियों ने कहा कि आपके यहां जो भवन पुल निर्माण हो उसके नामकरण में महाराष्ट्र के वीर पुरूषों का ध्यान रखा जाए क्योंकि जबलपुर पर काफी सालों तक मराठों का शासन रहा है। जबलपुर के प्रतिनिधियों ने कहा कि जैसे आपके यहां हर सड़क, पुल, भवन पर एक ही नाम है उसी तरह जबलपुर में हर निर्माण का नाम रानी दुर्गावती के नाम पर रखा जाता है। हम सौ सौ करोड़ की मूर्ति और स्मारक बना सकते हैं पर शिक्षा मंदिर, आरोग्य मंदिर, गं्रथालय और पुस्तकालय नहीं बना सकते। सिविल कंस्ट्रक्शन का काम हमारी मजबूरी है। कमाई उसी में है।
डोरीलाल ने यात्रा प्रारंभ होने से पहले ही पुणे के राजप्रमुख को बता दिया था कि डोरीलाल जहां जाते हैं वहां उनको वहां का सर्वोच्च सम्मान दिया जाना पहली शर्त है। तभी व्यापार समझौता होता है। नहीं तो काय का व्यापार और काहे की यात्रा। पूना के आलीशान होटल में डोरीलाल को पूना का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया। जिसे डोरीलाल ने विनम्रता से स्वीकार किया। दोनों शहरों के कुछ चुनिंदा नुमाइंदों ने भोज इत्यादि किया। इस अवसर पर छंटे हुए कवियों ने काव्यपाठ किया।
अंत में दोनों शहरों के बीच करोड़ों रूपये के व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर की पुस्तिका तैयार हो गईं। डोरीलाल और पुणे के राजप्रमुख आकर बैठ गये। कैमरे की ओर देखते हुए दोनों पक्षों ने व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। चार पांच लोगों की भीड़ ने जमकर करतल ध्वनि की। इसके बाद प्रेस से मिलिये कार्यक्रम के लिए दोनों राजप्रमुख आगे बढ़े मगर डोरीलाल धीरे से कट लिए। मुंह सूख जाता है। कुछ का कुछ पूछ लेते हैं ये बाहर के पत्रकार।
यह पहला अवसर था कि जब सत्तर सालों में पहली बार जबलपुर के डोरीलाल जी ने स्पेशल ट्रेन से पूना की राजकीय यात्रा की। इसके पहले किसी ने यह पराक्रम भरा काम करने की हिम्मत नहीं दिखाई। बाहर खड़ी जबलपुर वासियों की भीड़ एक लय में चिल्ला रही थी डोरी डोरी डोरी डोरी।
डोरीलाल पुणे प्रेमी
31 03 2025
बहिर्गमन
डोरीलाल की मुलाकात एक प्रतिभाशाली छात्र से हुई। वो विदेश में जाकर विद्या ग्रहण करना चाहता था। डोरीलाल इस तरह के ब्रेनड्रेन के सख्त खिलाफ हैं। डोरीलाल ने उसे बहुत समझाया।
डोरीलाल - भारत विद्वानों का देश है। हमारे देश में ज्ञान की लंबी परंपरा है। फिर तुम विद्याध्ययन के लिए विदेश क्यां जाना चाहते हो ?
छात्र - आपको मालूम नहीं है हर साल भारत वर्ष से लाखों छात्र विदेशों में पढ़ने जा रहे हैं। हम इस परंपरा से ही तो परेशान हैं। परंपरा का हम क्या अचार डालें। हम तो वर्तमान में पढ़ रहे हैं। मैं तो अमेरिका जाऊंगा। वहां परंपरा तो नहीं है पर ज्ञान है।
डोरीलाल - देखो, हमारे शास्त्रां में सब कुछ लिखा है। हमारी ज्ञान परंपरा बहुत महान है। तुम उस ज्ञान से हवाई जहाज भी बना सकते हो। मेक इन इंडिया तो तुम जानते ही हो।
छात्र - पर डोरीलाल जी, हमारे विश्वविद्यालय में, हमारे कालेजों में न प्रोफेसर हैं न लेक्चरर, हमारे यहां अतिथि शिक्षक हैं। वे भी बैठे से बेगार भली के फार्मूले पर पढ़ा रहे हैं। आप तो ये बताओ कि लाखों की तनखाह वाले प्रोफेसर की जगह 5-10 हजार रूपये में कोई क्यों पढ़ायेगा और क्या पढ़ायेगा ?
डोरीलाल-देखो हर वर्ष केन्द्र और राज्य सरकारें हजारों करोड़ रूपये शिक्षा पर खर्च कर रही है। इससे नए नए भवन बन रहे हैं। उपकरण खरीदे जा रहे हैं। हर कालेज यूनीवर्सिटी में बड़े बड़े स्वागत द्वार बनाए जा रहे हैं। हर कालेज में विशालकाय मूर्तियां लगाई जा रही हैं। स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष हर कालेज यूनिवर्सिटी में सेमिनार आयोजित होते हैं जिसमें देश भर की विद्वान आकर पेपर पढ़ते हैं और एकदूसरे की तारीफ करते हैं। अब कालेज यूनीवर्सिटी में सत्यनारायण की कथा, यज्ञ वगैरह के आयोजन हो रहे हैं। पंडे पुजारी विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में मंचासीन होते हैं। सेमीनार के शुरूआत और अंत में कलश यात्रा निकाली जाती है। इससे शिक्षा का वातावरण निर्माण होता है। सब शिक्षा को उन्नत बनाने के लिए किया जा रहा है। जब उचित समय आएगा तब शिक्षक भी भरती किए जाएंगे। अभी से वेतन पर व्यर्थ खर्च करना उचित नहीं है।
छात्र-आप हमारा मुंह न खुलवाओ। पढ़ाने के लिए शिक्षक चाहिए कि भवन ? आपने इस बार का केन्द्र सरकार का यशस्वी बजट नहीं बांचा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रिसर्च सबका बजट हजारों करोड़ रूपये कम कर दिया गया है। यूजीसी का बजट 4600 करोड़ था अब 2300 करोड़ हो गया है। यूनिवर्सिटी को कहा गया है कि अपने खर्चों के लिए पैसों का जुगाड़ खुद करो।
डोरीलाल-तुम फिर उत्तेजित हो गए। देखो विश्वगुरू बनने की दिशा में हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। देखो अभी तक विश्वविद्यालय में वाइस चांसलर हुआ करता था। ये अंग्रेजों की परंपरा थी। ये हमने बंद कर दिया है। अब वो कुलगुरू कहलाते हैं। जब कुलगुरू होगा तो भारत को विश्वगुरू बनने से कोई रोक सकता है ?
छात्र- कहीं कुलगुरू पर महिला से छेड़छाड़ की जांच चल रही है कहीं कुलगुरू टर्मिनेट किए जा रहे हैं। क्या बात करते हो डोरीलाल जी। आप लोगों के जमाने में वाइस चांसलर की पोस्ट का कितना सम्मान होता था। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से शहर गौरवान्वित होता था। छात्र अपने प्रोफेसर का नाम गर्व से लेते थे और कहते थे कि हम उनके छात्र रहे हैं। शहर में सभा समारोहों में उन्हें अतिथि बनाते थे। उनके व्याख्यान होते थे।
डोरीलाल-देखो प्रोफेसर और छात्रा के संबंधों के किस्से शिक्षा जगत को बदनाम करने के लिए फैलाए जाते हैं। ये सहज मानवीय वृत्ति है। शोध कार्य के दौरान ऐसा हो जाता है। शोध भटक जाती है। जैसे तुम मुद्दे से भटक रहे हो।
छात्र-चलिए मुद्दे पर आते हैं। अंधाधुंध फीस वसूली की जाती है। पढ़ाई होती नहीं। परीक्षा होती नहीं। परीक्षा होती है तो रिजल्ट नहीं आता। भारत में नौजवान केवल कांवड़ यात्रा के लायक बचे हैं। तो वही करते हैं। इंजीनियरिंग कालेजों में इंजीनियरों का अतिउत्पादन हो गया। मेडिकल कालेजों की फीस करोड़ों में पंहुच गई है। केवल अमीर लोग अच्छी शिक्षा पायेंगे। अब हर सक्षम आदमी अपने बच्चों को विदेश में पढ़ने भेज रहा है। गरीब और गरीब के बच्चे काम करने के लिए बने हैं तो करेंगे। उनकी किस्मत।
विदेशों में न जाने कितनी यूनीवर्सिटी हैं। वास्तव में वो भी दुकानें हैं। वो भारत जैसे देशों से छात्रों को भरती करती हैं। स्कॉलरशिप भी देती हैं। ये शिक्षा का बिजनेस मॉडल है। बहुतों को तो वहीं नौकरी मिल जाती है। बाकी भारत में गरीबों के लिए ज्ञान परंपरा, नई शिक्षा नीति, कुंभ, बाबर, टीपू सुल्तान, औरंगजेब, लव जिहाद, अयोध्या, मथुरा, काशी, हिन्दु मुसलमान जैसे मुद्दे हैं ही जिनके भरोसे भूखे पेट रहकर भी जीवन जिया जा सकता है।
डोरीलाल - तुम बहुत कड़वा बोलते हो। यदि तुम इसी तरह बोलते रहे तो तुम अंदर हो जाओगे। आलरेडी बहुतेरे अंदर हैं। जमानत तक नहीं मिलती। तुम्हें निकलवाने के लिए कोई वकील खड़ा नहीं होगा क्योंकि इस देश का सबसे मंहगा वकील अभी अदालत में एक छात्र की डिग्री न दिखाने के दिल्ली विश्वविद्यालय के निर्णय के बचाव में तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। दुनिया भर में संस्थान गर्व से बताते हैं कि अमुक हमारे विश्वविद्यालय का छात्र था। ये रही उसकी डिग्री। मगर विश्वगुरू के यहां उल्टी गंगा बह रही है। छात्र भी छुपा रहा है और विश्वविद्यालय भी छुपा रहा है। हम डिग्री नहीं दिखाएंगे। भैया तुम तो जाओ विदेश में ही पढ़ो। जब डिग्री मिल जाए तो शान से सबको दिखाना। छुपाना नहीं।
डोरीलाल डिग्रीप्रेमी
10 03 2025
भगतसिंह अपनी कुर्बानी भूल जाओ
भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल सभी बैठे थे। आसमान से नीचे की ओर देख रहे थे। 23 मार्च का दिन था। सामने सारे अखबार पड़े हुए थे। टी वी चालू था। उसमें से जोर जोर से आवाजें आ रहीं थीं। सभी क्रांतिकारी बार बार अखबार पलट रहे थे। कहीं किसी ने याद किया हो। किसी अखबार में तो हो, चैनलों में भी कहीं नहीं था। डोरीलाल ने उनसे पूछा कि आप लोग कुछ परेशान से दिख रहे हैं, बात क्या है ? भगतसिंह बोले हम लोग याद कर रहे हैं कि हमारी शहादत के समय तो ये कहा जाता था
’शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’
आज तो लगता है कि कोई याद नहीं करता।
