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Wednesday, 31 December 2025

जाएं तो जाएं कहां ?


डोरीलाल को समझ नहीं आ रहा है कि जाएं तो जाएं कहां ? काफी लोग तो देश को छोड़कर जा चुके हैं। इस बार संसद में बताया गया कि पिछले 10 साल में 18 लाख लोग देश की नागरिकता को छोड़ कर जा चुके हैं। हर साल 2 लाख लोग देश की नागरिकता का त्याग कर