डोरीलाल ने उन्हें बताया कि आप जिस धरती नाम के उपग्रह की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे हैं वहां अब कोई उम्मीद नहीं करना चाहिए। आप लोगों के समय जिन देशों में थोड़ा बहुत लोकतंत्र था वो दूसरे देशों पर राज कर रहे थे। जैसे तैसे देश आजाद हुए तो लोकतंत्र का पौधा लहलहाया और अब आज हर देश में सत्तर पचहत्तर साल होते होते लोकतंत्र दम तोड़ रहा है। धरती पर लोकतंत्र आखिरी सांसें गिन रहा है। हर देश का नेता अमृत पी चुका है। रूस के पुतिन ने सन् 1936 तक के लिए अपने राजा होने का ऐलान कर दिया है। आपके देश भारतवर्ष में 1947 तक की व्यवस्था हो चुकी है। अमेरिका में जो राजा बना है उसका पता ही नहीं चल रहा कि वो कब समझेगा कि वो प्रेसीडेंट है गली का गुंडा नहीं। यूरोप में सरकारें ही बदल रही हैं वो तय ही नहीं कर पा रहीं कि जाना किधर है।
भाई डोरीलाल जी आप तो बड़ी इंटरनेशनल बातें कर रहे हो। सीधे मुद्दे पर आओ न। अपने भारत की बात करो।
आप लोग इतने प्रखर दिमाग के हो इसलिए क्रांतिकारी बने और फिर शहीद हुए। डोरीलाल की चोरी आपने पकड़ ली। बात ये है कि जब आपको डर लगे तो आप इंटरनेशनल बातें करो। नहीं तो कबीर तुलसी की बातें करो। भक्तिकाल में चले जाओ। पर मुद्दे की बात न करो। आप लोग अंग्रेजों से लड़ते थे। वो सीधे फांसी पर चढ़ा देते थे या गोली मार देते थे। तब भी आप विरोध करते थे। अब आज नया जमाना है। अब कोई झंझट में नहीं पड़ता। हर कोई चुप है। आप के समय में छोटे छोटे अखबार निकलते थे। उन्हें बंद करवा दिया जाता था। फिर नए अखबार निकलते थे मगर लड़ते रहते थे। जेल जाते थे। कालापानी भोगते थे। फांसी चढ़ जाते थे। मगर आज हालात बदल गये हैं। आज अखबार समाचारों के लिए नहीं निकाले जाते। अब देश आजाद है तो सब गुलाम हो गए हैं। आज 23 मार्च को किसी अखबार में तुम्हें शिद्दत से याद नहीं किया जाएगा। कुछ दीवाने लोग अभी भी हैं जो तुम्हारी मूर्ति पर फूल चढ़ायेंगे, जुलूस निकालेंगे, सभा करेंगे। बाकी अब देश में इवेन्ट मैनेजरों का राज है। कोई आश्चर्य नहीं की तुम्हारी शहादत के दिन महाआरती होने लगे। और उसमें लाखों लोग शामिल होकर भजन गायें।
’’पर भाई अब तो देश आजाद है। हम लोगों ने, गांधी, नेहरू, पटैल, मौलाना आजाद सबने मिलकर ये आजादी हासिल की है। इसे बचा कर रखना चाहिए। इतना बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन हुआ था तब देश आजाद हुआ है।’’
दिक्कत ये है जो लोग इतने बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं थे, जो आजादी के विरोधी थे, जो अंग्रेजों के साथ थे वो अब आजादी के 75 साल में बहुत ताकतवर हो गए हैं। आजादी के आंदोलन के नायक नेहरू को रोज बेइज्जत किया जाता है। गांधी पर रोज हमले हो रहे हैं। आजादी की लड़ाई को सब भूल जाएं इसलिए आज आजाद भारत में औरंगजेब पर बात होती है। ये देश आज औरंगजेब की कब्र पर लड़ रहा है। जो सत्ता में हैं, जिनके ऊपर हर नागरिक और हर संपत्ति की रक्षा करने की जिम्मेदारी है वो युद्ध की भाषा बोल रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में गली चौराहों के जैसी लड़ाई चल रही है।
हम लगातार पीछे की ओर बढे़ जा रहे हैं। सम्राट अशोक, चन्द्रगुप्त, पुष्यमित्र शुंग, हर्ष के राज का आंखों देखा हाल बताने वाले इतिहासकार गली गली घूम रहे हैं। कहीं देश के लोगों को अपना खाली पेट और खाली हाथ याद न आ जाएं इसलिए उन्हें दिन रात धर्म के नशे में रखा जा रहा है। हम आजादी और आजादी की लड़ाई को भूल जाएं, गांधी नेहरू को भूल जाएं इसके लिए संसद में प्रधान सेवक 1857 की क्रांति और दांडी मार्च की बराबरी महाकुंभ से करते हैं और ये देश सुनता है। कोई कुछ नहीं बोलता क्योंकि सब चाहते हैं भगतसिंह पड़ोसी के घर में पैदा हो। 1857 की लड़ाई में हिन्दु मुसलमान एक होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े और मारे गए। लड़ाई के बाद लाखों भारतीय अंग्रेजों ने मार डाले, गांव के गांव खत्म कर दिए गए। 1857 से सीधे डांडी मार्च पर आ गये। नमक सत्याग्रह। गांधी के नेतृत्व में लाखों लोग नमक कानून का विरोध करने के लिए अंग्रेजों की लाठी डंडे खाते रहे। और जनता को शिक्षित किया जा रहा है कि 1857 और डांडी मार्च और महाकुंभ सब एक है। महाकुंभ में डुबकी लगाने वालों ने डुबकी लगाकर आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है। अब देश फिर एक बार आजाद हो गया है और औरंगजेब, अकबर, बाबर को कब्रों से खोदकर बाहर निकाला जाए और पूरे देश को आग और धर्मयुद्ध में झांक दिया जाए। देशवासी हमेशा डर में जियें और आपस में लड़ें। इसी से विकास होगा और खुशहाली आएगी।
आप क्रांतिकारी लोग अपनी कुर्बानी को कम से कम कुछ समय के लिए भूल जाओ। वक्त बदलता है। नया जमाना आएगा। आखिर सन् 1944 में हिटलर को कहां मालूम था कि 1945 में उसे आत्महत्या करना पड़ेगी।
डोरीलाल भगतसिंह प्रेमी
24 03 2025
दस्ताने पहनने वाले, न पहनने वाले
डोरीलाल के यहां कचरा उठाने वाला आया था। नंगे हाथों से कचरा उठा रहा था। बाहर कचरा गाड़ी खड़ी थी। उसमें कचरे वाली गाड़ी में सब कचरा डालो जी का प्रेरणास्पद गीत जोर जोर से बज रहा था। मैंने कचरे वाले से पूछा कि तुम दस्ताने क्यों नहीं पहनते ? उसने कहा अभी तक सरकार ने दिया नहीं है। मैंने कहा दस्ताने से तुम्हारे हाथों की सुरक्षा होगी। तुम्हें पहनना चाहिए। तुम्हारे स्वास्थ्य का सवाल है। उसने कहा हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।
मैं कचरा उठाने वाले की बेफिक्री से प्रभावित हुआ। उसको जब सरकार देगी तभी पहनेगा। वरना उसके हाथों की चाहे जैसी दुर्गति हो उसे मंजूर है। उसके लिए दस्ताना एक औपचारिकता है। एक चोंचला है। इससे उसके हाथों की स्वतंत्रता बाधित होती है। पहले पहनो फिर उतारो। यही करते रहेंगे क्या ? डोरीलाल ने कचरे वाले से दोबारा नहीं कहा। कोई मतलब नहीं। यदि आप स्वयं की चिंता नहीं करते तो कोई दूसरा आपको दस्ताने क्यों पहनाएगा। बिल्कुल नहीं।
अभी तीन लोग बैठे थे। अमेरिका में। बात केवल इतनी थी। दस्ताने की। अमेरिका कहता था कि हमने तुम्हें दस्ताने दिए। वरना तुम तो कब के निपट गए थे। दस्ताने का इतना बिल हुआ। चुकाओ। यूक्रेन ने कहा कि हओ ठीक है। माना कि तुमने दस्ताने दिए। तुम्हारे दस्ताने के बिना हम तीन दिन भी नहीं लड़ सकते थे। मगर अमेरिका ने कहा कि देखो बातों बातों में हमारा कर्जा न भूलो। वो तो चुकाना पड़ेगा। तुम अपने घर के बर्तन भांडे हमें दो। तुम्हारे पास बहुत हैं। सब निकालो। हम कर्जा वसूलने बैठे तो तुम चुका नहीं पाओगे। चलो हमारे दस्ताने पहनो। यूक्रेन ने कहा कि तुम्हारे दस्ताने के एहसान का ये मतलब नहीं है कि हम भूखे मरने लगें। हम यूरोप के दस्ताने पहन लेंगे।
यूरोप में सारे यूरोपियन इकठ्ठे हो गये। बोले तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है बच्चा। चढ़ जा बेटा सूली पर भला करेंगे राम। तू तो लड़ हम लगातार दस्ताने देते रहेंगे।
उधर रूस कह रहा है कि तू दुनिया भर से दस्ताने मांगता फिर रहा है। अरे सीधे हमारे दस्ताने पहन ले और शांति से रह। मगर जेलेन्सकी की मजबूरी है। वो रूस का दस्ताना नहीं पहन सकता। उसकी सारी राजनीति ही रूस के दस्ताने न पहनने पर टिकी हुई है। यूक्रेन रूस का पड़ोसी है। यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। रूस के बाद यूक्रेन ही सबसे बड़ा राज्य था। खूब संपन्न। जब राष्ट्रवाद की लहर उठी और सारे राज्य अलग अलग राष्ट्र बन गये तब भी एक सहमति से चलते रहे। यूक्रेन में रूस से दोस्ताना संबंध रखने वाले राष्ट्रपति को भगा दिया गया। जेलेन्सकी रूस से घृणा के आधार पर ही राष्ट्रपति बने हैं। वो रूस के दुश्मनों को अपना घर किराये पर दे रहे हैं। रूस पहले ही कह चुका है कि ये नहीं चलेगा। ये किरायेदार तुम नहीं रख सकते। यदि तुमने रखा तो हम तुम्हारा घर गिरा देंगे। सारी लड़ाई अब किराये के घर को गिरा देने की चल रही है।
दस्ताने पहनने पहनाने की लड़ाई में हजारों नागरिक, बच्चे बूढ़े महिलाएं मारे जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है। यूक्रेन जैसा अमीर राज्य आज अमेरिका के कर्ज तले दबा हुआ है और ट्रंप की डांट खा रहा है। इधर तरक्की करते बांगला देश में खूब जातीय उन्माद भड़काया गया और अब तो सब कुछ साफ हो गया है कि बांगला देश ने अमेरिका का दस्ताना पहन लिया है।
इजरायल के पास अमेरिका का दस्ताना है। इजरायल और फिलस्तीन का झगड़ा शाश्वत है। हमेशा चलेगा। तब तक चलेगा जब तक फिलीस्तीन पूरी तरह मिट नहीं जाएगा। इसमें हमास जैसे फिलीस्तीनी संगठनों का भी हाथ रहेगा। अभी जो कुछ गाजा में हुआ वो हमास की मूर्खता से हुआ। हजारों फिलिस्तीनी मारे गये। पूरा गाजा तबाह हो गया। रहने को घर नहीं बचे। जैसे किसी पहलवान को कोई बच्चा गुलेल से पत्थर मार दे और फिर पहलवान बच्चे के परिवार को मारे और घर गिरा दे। ये बच्चे का भोलापन नहीं मूर्खता है।
इस दुनिया की दिक्कत ये है कि बड़े देश बड़े इसलिए हैं कि उनके पास हथियार बनाने के बड़े बड़े कारखाने हैं। बड़े बड़े हथियार व्यापारी हैं। उनके लिए जरूरी है कि देशों के बीच युद्ध हो। देशों के अंदर युद्ध हो। वो सहायता के नाम पर हथियार उधार देते हैं और बड़ा व्याज वसूलते हैं। बहुत सारे देश तो केवल हथियार खरीदने और कर्जा चुकाने, ब्याज चुकाने के लिए ही अस्तित्व में हैं।
ये दोस्तियां, ये यारियां, ये देशों के दौरे, ये मदद के आश्वासन, ये शांति की कोशिशें सब दस्ताने पहनने और पहनाने के लिए होती हैं। सीरिया, लेबनान जैसे देशों में केवल युद्ध ही चल रहा है। कौन किससे क्यों लड़ रहा है मालूम नहीं है। बेरूत एक जमाने में पश्चिम का पेरिस कहा जाता था। आज तबाह हो चुका है।
लड़ाईयां केवल शांति से जीती जा सकती हैं। जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक तनाव केवल मुहब्बत और भाईचारे के प्रसार से खत्म हो सकता है। जब तक पूरा समाज एकता, भाईचारे और प्रेम से नहीं रहेगा सुखी नहीं रह सकता। तरक्की नहीं कर सकता। हां उन्माद और बंटवारे से चुनाव जीते जा सकते हैं - जीतिये।
डोरीलाल दस्ताने प्रेमी
03 03 2025
’उससे’ सब डरते हैं
डोरीलाल जी कुंभ हो आए ? एक दोस्त ने पूछा वो अभी अभी लौटा है। वो संतोष, गर्व और विजय के भाव से ओतप्रोत था।
मैंने कहा - नहीं जरा भीड़ कम हो जाए फिर जाएंगे।
उसे मालूम था कि मैं नहीं जा रहा हूं और उसने मुझे चिढाने के लिए ही पूछा था। उसने फिर कहा आज का लेटेस्ट आंकड़ा आ गया है। 59.01 करोड़ लोग डुबकी लगा चुके हैं। अब बहुत कम दिन बचे हैं। इन दिनों में दस बीस करोड़ लोग और पंहुच जाएंगे। दुनिया में कहीं ऐसा होता है ? 144 साल बाद ये कुंभ हो रहा है। ज्यादा देर की तो मिल चुका मोक्ष, धुल चुके पाप।
मैंने कहा कि मेरे पास मेरी खुद की बुद्धि है। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि जितने लोग कुंभ गये बता रहे हो उतनी आबादी चीन के अलावा किसी देश की नहीं है। ये 144 साल वाला झूठ मुझे न बताओ। न मैं पापी हूं और न मुक्षे मोक्ष चाहिए। भारत में हजारों साल से मेले, उत्सव होते रहे हैं। नदियों से हमें पानी मिलता है जिससे जीवन चलता है और खेती किसानी होती है। इसलिये नदियों की हम पूजा करते हैं ताकि उन्हें शुद्ध रखा जाए। कोई गंदा न करे। कुंभ में आदमी अपनी श्रद्धा और परंपरा के कारण जाता है। ये कुंभ कोई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के कारण नहीं हो रहा। ये नहीं होते तो भी कुंभ होता जैसे पहले होता था और आगे भी होता रहेगा। आज कल भारत में सत्ताधारी जो बोल दे वो ही अखबार छापता है। टी वी चैनलों में आता है और भारत का शिक्षित मध्यवर्ग तुरंत मान लेता है। भारत की जनसंख्या है 140 करोड़। इसमें 40 करोड़ दूसरे धर्मों के लोग और नास्तिकों को निकाल दो तो लगभग पूरा देश इलाहाबाद पंहुच कर डुबकी लगा चुका है। ये गिनती कौन गिन रहा है ? कौन सी मशीनें कहां लगी हैं ? कितनी कारें, कितनी बसें और कितनी रेल गाड़ियों से कितने लोग पंहुच रहे हैं ये कौन गिन रहा है। एक मंझौले से 16 लाख की आबादी वाले शहर में आखिर कितने लोग समा सकते हैं।
आज भारत में गांव शहर दो भागों में बंट गए हैं। वो लोग जो कुंभ गये और नहा आए और वो लोग जो कुंभ में नहीं गए।जो नहीं गए उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। अब धीरे धीरे वो समय भी आ जाएगा जब लोकलाज के लिए जो नहीं गए वो भी कह देंगे कि हम तो पहले ही हो आए थे। कुंभ जाना भर नहीं है। कुंभ से लौटकर ये बात सबको बोलना है कि योगी मोदी को मान गये क्या व्यवस्था है। और मुफ्त में क्या स्वादिष्ट खाना मिल रहा था। अहा क्या मिठाईयां, क्या पकवान। और अब इतने लोग पंहुच गये तो योगी क्या करे। जो लोग मरे हैं न वो अपनी गलती से मरे हैं योगी जी तो बिचारे क्या नहीं कर रहे। लगे हैं दिन रात।
उसने कहा - नहीं तुम जाना नहीं चाहते मगर बोलने से डरते हो।
मैंने कहा हां मैं डरता हूं। क्योंकि यह डरे हुए लोगों का देश है। यहां हर कोई डरता है। वकील डरता है। जज डरता है। बड़े अधिकारी आई ए एस आई पी एस डरते हैं। कुलपति डरता है। प्रिसीपल डरता है। प्रोफेसर मास्टर यहां तक की शिक्षा का बाबू भी डरता है। छात्र डरता है। परीक्षा लेने वाला डरता है। परीक्षा देने वाला डरता है। पति डरता है पत्नि डरती है। उनके बच्चे डरते हैं। स्कूल का प्राचार्य डरता है। स्कूल मालिक डरता है। अभिभावक डरते हैं। बच्चे डरते हैं। संत महात्मा डरते हैं। उनके भक्त डरते हैं। ट्रक मालिक डरता है। ड्राइवर डरता है। राहगीर डरता है। कार बेचने वाला डरता है। कार खरीदने वाला डरता है। कार में बैठने वाला डरता है।
व्यापारी डरता है। ग्राहक डरता है। व्यापारी संघ डरता है। ठेका देने वाला डरता है। ठेका लेने वाला डरता है। सड़क बनाने वाला डरता है। सड़क पर चलने वाला डरता है। लायसेंस देने वाला डरता है। लायसेंस लेने वाला डरता है।
कानून बनाने वाला डरता है। कानून पास करने वाला डरता है। कानून की रक्षा करने वाला डरता है। कानून को लागू करने वाला डरता है। वकील डरता है। जज डरता है। मुवक्किल डरता है। मुद्दई डरता है। गवाह डरता है। अपराधी डरता है। पुलिस डरती है।
सत्ताधारी डरता है। विपक्षी डरता है। जो न सत्ता में है न विपक्ष में है। वो भी डरता है। पंच डरता है। सरपंच डरता है। पार्षद डरता है। मेयर डरता है। विपक्ष का नेता डरता है। जो न बन पाया वो भी डरता है। विधायक डरता है। हारा हुआ विधायक डरता है। सांसद डरता है। हारा हुआ सांसद डरता है। जीता हुआ डरता है। हारा हुआ डरता है। सब डरते हैं।
मंत्री डरता है। मुख्यमंत्री डरता है। जो भूतपूर्व हो गये वो डरते हैं। जो वर्तमान में हैं। वो डरते हैं। जो भविष्य में बनने वाले हैं वो डरते हैं।
प्रेस मालिक डरता है। संपादक डरता है पत्रकार डरता है। बु़द्धजीवी डरता है। लेखक डरता है। कवि डरता है। कलाकार डरता है। निर्देशक डरता है। रोजगार वाला डरता है। बेरोजगार डरता है। किसान डरता है। मजदूर डरता है।
टेलिविजन में दिखने वाला डरता है। दिखाने वाला डरता है। चैनल वाले डरते हैं। चैनल मालिक डरते हैं।
बडे़ बड़े न्यायाधीश डरते हैं। बड़े बड़े वकील डरते हैं। चुनाव आयुक्त डरते हैं। उपचुनाव आयुक्त डरते हैं। चुनाव लड़ने वाले डरते हैं। जो चुनाव नहीं लड़ते वो भी डरते हैं। चुनाव जीतने वाले डरते हैं। चुनाव हारने वाले डरते हैं।
डोरीलाल भी डरता है। इसलिए उसने बहुत सारे डरपोकों के नाम नहीं लिखे हैं। वो बहुत बड़े डरपोक हैं। वो बहुत बड़े लोगों से डरते हैं। कौन नहीं डरता है। हर किसी को डर है।
बेदखल होने का डर है। किसी के भी बन जाने का डर है। बंद हो जाने का डर है। अपराधी बना दिए जाने का डर है।
जैसे महाआरती है। जैसे महाकुंभ है। वैसे ही ये महा डर है। किसका है ?
डोरीलाल डर प्रेमी
23 02 2025
एक खुफिया बातचीत
डो - कैसे आए ?
न - भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हमारी वसुधैव कुटुम्बकम की परंपरा है।
डो - तो ?
न - भारत एक लोकतांत्रिक........ हम आपको चुनाव में विजयी होने की बधाई देने के लिए आए हैं।
डो - तो चुनाव प्रचार के लिए क्यों नहीं आए ? पिछले चुनाव में तो आए थे। इस बार तो आकर भी बिना मिले चले गये। मैं इंतजार करता रहा। तुम्हें समय नहीं मिला ?
न - भारत एक लोकतांत्रिक........मैं जिस बार चुनाव प्रचार करने आया था आप चुनाव हार गये थे।
डो - इस बार मैंने कोई गलती नहीं की। जैसे तुमने अपने देश में चुनाव का पूरा सिस्टम कब्जे में ले लिया है वैसा अभी अमेरिका में नहीं हो पाया है पर जल्द ही हो जाएगा। मुद्दे की बात करो।
न - भारत एक .......... हमारे व्यापारी पर गिरफ्तारी वारंट है। उसे कटवाईये।
डो - कटवा देंगे। और सुनो ये बार बार भारत एक लोक....... क्यों बोल रहे हो ? हमें मालूम है कितने लोकतांत्रिक हो। हमें न बताओ।
न - भारत एक लो........हमने हार्ले डेविडसन पर टैरिफ घटा दिया। हम फिर से विश्वगुरू बनेंगे।
डो - अभी तो बहुत कुछ घटाना पडे़गा। वी विल मेक अमेरिका ग्रेट अगेन। हमारे तुम्हारे दोनों के देशों की जनता एक सी भोली है। हमने कह दिया कि अब अमेरिका ग्रेट नहीं है। अब मैं जीत गया तो अमेरिका फिर ग्रेट हो गया। तुमने भी तो अपने देश में यही किया था न ?
न - भारत एक लोकतांत्रिक........क्या चुनाव बिना झूठ बोले, बिना झूठे वादे किये और बिना कार्पोरेट की सेवा किये जीता जा सकता है ? जिसका खाएंगे उसका बजाएंगे। हम तो शरीर मात्र हैं। आत्मा तो उन्हीं की है।
डो - तो शरीर जी, अब मुद्दे की बात पर आओ।
न - वसुधैव कुटुम्बकम
डो - जितना सामान हम तुमसे खरीदते हैं उतना सामान तुम्हें हमसे खरीदना होगा। हमारे सामान पर टैरिफ घटाना होगा। तेल पेट्रोल सब हमसे लेना होगा। और जिस दाम पर हम कहेंगे उस दाम पर लेना होगा। वरना धंधा बंद। बोलो है मंजूर ?
न - हमारी दोस्ती अमर रहे। भारत एक लोकतांत्रिक ..................
डो - आजकल हथियार बनाने वाली कंपनियों में बहुत कम्पटीशन है। तुम रूस से सामान बहुत खरीद रहे हो। अब हमसे लेना होगा।
न - वहां से हमें सस्ता पड़ता है। इसलिए लेते हैं।
डो - हमें सब मालूम है। हमें फ्रांस के राफेल का रेट भी मालूम है। हम जिस भाव से देंगे तुम्हें लेना होगा।
न - भारत एक लोक..........। भारत अमेरिका के संबंध बहुत पुराने हैं। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं।
डो - यू आर ग्रेट। यही सच्ची दोस्ती होती है। हमने जो कहा तुमने माना। हमने जो शर्त बताई तुमने मानी। इसे कहते हैं। राष्ट्रहित। डेफीनिटली। यू विल मेक इंडिया ग्रेट अगेन। बाई द वे, वॉट डू यू मीन बाई विश्वगुरू ?
न - क्या है कि हमारी सभ्यता बहुत पुरानी है। जब धरती पर इंसान पैदा नहीं हुआ था तब से हमारी सभ्यता है। अब आपकी सभ्यता तो तीन सौ साल पुरानी भी नहीं है। इसलिए हम अपने को विश्वगुरू मानते हैं।
डो - तो उससे क्या होता है ?
न - नहीं होता कुछ नहीं है। जनता खुशफहमी में रहती है। जैसे आपकी जनता मेक अमेरिका ग्रेट अगेन से खुश हो गई।
डो - अच्छा एक बात तो बताओ ? तुमने अपने यहां के मीडिया को कैसे कब्जे में लिया ? हमारे यहां तो ऐसे बहुत सारे हैं जो बिकने को तैयार नहीं ?
न - वेरी सिम्पल। ये विकसित और विकासशील का फर्क है। एक तो हर कोई बिकने के लिए दरवाजे पर आ जाता है। दूसरे जो बिकता नहीं है उसे तोड़ दिया जाता है। वैरी सिम्पल। पैसे की ताकत के सामने कौन टिकता है। इतना पैसा दो कि जीवन भर दुम हिलाता रहे। अब हमारे देश में तो इतनी सुदृढ़ व्यवस्था है सारा तंत्र हमारी सेवा में है।
डो - तुमने अपोजिशन को कैसे निपटाया ?
न - हमारा सिस्टम इतना मजबूत है कि हमारे यहां चुनाव हारने वाले हमसे नहीं लड़ते आपस में लड़ते हैं। ऐसा सिस्टम बना दिया है कि जनसंख्या से ज्यादा वोट पड़ जाते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद लाखों वोट बढ़ जाते हैं। जीतने वाले उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है। अदालत में उन्हें तारीख नहीं मिलती और चुनाव आयोग उन्हें शेर पर शेर सुनाता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हम विश्व गुरू हैं।
डो - विश्वगुरू जी, आपके लाखों लोग अवैध रूप से आकर अमेरिका में घुस गये हैं। ये विश्वगुरू और वसुधैव कुटुम्बकम अपने पास सम्हालो। हम हथकड़ियां लगाकर इनको सेना के विमान से भेज रहे हैं।
न - वसुधैव कुटुम्बकम। हमारे यहां कुम्भ में आइये ने। मैनेजमेंट देखिये।
डोरीलाल डोन प्रेमी
17 02 2025
रिक्शे पर सवार दीनदयालु
डोरीलाल ने तय किया कि इस ठंड में फलालैन की नई शर्ट बनवाई जाए। सो फुहारे की मशहूर दुकान से कपड़ा खरीदा। 750 रू दिए। बाहर निकले तो बिही का ठेला दिखा। दो किलो बिही खरीदी। 100 रूपये दिए। फिर ऑटो वाले को रोका। शहीद स्मारक जाना है। उसने कहा - बैठो। पचास लगेंगे। अरे अभी दस में आया हूं। तब तक पीछे एक साइकिल रिक्शा आकर खड़ा हो गया। वो कातर निगाहों से मेरी ओर देखने लगा। मैंने कहा शहीद स्मारक चलोगे। उसने कहा वहीं जहां मेला लगता है मैंने कहा वहीं। कितना लोगे। वो घबरा गया। उसे एक क्षण में ऐसा उत्तर देना था कि सवारी मना न कर दे। उसने कहा- तीस रूपये। मैं झट से बैठ गया। उसने कहा आप भले आदमी हो। वरना आजकल साईकिल रिक्शे पर बैठता कौन है। एक क्षण में उसने मुझे दीनदयालु बना दिया।
जब मैं दीनदयालु बन गया तो मुझ पर मस्ती छाने लगी। मुझे राजनीति सूझने लगी। मैंने उस पर प्रश्न दागना शुरू कर दिए। मैंने कहा कितना कमा लेते हो। उसने कहा कभी कभी रिक्शे का किराया निकल आता है। कभी कभी खाने भर को मिल जाता है। कहां रहते हो ? उसने कहा - कहीं नहीं। मुझे समझ आ गया कि इसे सरकार की जनहितकारी योजनाओं की जानकारी नहीं है। उसी के अभाव में यह भूखों मर रहा है और बिना घर के रह रहा है। मैंने कहा कि तुम दीनदयालु थाली जो पांच रूपये में मिलती है वो क्यों नहीं खाते। हर त्यौहार में इतने भंडारे लगते हैं उनमें क्यों नहीं खाते। और सरकार तुम लोगों को 5 किलो अनाज हर महीने दे रही है आराम से पेट भर खाओ और सोओ। प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उठाओ। अभी करोड़ों लोगों को घर मिल रहे हैं। अगले पच्चीस सालों में तो घर ज्यादा हो जाएंगे लोग घट जाएंगे। घर खाली पड़े रहेंगे। तुम लोग जागरूक बनो। तुम लगे हो यह रिक्शा घसीटने में। तुम्हारी गरीबी का कारण तुम खुद हो।
मैं रिक्शे पर बैठा था। वो रिक्शा खींचे जा रहा था। मैंने कहा कि दरअसल भारत के लोग मेहनत करना नहीं चाहते। जापान में देखो। सिंगापुर में देखो। वहां लोग मेहनत करते हैं। हमारे यहां किसान खेती में मेहनत नहीं करना चाहते और कहते हैं कि फसल का दाम सही नहीं मिलता। मजदूर कारखानों में मेहनत नहीं करना चाहते और कहते हैं कि काम नहीं मिलता। आखिर हम लोग करें क्या ? मेरे अंदर विजय मालया वगैरह की आत्मा आ चुकी थी।
वो रिक्शा चलाए जा रहा था। उसने पीछे मुड़कर मुझे घूरा। मैं सकपका गया। मैंने बात बदलने के लिए उससे पूछा कि अरे ये रोटी कपड़ा मकान की बात छोड़ो। ये बताओ कि अब सरकार ये बार बार चुनाव का चक्कर बंद कर रही है। अब देश में एक देश एक चुनाव होगा। बस एक बार वोट दोगे और हमेशा के लिए वोट देने से मुक्त हो जाओगे। एक बार सरकार बन जाएगी। हमेशा बनी रहेगी।
मेरा जोश बढ़ता जा रहा था। मैंने कहा अच्छा ये बताओ कि तुम्हें संविधान पर गर्व है कि नहीं। तुम कितने भाग्यशाली हो कि तुम उस देश में रहते हो जहां एक संविधान है। जहां संविधान दिवस मनाया जाता है। संविधान की पूजा की जाती है। संविधान की रक्षा के लिए लोग एक दूसरे से लड़ मरते हैं। कहीं कोई संविधान की किताब सिर पर लिए घूम रहा है तो कहीं कोई हाथ में लिए सबको दिखाता घूम रहा है।
मेरी बकबक सुनकर उसने एक बार मुझे पीछे मुड़कर देखा और रूआंसा होकर बोला - बाबू जी काम मिलता नहीं, हर चीज़ बहुत मंहगी हो गई है।
मेरी हवा सरक गई। लगा जैसे किसी ने सिर पर हथौड़ा मार दिया हो।
कुछ देर मैं चुप रहा। सदमा बर्दाश्त करता रहा। फिर मैंने हिम्मत जुटाई। उससे कहा कि देखा चारों ओर विकास हो रहा है। हर तरफ खुशहाली है। इस बार जो बजट आया है उससे लोग खुशी से झूम उठे हैं। तुम्हें मालूम है कि बारह लाख कमाई वालों को एक रूपया इनकम टैक्स नहीं देना है। देखो रिक्शे वाले भाई अब दुखी ही रहना है तो रहे आओ वरना हमारे प्यारे देश में खुशी के मौके बार बार आते हैं।
हर बजट से करोड़ों लोगों को रोजगार मिला है। इतने रोजगार मिलने लगे कि लाखों लोग विदेशों में भागने लगे। कहीं हमें भारत में नौकरी मिल गई तो फंस जाएंगे। इसलिए वो लोग जैसे तैसे मरते खपते अमेरिका कनाडा जा रहे हैं। भारत देश की महानता की जितनी तारीफ की जाए कम है। यहां बेरोजगार भी विदेश भाग रहे हैं और करोड़पति भी विदेश भाग रहे हैं।
भारत में इतनी अच्छी पढाई हो रही है और पढ़ाई का स्तर इतना उंचा हो गया है लाखों विद्यार्थी करोड़ों रूपये का कर्ज लेकर विदेशों में जाकर पढ़ाई करने लगे हैं ताकि विदेशों में बता सकें कि इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ पढ़ाई भारत में होती है। इतनी श्रेष्ठ पढ़ाई हम लोग सहन नहीं कर पाते इसलिए घटिया पढ़ाई करने विदेश जाते हैं। तुम्हें मालूम है रिक्शे वाले भैया कि तुम जिस देश में रिक्शा घसीट रहे हो वो विश्वगुरू था। फिर कहते हैं कि भारत फिरसे विश्वगुरू बन जाएगा। इससे शक होता है कि शायद अभी नहीं है।
रिक्शेवाले भैया तुम महाकुंभ हो आओ। गंगा में डुबकी लगा आओ। करोड़ों जा रहे हैं। वहां मुफत का बढिया खाना मिल रहा है। तुम तो शकल से ही पापी टाइप के दिख रहे हो। वहां जाना। डुबकी लगाना। सारे पाप जब तक धुल न जाएं तब तक डुबकी लगाते रहना। जब एक एक पाप धुल जाए एक दम फ्रेश हो जाओ तो वापस आना और ये रिक्शा चलाना और बारह साल तक खूब पाप करना यदि जिंदा रह गए तो अगले कुंभ में जाकर फिर पाप धो लेना।
मुझे बहुत हल्का महसूस हो रहा था। आज मैंने एक आदमी को विकास की महिमा से परिचित करा दिया है। शहीद स्मारक आ गया। यहां मेरी बीस लाख रूपये की एस यू वी खड़ी थी। मैं रिक्शे से उतरा। उसे मैंने तीस की जगह पचास का नोट दिया और इतराता हुआ अपनी कार की ओर बढ़ गया।
डोरीलाल विकासप्रेमी
10 02 2025
जुआं खेलना नहीं आता तो मत खेलो, रोओ मत
वो कहे जा रहा था लगातार हुई है वही जो राम रचि राखा। राम जी की चिड़िया राम जी का खेत। डोरीलाल उससे पूछे जा रहे थे कि क्यों भाई आखिर बात क्या है ? हुआ क्या है ? मगर वो जवाब न दे। मैंने पूछा भाई इतनी निराशा क्यों ? बताओ तो सही किस बात ने तुम्हें इतना निराश कर दिया है। वो बोला कि मैं रोज जाता हूं। पत्ते खेलता हूं। मेरे पास पत्ते भी अच्छे आते हैं। मुझे विश्वास हो जाता है कि मैं जीत रहा हूं। सामने वाले को भी विश्वास हो जाता है कि वो हार रहा है। मगर जब पत्ते खुलते हैं तो हमेशा तीन इक्के उसी के पास निकलते हैं। ये बार बार होता है। जुआंघर वाले से कहता हूं तो वह कहता है कि जुएं का नियम है जिसके पास तीन इक्के वो ही जीतेगा। उसके पास तीन इक्के हैं इसलिए वो जीता है। मैं कहता हूं कि हमेशा इक्के उसके पास ही क्यों निकलते हैं। वो कहता है कि हमारे जुआंघर में कोई बेईमानी नहीं होती। हमारा जुआंघर विश्व में श्रेष्ठ है। हमारे देश में जुएं में ईमानदारी की सुदीर्घ परंपरा है। हमारे देश में हमेशा जुआं होता रहा है और उसमें इक्के वाला जीतता रहा है। तुम बार बार एक ही रोना रोते रहते हो कि बेईमानी हो रही है। इक्के उसी के पास निकलते हैं। ये बिलकुल झूठ है। मैं दावे से कहता हूं कि ये झूठ है। जुआंघर मालिक जोर जोर से हंसता है। बाकी सब भी जोर जोर से हंसते हैं। चारों ओर हंसी का फौव्वारा छूट पड़ता है।
डोरीलाल ने उससे कहा कि जुआं खेल ही बेईमानी का है। इसे तुम खेलते ही क्यों हो ? बेईमानी के खेल में बेईमान ही जीतेगा। उसने कहा मगर जुआंघर के मालिक को तो देखना चाहिए कि बेईमानी हो रही है। उसे तो सचाई का साथ देना चाहिए। मैंने कहा कि तुम जैसे भोले मूर्ख लोगों के कारण ही ईमानदारी बदनाम हो रही है। अरे भाई जुआंघर का मालिक और लगातार जीतने वाला जुआंरी अलग अलग थोड़े ही हैं। दोनों पार्टनर हैं। जुआंघर बनाया किसने है ? जीतने वाले ने। जुआंघर का मालिक किसने चुना है जीतने वाले ने। तुम्हें इतनी सी बात समझ नहीं आती और जुआं खेलने चले जाते हो। इस जुआंघर में तीन इक्के पहले से उस जीतने वाले के पास रहते हैं। तुम जुआरियों के बीच 49 पत्ते बंटते हैं। इतनी गिनती तुम्हें नहीं आती तो किसकी गलती है ? तुम जैसे बेवकूफ बार बार जुआं खेलने चले जाते हैं इसलिए जुआंघर चलता है। अरे इतनी हिम्मत क्यां नहीं करते कि एक बार कह दो जुआंघर बेईमानी का अड्डा है। जुआंघर का मालिक जीतने वाले से मिला हुआ है। हम जुआं नहीं खेलेंगे। बिना खिलाड़ियों के जीतने वाला जीतेगा कैसे ? जुआंघर के मालिक की पोल तो खुलेगी। मगर हारने वालों को भी जुआं खेलने और हारने की लत लग गई है।
जब शकुनि मामा जुआंघर के मालिक हों तो कौरव क्यों न जीतें ? ये सब जानते हुए भी कि शकुनि मामा और कौरव मामा भांजे हैं और शकुनि मामा कौरवों के सगे हैं हमारे नहीं तो भी पांडव जुआं खेलने बैठ जाते हैं तो मूर्ख कौन हुए ? पांडव हुए। फिर भी ये मूर्ख जुआं खेलते रहे। एक के बाद एक संपत्ति हारते रहे। मूर्ख इतने थे कि द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया। वो इनकी पत्नि थी मगर संपत्ति के रूप में दांव पर लगा दिया। वो भी हार गये। जंगल चले गए मगर अक्ल न आई कि जुआं खेलना भले लोगों का काम नहीं है। भले लोगों के साथ कौन खड़ा होता है ? धृतराष्ट्र और गांधारी और सारे धर्माचार्य किसके साथ थे ? वो धर्म और न्याय के साथ नहीं थे। वो कौरवों के साथ थे।
आज भी सारे धर्माचार्य और न्यायाचार्य किसके साथ हैं ? कौरवों के साथ। तीन इक्के बेईमानी से अपने पास रखने वाले और जुआं जीतने वाले के साथ सब हैं। उधर धर्म और न्याय अकेला खड़ा है। लुटा पिटा। उसके साथ रोने वाला भी कोई नहीं और जुआं जीतने वाले के आगे सब कूद कूद कर नाच रहे हैं। ढोल बजा बजा कर नाच रहे हैं। न्यायाचार्य पर्दे की पीछे छुपकर तो कभी सामने आकर कौरवों का हौसला बढ़ा रहे हैं जुआं जीतने वाले तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं। हम किसी फरियादी को अपने पास फटकने नहीं देंगे। आ गया तो उसको कल बुलायेंगे और ये कल कभी आएगा नहीं। युग बीत जाएंगे।
अच्छा हुआ महाभारत हो गया और फैसला हो गया कि कौरव हारे पांडव जीते। यदि ये किसी न्यायाचार्य के पास अपना मुकदमा लेकर चले जाते तो आज भी फैसला न हो पाता। जो होता है अच्छे के लिए होता है। कौरव पांडव के संघर्ष में कौरवों का राज्य गया और पांडवों को राज्य मिला मगर जो लाखों लोग दोनों पक्षों की ओर से लड़े और मर गये उन्हें क्या मिला ? उनके कोई नाम नहीं हैं। वो अग्निवीर हुए।
आज भी जुआं खेलने वाले हारने वाले और जीतने वालों के अलावा सब संख्याएं हैं। इतने लाख इतने करोड़ इतने हजार ये वोट डालने के पुतले हैं। इनके कोई नाम नहीं। इनका इतना ही उपयोग है। ये इनको भी मालूम है। हमें एक दिन जाना है और वोट डालना है। बाकी काम हारने और जीतने वाले कर लेंगे।
ये देश कैसे चलता है ? ये देश रोज मेहनत करने वालों और उत्पादन करने वालों से चलता है। ये लोग केवल अपना पेट पालने का संघर्ष करते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं। ये जीवित हैं क्योंकि ये किसी तरह अपने लिये जीवित रहने लायक खाना जुटा लेते हैं। ये केवल संख्या हैं। ये बिना किसी योजना के धरती पर आ गये हैं। ये बिना किसी कारण के धरती से चले जाएंगे। इनके साथ अमर होने की कोई लालसा भी नहीं है। ये जीवित हैं क्योंकि इनके फेफड़े मुफ्त की सांस लेकर शरीर को जिंदा रखते हैं। इनके शिलालेख नहीं बनते। इनके स्मारक नहीं बनते। इनके लिए शांति पाठ नहीं होता।
जुआं खेलना केवल चतुर चालाक लोगों का, बेईमानों का खेल है। यदि आप हार जाते हैं तो आप प्रमाणित करते हैं कि आप चालाक और कुटिल नहीं हैं। आपको जुआं खेलना नहीं आता है। मत खेलो न। रोओ मत।
डोरीलाल जुआंप्रेमी
21 10 2024
जो हमको लाए हैं हम उनको लाएंगे।
वो सब जानता है। वो अजर है अमर है अविनाशी है। वो सर्वज्ञानी है। संतोषी है। विघ्नहर्ता है। वो निर्माता है। वो संहारक है। वो कण कण में व्याप्त है। वो हर दिशा में है। ऐसा वो कहते हैं। वो ये भी कहते हैं कि वो सबको देख रहा है। वो सब सुन सकता है। उसके पास एक्स रे मशीन है। वो तुम्हारे अंदर झांक कर सब देख सकता है। वो मन की बात पढ़ लेता है। आप मनुष्य को भ्रम में रख सकते हो। तरह तरह के कपड़े पहन सकते हो। तरह तरह के चश्मे लगा सकते हो। टोपी पहन सकते हो। इससे प्रजा आपके नए नए रूपकों से प्रभावित हो जाती है। आप गरीबों को खाना खिला सकते हो। गरीबों को कपड़े पहना सकते हो। मगर वो तो सब देख रहा है। उसे मालूम है कि तुम्हारे कर्म कैसे हैं। तुम कितने खुराफाती हो। तुम कितने झूठे हो। तुम कितना गिर सकते हो। तुम्हारे अंदर कितनी घृणा है। कितने षडयंत्र तुम्हारे अंदर पनप रहे हैं। वो तुम्हें देख सकता है। तुम्हें पढ़ सकता है पर बोलता नहीं है।
जो बोलता नहीं है उसके बारे में कई लोग हमें बताते हैं। बस वे ही जानते हैं। ये ईश्वर के प्रवक्ता हैं। ये मनुष्यों को बताते हैं कि ईश्वर क्या चाहता है। वो मनुष्य को किस रूप में प्यार करता है। इन्हीं के कारण मनुष्य जान पाया है कि ईश्वर कैसा दिखता है। कहां रहता है। क्या बोलता है। क्या खाता है। क्या पहनता है। ऐसा भ्रम होने लगता है कि अभी कल ही ईश्वर से मिल कर आ रहे हैं। स्वर्ग और नर्क का आंखों देखा हाल ये रोज बताते हैं। सभी भगवानों की सभी लीलाओं का आंखों देखा हाल ये सुनाते हैं। यही ईश्वर के सोल एजेन्ट हैं। ये इसी की खाते हैं। यही ईश्वर के बारे में बताते हैं और यही ईश्वर के संदेश देते हैं। यही बताते हैं कि ईश्वर ने कहा है कि इस चुनाव में किसे राजा बनाना है। किसे वोट देना है। इनके श्रोता इनसे यही सुनने आते हैं और प्रवचन-कथा-भागवत सुनने के पहले और बाद में ये भक्त बिलकुल नहीं बदलते। जो कर्म कुकर्म प्रवचन सुनने के पहले करते थे वही सुनने के बाद करते हैं। भक्तों की ऐसी ट्रेनिंग है कि उन्हें कोई तर्क, कोई सच्चाई प्रभावित नहीं करती।
यह भारत देश कितना भाग्यवान है। यहां कितने देवी देवता जन्म लेते हैं और यहीं रहे आते हैं। न जाने कितने युग बीत गये पर परमेश्वर ने कोई अवतार नहीं लिया था। मगर इसी साल अभी 2024 के मई माह में अचानक दुनिया को पता चला कि हमारे बीच में एक ऐसा आदमी है जिसे पहले लगता था कि शायद उसकी मां ने उसे जन्म दिया है। उसे शक तो पहले से ही हो रहा था। मगर जब गंगा किनारे वो खड़ा हुआ तो उसे ज्ञान प्राप्त हुआ कि नहीं वह तो अजर अमर अविनाशी है क्योंकि वह बायोलॉजिकल पैदावार नहीं है यानी वो हाड़ मांस का पुतला नहीं है। तब उसे पूरा विश्वास हो गया कि उसे परमात्मा ने किसी काम विशेष के लिए इस धरा पर भेजा है। वो तो परमात्मा का अवतार है। उन्हें भले ही चुनावों के चलते बर्राते हुए यह बात ध्यान में आई हो परंतु डोरीलाल को उसी समय शक हुआ था जब इन्होंने भारत के लिए आगामी एक हजार वर्षों की योजना पेल दी थी। ऐसा जबरदस्त फांकू विजन किसी अवतारी पुरूष का ही हो सकता है। फिर एक छोटा विजन और आया कि एक हजार साल के अलावा हमारा लक्ष्य 2047 यानी आज से 25 साल बाद का है। अभी अवतारी बाबा 75 साल के हो रहे हैं। 25 साल बाद सौ साल के हो जाएंगे। मगर भारत की जनता की भलाई की कसम खा ली है तो खा ली है। भलाई तो करके रहेंगे। जनता ने मान भी लिया है कि 25 साल तो यूं ही कट जाएंगे। कर लेते हैं इंतजार। भारत के गरीब को आगामी 25 साल 5 किलो अनाज मिलता रहेगा।
डोरीलाल आपसे पूछते हैं कि जब आपको मालूम है कि वो यानी ईश्वर सब देख रहा है। वो सब सुन रहा है। वो सबको समझ रहा है। तो फिर उसको धोखा कैसे दे सकते हो। तुम चाहे केदारनाथ में जाकर बैठो चाहे कन्याकुमारी में जाकर बैठो। वो ईश्वर तो तुम्हें देख रहा है। तुम्हारे कर्मां का एक्स रे कर रहा है। तुम चाहे 18 घंटे ध्यान करो चाहे 45 घंटे ध्यान करो। चाहे 10 कैमरे लगाओ चाहे 40 फोटोग्राफर लगाओ वो तो तुम्हें सीधे देख रहा है। वो तो तुम्हारा हिसाब कर लेगा।
मगर इस जनता का क्या करें। उसे सब सही लगता है। हमारे राजा को उसके दरबारी कभी विष्णु का अवतार बताते हैं कभी ब्रह्मा का अवतार बताते हैं। जनता ईमानदारी से मानती है। जैसा राजा वैसी प्रजा। हमारी प्रजा सदियों से अवतारों के भरोसे जीवन काट रही है। गली गली में ईश्वर बैठे हैं। ईश्वर के प्रवक्ता बैठे हैं। उनका एंटेना लगातार ईश्वर के संदेश ग्रहण कर रहा है। उधर संदेश आया इधर प्रसारित हुआ। ये चुनाव कार्यालय 365 दिन चालू रहते हैं।
इस बीच खबर आई कि 45 घंटे की साधना पूरी हो गई। विवेकानंद जी ने चैन की सांस ली। कोई आदमी आपके सामने आकर डट जाए। दस दस कैमरे लगा ले तो आपकी क्या हालत होगी। न आप चैन से बैठ सकते न खा सकते न सो सकते। उस पर से वो लगातार शूटिंग करवाये जा रहा है। खबर आई है कि समुद्र की लहरों की बीच से ’ओम S S S चार सौ पार’ की ध्वनि उठ रही थी। विवेकानंद काफी परेशान रहे होंगे। ओम का जाप तो ठीक है मगर ये आदमी जो सामने कैमरा लगाए बैठा ध्यान करने की नौटंकी कर रहा है वो चार सौ पार चार सौ पार क्यों कर रहा है ?
इन महाशय का दावा है कि यही राम को लाए हैं। मगर उत्तर प्रदेश के पचास प्रतिशत मतदाता वोट डालने ही नहीं गये। ये क्या बात हुई। हम तुम्हारे लिए भगवान को ले आए और तुम वोट डालने नहीं गए। खैर कोई बात नहीं हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा। तुम वोटरों के भरोसे में पहले भी नहीं था। मैं चुनावतंत्र का सच्चा रक्षक हूं। अपने वोटों की व्यवस्था मैं कर लूंगा। परमात्मा ने मुझे इसी काम के लिए भेजा है। तुम लोग वोट न डालो, वोट अपने आप परमात्मा डलवायेंगे। सब सैट है। लोग काम पर लगे हैं। कानून छुट्टी पर है। वो समर वेकेशन पर जा चुके हैं। वो नहीं लौटेंगे। जब तक अपनी गद्दीनशीनी नहीं हो जाती। बाकी अपना केंचुआ तंत्र काम पर मुस्तैद है। वो भी कह रहे हैं जो हमको लाए हैं हम उनको लाएंगे।
डोरीलाल गद्दीप्रेमी
01 06 2024
2024 बैच के भगोड़े
बंधुओं जैसा कि हम सभी को ज्ञात है कि इस चुनाव में हमारा और हमारी नई पार्टी का जीतना तय किया गया है। सारी व्यवस्थाएं कर ली गई हैं तभी चुनाव की तारीखें और कार्यक्रम की घोषणा की गई। कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर दिये गये हैं।, पूरे तंत्र को विश्वास में लेकर ही यह लोकतांत्रितक प्रक्रिया प्रारंभ की गई। यह उचित ही है कि हमें हमारे नए बॉस ने आदेश दिया कि अबकी बार चार सौ पार। तो हमने यह नहीं पूछा कि कैसे ? इस नए वातावरण में हम धीरे धीरे एडजस्ट हो रहे हैं। सीख रहे हैं कि कोई भी नारा दिया जाए उसे लगाने लग जाओ। तर्क मत करो। तर्क की बातें कालातीत हो गईं।
बंधुओं आज इस मंच से मैं ये कहना चाहता हूं कि हमारे त्याग और बलिदान को इतिहास में लिखा जाएगा। वर्तमान में जरूर हमें लोग अपशब्द कह रहे हैं। गद्दार, धोखेबाज, वगैरह कह रहे हैं। उन्हें कहने दीजिए। हम विभीषण की महान परंपरा के वाहक हैं। अपने राजा को धोखा देने के कितने ही उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। दुनिया में हर मौके पर मनुष्य ने मनुष्य को धोखा दिया है। यदि हम धोखा नहीं देते तो कोई और देता। हम तो ये जानते हैं कि हमारे साथ कितने ही लोग धोखा देने को तैयार थे मगर कुआं पास आते ही पीछे हट गए और हमें कुएं में ढकेल दिया।
धोखा देना मानव मन की विशेष स्थिति है। इसे अवगुण समझा जाता है मगर सोचिये कि अंततः इससे प्रजा का भला होता है कि नहीं ? यदि चन्द्रशेखर आजाद पार्क में बैठे हैं यह सूचना अंग्रेजों तक मुखबिर ने न पंहुचाई होती तो न चंद्रशेखर आजाद मारे जाते न गांधी जी को देश आजाद कराने का मौका मिलता। यदि भगतसिंह और साथियों के विरूद्ध फणीन्द्रनाथ मजूमदार ने गवाही न दी होती तो भगतसिंह वगैरह को फांसी ही न होती और गांधी जी इन लोगों के कारण देश को आजाद न करवा पाते। तो जो होता है अच्छे के लिए होता है। हमने यदि अपनी पार्टी को धोखा दिया और ऐन समय में छोड़ दिया तो ये कोई छोटा मोटा त्याग नहीं है। अपनों को छोड़ गैरों को गले लगाना कोई हंसी खेल है ? कितना दर्द होता है हम सब जानते हैं। यह बात कचोटती तो रहती है कि हमने अपनी पार्टी को घोखा दिया। अपनों को धोखा दिया। आज नहीं तो कल हम इस दुख को भूल जाएंगे और नए सिरे से इस पार्टी को धोखा देने के लिए तैयार हो जाएंगे। जिन्हें ये गलतफहमी है कि हम लोग किसी सिद्धांत से बंधे हैं वो अपनी गलतफहमी दूर कर लें। हम जैसे आ सकते हैं वैसे जा भी सकते हैं। गमछे दोनों पार्टियों के पास हैं जो चाहे वो पहन ले।
अब आज की बैठक के मुख्य एजेंडे पर बोलना चाहूंगा। जब हम लोग इस पार्टी में आए तो इस पार्टी को हमारी कोई जरूरत नहीं थी। मगर उसके बाद भी हमें इस पार्टी ने आने दिया। हमें गले लगाया। हमें पट्टा भी पहनाया। इसके लिए हम उनके आभारी हैं। हम सभी जानते हैं कि हम सब अपने अपने स्वार्थ से इस पार्टी में आए हैं। किसी को अपना धंधा बचाना है किसी को अपना मुकदमा निपटाना है किसी को ठेका चाहिए तो कोई को अपना पद बचाना है। यदि आज नहीं कमाया तो कल भगवान को क्या मुंह दिखाएंगे। यदि इस पार्टी में हम पर कोई विश्वास नहीं करता, हमें दोगला समझता है तो बिलकुल बुरा न मानें और अपने लक्ष्य के प्रति सजग हों।
आज हालत ये है कि हम लोग इस पार्टी में हॉल के बाहर उतारे गए जूते चप्पलों के बीच रखे गये हैं। वैसे तो हमें किसी सम्मान की उम्मीद नहीं है परंतु अपमान की भी सीमा होना चाहिए। इस पार्टी का कोई भी नेता आता है तो हमें झंडे लेकर नेता के पैर पड़ने के लिए खड़ा करवा दिया जाता है। नेता से परिचय में भी यही बताया जाता है कि ये इसी 2024 बैच के भगोड़े हैं। कई लोग तो जिस दिन से इस पार्टी में आए हैं घर से बाहर ही नहीं निकले। उन्हें शर्म आ रही है। इतनी शर्म बची थी तो पार्टी बदली ही क्यों ? अब समय आ गया है कि हम सब पहले दर्जे के बेशर्म बनें और जिस काम के लिए इस पार्टी में आए हैं उसे प्राप्त करें। हमें अपने अपने लक्ष्य हासिल करना होंगे। यदि हम समय पर नहीं चेते तो मौका हाथ से निकल जाएगा। मैं कहना चाहता हूं कि हमारे कई बंधु भीड़ में जबरन दल बदल कर इस पार्टी में आ गए हैं। उनका नाम एक बार पेपर में आ गया फोटो छप गया वही बहुत है। ये लोग चुप रहें और हम सक्रिय लोगों को अपने लक्ष्य हासिल करने दें।
बहरहाल आज जरूरत इस बात की है हम उस पार्टी के भूतपूर्व लोग अपना संगठन बनायें और उसे मजबूत करें। आज जैसी हवा चल रही है और हमारी भू पू पार्टी के लोग लगातार इस पार्टी में आ रहे हैं और ये लोग भी बिना सोचे समझे माल खरीद खरीद कर गोदाम में रखे जा रहे हैं तो एक दिन हम लोग इस पार्टी में उस पार्टी के भूतपूर्व लोगों का एक विशाल संगठन खड़ा कर सकते हैं। आजादी से पूर्व कांग्रेस के अंदर सोशलिस्ट पार्टी इस तरह रह चुकी है। इस पार्टी में एक अच्छी बात ये है कि इस पार्टी में अब दिल्ली के दो नेताओं का राज है। और किसी की कोई औकात नहीं है। मुख्यमंत्री से लेकर सरपंच तक वही बनाते हैं और सब उन्ही के नाम पर चुनाव जीतते हैं। ऐसे में इस पार्टी में भी अपना भविष्य उज्जवल है। हमें संगठित रहना है। हमें ये नहीं भूलना है कि हम जिस काम से आए हैं उसे जल्दी से जल्दी निपटाना है। हमने पार्टी बदलने की भरपूर कीमत वसूली है। हम अच्छी कीमत पर बिके हैं मगर अब जिसको जो ठेके लेना हो, जो कमीशन खाना हो, जो पद लेना हो जल्दी जल्दी निपटा डालो। कोर्ट के मामलों में देर लगती है। उन्हें जितनी जल्दी हो सके, निपटाओ।
आजकल जो खबरें आ रही हैं वो ठीक नहीं हैं। चार सौ तो क्या कहो दो सौ पार न हो। यदि ऐसा हुआ तो हमें अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा। आप लोग पुरानी पार्टी के अपने अपने झंडे बचाकर रखना। कभी भी जरूरत पड़ सकती है।समय बहुत कम है काम बहुत ज्यादा है। आज से ही काम पर जुट जाओ। भारत माता की जय।
डोरीलाल पार्टीप्रेमी
14 05 2024
पिस्टल वाला जीत रहा है
डोरीलाल के पास एक महाशय देशभक्ति और देशसेवा का मंत्र लेने आए। डोरीलाल ने उन्हें समझाया कि ये बड़े लोगों के चोंचले हैं और वो इसके चक्कर में न पड़ें पर उसे बहुत जोश था। वो इस काम में लोगों के द्वारा की गई प्रगति से प्रभावित था। उसे लग रहा था कि विकास के क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं। जब वो नहीं माना तो मैंने कहा कि तुम अपनी सीमा तय कर लो। कहां तक जाना है। कितना विकास करना है। क्योंकि विकास के क्षेत्र में आसमान तक जा सकते हो।
जब वो नहीं माने तो मैंने उन्हें कहा कि देशसेवा का सबसे बड़ा काम है समस्याएं पैदा करना। जनता के लिए खूब समस्याएं पैदा करो। इतनी करो कि जनता त्राहि त्राहि करने लगे। रोज नई समस्या पैदा करो। आज जनता एक समस्या को किसी तरह सुलझाकर सोये तो उसी रात दूसरी समस्या पैदा कर दो। समस्याओं का अम्बार लगा दो। जनता जब तुम्हारे पास आए तो बताओ कि ये समस्याएं नहीं हैं ये समस्याओं का हल है। ज्यांहिं दूसरी समस्या आती है पहली आदमी भूल जाता है दूसरी को हल करने में लग जाता है। इसी तरह दिन गुजरते जाते हैं और जनता ये भूल जाती है कि वो इस धरती पर जीवन जीने के लिए आई है। वो धीरे धीरे अपना जीवन भूलकर समस्याएं हल करने में लग जाती है।
डोरीलाल जी ये तो हुई देशसेवा अब देशभक्ति के बारे में भी बता दीजिए। मैंने कहा कि समस्याओं को हल न करना ही सच्ची देशभक्ति है। ये एक कला है। इसे ही तुम्हें सिद्ध करना होगा। जब समस्याएं हल न होंगी तो अंत में जनता परेशान होकर तुम्हारे पास आएगी। हमारी समस्याएं हल करो। तब तुम उन्हें कैसे समझाते हो यही कला है। तुम्हें समझाना होगा कि आज जो समस्या है कल होने वाली समस्या उसका हल है। कल जो समस्या होगी परसों वाली समस्या कल वाली समस्या का हल होगी। तुम्हें समझ नहीं आया होगा। यही तुम्हारी समस्या का हल है। जब तुम्हें मेरी बात समझ नहीं आई तो आम जनता को कैसे समझ आएगी। अब तुम्हें लगेगा कि आम जनता भले ही मूर्ख बन जाए मगर खास जनता यानी पढ़े लिखे लोग तो समझ जाएंगे पर दरअसल ऐसा होता नहीं है। आम जनता तो समझने के बाद कुछ बोलती नहीं है मगर पढ़ा लिखा दिन रात चबर चबर करता है। ये परंपरागत मूर्ख है। इसे अशिक्षा मंहगाई बेरोजगारी सब पर गर्व है। पढ़ा लिखा आदमी बहुत ही बड़ा वाला होता है। यदि तुम्हें सत्ता में रहना है तो तुम्हें इसी वर्ग की इस विशेषता को साधना होगा। ये छत में खड़े होकर ताली बजाकर थाली बजाकर गरबा करके गो करोना गो बोलता रह सकता है। जबकि गैर पढ़ा लिखा भूखा आदमी बच्चे को कंधे पर बैठाये महानगर से अपने गांव पैदल चल पड़ता है। फर्क यहीं है।
मगर गुरू जी आखिर एक दिन तो सब समझ जाएंगे कि ये सब क्या चल रहा है ? मैंने कहा कि महान बनने के लिए इतिहास, दर्शन, धर्म, आध्यात्म सभी को समझना और साधना जरूरी है। यदि जनता को मूर्ख बनाना है तो इसके लिए तुम्हें लाखों लोग चाहिए। जो करोड़ों लोगों को मूर्खता में दीक्षित करें। ये तुम कहां से लाओगे। पूरे देश में गली गली लाखों मंदिर हैं। उनमें पुजारी कथावाचक बैठे हैं। ये तुम्हारा काम करेंगे। फिर तुम्हें आदमी के नैसर्गिक गुण की तरफ जाना होगा। मूर्खता। मूर्खता मनुष्य का नैसर्गिक गुण है। पढ़े लिखे और गैर पढ़े लिखे में एक बुनियादी फर्क ये होता है कि पढे़ लिखे में मूर्खता का जो आत्मविश्वास होता है वो उसे आम लोगों से उसी तरह अलग कर देता है जैसे पानी में घी। तो तुम समझ लो कि तुम बहुत बड़ा काम करने जा रहे हो उसके लिए तुममें विराट क्षमता चाहिए। तुम्हें जनता को समझाना होगा कि तुम दरअसल ईश्वर से बस थोड़ा ही कम हो। और इस धरती के लोग फिलहाल ईश्वर के इसी अवतार से काम चला लें। देखो भाई ये एक पूरा प्रोजेक्ट है। यदि मुझसे पूछने आए हो और अपने प्रोजेक्ट के बारे में वाकई गंभीर हो तो मैं आगे बताऊं नहीं तो चने खाओ और निकल्ललो।
वो पीछे पड़ गया तो मैंने उसे बताया कि देश में करोड़ों लोग हैं। इसमें से अधिकांश गरीब हैं। ये केवल गिनती में हैं। इनको गिनना बंद कर दो। इनका इलाज हमारे पास है। कुछ लोग बहुत कम कमाते हैं मगर बस भूखे नहीं मरते। इनकी चिंता भी छोड़ो। अब बचा खाता पीता वर्ग और अमीर लोग। खाता पीता वर्ग पूरे समय अमीर बनने की फिराक में है। और अमीर लोग की कोई इच्छा नहीं है। वो अमीर बने रहें और उनकी अमीरी बढ़ती रहे यही उनकी कामना है। उनको हमारी जरूरत है और हमें उनकी जरूरत है। जैसे सब लोग अपना अपना जॉब करते हैं उसी तरह से हम लोग भी अपना जॉब करते हैं और उसमें अपनी प्रोग्रेस करते हैं। अमीर लोग सामने नहीं आते। वो इतने दयालु होते हैं कि उनके बदले की प्रशंसा भी हमें ही मिलती है। उनका विकास होता है और हमें उस विकास का श्रेय मिलता है। ये पूरी दुनिया में होता है। कोई हमारे देश की बात नहीं है। हम जैसे लोग पूरी दुनिया में हैं जो पर्दे के पीछे छुपे अमीरों के लिए काम कर रहे हैं। ज्यादा खुलकर बताऊं क्या ?
मगर इतना बड़ा टास्क पूरा होगा कैसे ? मैंने कहा कि कुछ प्रतिभा आपके अंदर भी होना चाहिए। प्रतिभा का हमेशा से हमारे देश में आदर होता रहा है। राजनीति मूर्ख बनाने की कला का ही दूसरा नाम है। जनता मूर्ख बनने को तैयार खड़ी है। कौन जीतता है ये दौड़ में शामिल लोगों पर निर्भर करता है। जो अकल की बात करेगा वो हारेगा। मूर्ख बनाने की प्रतियोगिता चल रही है। एक वीडियो कार्टून आया है जिसमें चार लोग दौड़ रहे हैं। एक दौड़ाक के पास दौड़ शुरू करने वाली पिस्टल भी है। वो दौड़ कर आगे निकल जाता है। फिर वो दौड़ शुरू होने की पिस्टल चलाता है। तब बाकी लोग दौड़ना शुरू करते हैं। पिस्टल वाला दौड़ाक अपने पीछे आने वाले दायीं बायीं ओर के दोनों दौड़ने वालों की टांगों पर गोली मार देता है। दौड़ खत्म होने के पहले ही एंड पाइंट वाले फीता लिए लड़के दौड़ाक की ओर दौड़ पड़ते हैं। पिस्टल वाला जीत जाता है।
पिस्टल वाला जीत रहा है।
डोरीलाल पिस्टल प्रेमी
06 05 2024
जो कायर हैं वो कायर ही रहेंगे
देखिये मेरे अंदर अचानक परिवर्तन हुआ है। एक दम जादू के जैसा। रात को जब मैं सोया तो मैं बिलकुल नारमल था। इतना नार्मल था कि मैं कांग्रेसी था। मैंने राहुल जी का एक ट्वीट भी किया। फिर मैं सोने चला गया। गहरी नींद में सोया। रात में सपने देखे। सुबह उठा तो मुझे एकदम एबनार्मल लगने लगा। मुझे लगा मैं गलत हूं। मुझे सही हो जाना चाहिए। मुझे दिखना बंद हो गया। मेरी दुम टांगों के बीच में घुस गई। उसी समय मुझे लगने लगा कि मैं अब तक देश के विकास के विरूद्ध था। मैं देशद्रोही था। मैं सनातन विरोधी था। अचानक मेरे अंदर परिवर्तन होने लगा। मैं तेजी से भगवा मफलर लेने दौड़ने लगा। पास के ही मंदिर में मुझे मफलर मिल गया। मैं तुरंत भाजपा में चला गया। अब मैं मिमियाने लगा हूं। अब मै सिंह नहीं रहा। अब मैं लोमड़ी हो गया हूं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।
मगर आपने सोचा तो होगा ?
सोचने का काम हमारा नहीं है। हम हुक्म के गुलाम हैं। हमें सोचा हुआ मिलता है। वही हमारी खुराक है। मैं आपको बताऊं कि रात को जब मैं सोया तो मेरी बुद्धि मेरा दिमाग मेरे पास था। रात को शायद खोपड़ी खुली रह गयी और दिमाग कहीं इधर उधर गिर गया। तब से सोचने समझने की शक्ति से महरूम हूं।
मगर आपके भाजपा में जाने का कारण क्या था ?
देखिये भाजपा में जो जाता है वो उस कारण से जाता है जो बताया जा नहीं सकता। असली कारण तो गोपनीय रहता है। इसलिए भाजपा में जाने का कारण भाजपा खुद बताती है। मेरा वो कागज खो गया है। फिर भी मैं आपको बता सकता हूं कि पहला तो ये कि मुझे मोदी जी के नेतृत्व और नीतियों पर पूरा भरोसा है। दूसरी बात ये है कि राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का न्यौता कांग्रेस ने ठुकराया उससे मैं बहुत आहत हुआ। और तीसरा ये कहना है कि हम सनातन का विरोध नहीं सह सकते।
ये जो आपने कारण गिनाये इनका क्या मतलब है ?
मतलब अतलब न पूछिये। बड़े बड़े प्रोफेसर लोग यही कारण गिना रहे हैं फिर हम तो खिलाड़ी ठहरे। हमें तो लिख कर दिया गया है। सो हम कह रहे हैं। इतनी बुद्धि होती तो वहीं कांग्रेस में न रहे आते। देखो जी साफ बात है। आदमी अपना जमीर बेचता है तो कोई कारण तो होगा। पहला होता है लोभ लालच। ये किसी भी चीज का हो सकता है। दूसरा है डर। भय बिनु होत न प्रीति। हमें डर लगा। हम डर गये। तीसरा होता है ब्लैकमेल। चौथा होता है गुंडों से कौन नहीं डरता। आज हमारे देश में सत्ताधारी दल और ईडी, सीबीआई, इन्कम टैक्स पुलिस वगैरह समानार्थी शब्द हैं। छापा ईडी मारती है और प्रेस कान्फ्रेंस भाजपा करती है। न्याय की हालत ये है कि जज का नाम सुनकर लोग निर्णय बता देते हैं। तो कारण तो गये चूल्हे में। काम धंधा बंद हो जाए। जेल जाना पड़ जाए। बदनामी हो जाए। इससे अच्छा भाजपा में चले जाओ। आपको मालूम है जी एक झूठा मुकदमा आपके ऊपर लग जाए न तो अदालत वकील केस जमानत जेल करते करते घर द्वार जमीन जायदाद सब बिक जाता है।
आपको शर्म नहीं आई। अभी आप ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ थे। महिला पहलवानों की लड़ाई में शामिल थे।
शर्म किसको आती है ? साफ साफ बिक जाते हैं, साफ साफ झूठ बोलते हैं उनको कोई शर्म है ? महिला पहलवानों पर इतने अत्याचार हुए न अत्याचार करने वालों को शर्म आई और न अत्याचार देखने वालों को शर्म आई। केस दर्ज कराने में तेल निकल गया। मगर अत्याचारी के साथ कितनी मजबूती से खड़ी रही सरकार। और आम जनता ? उसकी तो बात न करो। हाथरस कठुआ सब भूल गये। कौन खड़ा हुआ उन लड़कियों के साथ ? गांधी के हे राम वाले रातों रात नाथूराम के साथ जा खड़े हुए और शर्म न आई तो मुझे क्यों आए। हां हम लोग बेशर्म हैं और बेशर्म रहेंगे। क्या बेशर्म हुए बिना दलबदल किया जा सकता है ?
अब दलबदल के बाद क्या कर रहे हैं ?
क्या करना है? हमें ये करना है कि हमें कुछ नहीं करना है। हमें गोदाम में डाल दिया गया है। हम जैसे बहुत सारे डले हुए हैं। हम घर से बाहर निकलेंगे तो लोग हमारे उपर थूकेंगे। तो हम गोदाम में रहेंगे। चुनाव के बाद हमारा कोई उपयोग नहीं रहेगा। तब हम देखेंगे कि किस लायक बचे हैं। हममें से कई लोग तो घरों में गुमनाम पड़े थे। वो जहां थे वहां भी किसी काम के नहीं थे। उनका ठीक रहा। उनने दलबदल किया तो उनका नाम अखबार में आ गया। लोगों ने याद कर लिया कि अच्छा ये अभी भी है। जो पंच और वार्ड मेम्बर नहीं बन सकते, उन्हें बड़े नेता कह दिया गया। हम लोग ताश की गड्डी के जोकर हैं। जिन्हें खेल से पहले अलग करके डिब्बे में डाल दिया गया है।
आप आज अपना क्या मूल्यांकन करते हैं ?
हम लोग माल (प्रोडक्ट) के ऊपर लगाए जाने वाला रैपर हैं। यदि माल घटिया हो तो रैपर अच्छा होने से बिक जाता है। दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। तो हमारे कारण कुछ दिन तक घटिया माल अच्छे दाम पर बिक जाएगा। फिर हमारा वही होना है जो रैपर का होता है। कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाएगा। हमारा जीवन तब तक का है जब तक माल खरीद न लिया जाए और ग्राहक हमें कचरा मानकर फेंक न दे। फिर भी हम खुशकिस्मत हैं कि हमें कम से कम रैपर लायक तो समझा गया। इसके लिए हम माल का शुक्रिया अदा करते हैं।
हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आए कभी तो मत रोना
डोरीलाल सत्यप्रेमी
12 04 2024
क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?
जुम्मन की खाला ने अलगू चौधरी से पूछा था ’क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ? ये सवाल आज देश के हर नेता, वकील, जज, व्यापारी, पुलिस, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधान मंत्री, बड़े अधिकारी से लेकर पटवारी तक से पूछा जा रहा है। बोलो भाई क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ? सब बड़ी उलझन में हैं। यूं चुप सी क्यां लगी है अजी कुछ तो बोलिये ? बड़े बड़े लोगों का मामला है। मंत्री संत्री सेठ धन्ना सेठ पूंजीपति सब एक ओर हैं। बड़े बड़े अखबार वाले हैं। वकील न्यायाधीश सब एक ओर हैं। बड़े बड़े व्यापारी हैं। बड़े बड़े धर्माचार्य हैं। अब परीक्षा की घड़ी आ गई है। एक ही सवाल पूरी धरती और आसमान में घूम रहा है और गूंज रहा है - क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?
अब समझाया जा रहा है कि आज का समय बदल चुका है। ईमान की परिभाषा बदल चुकी है। ईमान भी बदल चुका है। उम्मीद बहुत कम है। ईमान की कीमत इतनी कम कभी न रही। अब ईमान की कोई पूछ परख नहीं रही। काहे का ईमान। जनता ने भी नई परिभाषा को स्वीकार कर लिया है। ईमान का मतलब है जिसमें तुम्हें फायदा हो। जिससे तुम्हारे दुश्मन का नुकसान हो। इतनी नई और सरल परिभाषा आ जाने से बहुत सुभीता हो गया है। आप कुछ भी कर सकते हैं और आपके ईमान पर कोई सवाल नहीं उठ सकता।
ईमान के मामले में शर्मा हया का पर्दा या दीवार जो भी थी, वो पर्दा हट गया दीवार ढ़ह गई और उसकी जगह एक साफ सुथरी समतल जमीन बन गई। उस पर चमचमाते मंहगे टाइल्स लग गये हैं जिनमें लिखा हुआ है सत्यमेव जयते। उसे कचरते हुए देश आगे बढ़ रहा है। ईमान के आगे बे कब लग गया और ईमान कब बेईमान हो गया ये डोरीलाल को अच्छे से पता है। पता आपको भी है मगर आप बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कर रहे हो। आप अमृतकाल का अमृत पी रहे हो। ये अमृत विकास के लिए दिए जा रहे ठेकों में, विकास की दलाली में और विकास को ब्लैक में बेचकर प्राप्त हो रहा है।
आम इंसान को ईमान और न्याय दीवाने आम में मिलता था। दीवाने आम मिट गया। जैसे रेलवे का जनरल डिब्बा मिट गया। जरूरत ही नहीं रही। अब किसी जनरल आदमी को कहीं जाने की जरूरत नहीं रही। जब भूखों मरना है तो जहां रह रहे हो वहीं मरो। घर से सैकड़ों मील दूर जाकर भूखे मरने से ज्यादा अच्छा है कि तुम अपनी जन्मभूमि में ही भूखे मरो और स्वर्गारोहण करो। तुम्हें मालूम ही होगा कि जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है। हम लोग देश में इतने सालों से शासन कर रहे हैं। हमें मालूम है कि जिन्हें अपने गांव में खाने को नहीं मिलता वो धोखा देकर सैकड़ों मील दूर चले जाते हैं। काम मिलने का बहाना करके। फिर वहां मर जाते हैं। ये धोखाधड़ी अब आम हो गई है। शासन इस तरह के आवागमन पर कड़ी नजर रखे है। इन्हीं लोगों ने करोना के समय सैकड़ों मील पैदल चलकर भूखों मरकर शासन को बदनाम किया था।
खास लोगों को ईमान और न्याय दीवाने खास में मिलता था। दीवाने आम मिट गया पर दीवाने खास फलफूल रहा है। अब देश में दीवाने खास ही चारों ओर पसरा हुआ है। वहीं से राज काज चलता है। खास खास लोग दीवाने खास में बैठ कर राज कर रहे हैं। सबसे खास आदमी तख्ते ताऊस में बैठता है। ये कुछ खास लोग देश के हर खासो आम की जिन्दगी का फैसला करते हैं। खास आदमी तब ही खास रहता है जब उसके सामने आम आदमी गिड़गिड़ाए। एड़ियां रगड़े। जान की भीख मांगे। न्याय की गुहार लगाए। खास आदमी के पास दौलत है महल है ऐशो आराम है। उसे ये हमेशा चाहिए। उसे ये हर समय बढ़ चढ़ कर चाहिए। इसके लिए आम आदमी का मरना जरूरी है। जब आम मरेगा तभी खास जियेगा। आम लोग बहुत हैं। उनमें से कुछ मर जाएं तो ये एक तरह से उनके लिए अच्छा ही है। मगर खास आदमी नहीं मरना चाहिए। उसका पेट भरा रहना चाहिए। उसके पास पेट के अलावा कई एडीशनल पेट हैं। उनमें भी भरता जाता है। उसका पेट कभी फटता नहीं।उसे बड़े पेट की बीमारी है। वो ठीक नहीं हो सकती। इलाज केवल एक है उसका पेट हमेशा भरता रहे। इसके लिए आम आदमी का पेट खाली रहना जरूरी है।
गरीबी की दीनता का वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ते हैं। गरीब के बाप दादा परदादा सभी गरीब थे। वे गरीब पैदा होते हैं। और गरीब मर जाते हैं। वे जब तक रहते हैं केवल जीवित रहते हैं। वो मर न जाएं और काम करते रहें इसके लिए उन्हें थोड़ा बहुत खाना कपड़ा मिलता रहता है। वो जानते हैं कि उन्हें मेहनत करना है तब उन्हें खाना मिलेगा। वो जानते हैं कि जिस दिन वो बोलेंगे मारे जाएंगे। उन्हें बताया जाता है कि तुम इस जन्म में इसलिए गरीब हो क्योंकि पिछले जन्म में तुमने बहुत पाप किए थे। तुम यदि इस जीवन में चुपचाप भूख गरीबी सहते सहते मर जाओगे तुम सीधे स्वर्ग जाओगे। कभी कभी उन्हें भंडारे में खाना खिलाया जाता है और कहा जाता है कि तुम गर्व करो तो वे गर्व कर लेते हैं।
अब समझाया जा रहा है कि अपना सोचने का तरीका बदलो। यदि बिगाड़ करोगे तो ठोके जाओगे। इसलिये चुप रहो। चुप्पी से ज्यादा मीठा कुछ नहीं। चुनाव के रंगमंच पर नाटक चल रहा है। अलग अलग अभिनेता आ रहे हैं। अपना अपना किरदार निभा रहे हैं और जा रहे हैं। जनता एकटक देखे जा रही है। और चुप है। जनता के मन में एक सवाल है - इस नाटक में वो कहां है ? उसकी चर्चा तो हो ही नहीं रही। वो नाटक को केवल देख सकता है। वो उसमें रोल नहीं कर सकता। वो केवल एक मूक दर्शक रह सकता है।
तो अंत में अपना ग्रहण करने से पहले आपसे इतना ही पूछता हूं
क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?
डोरीलाल ईमानप्रेमी
31 03 2024
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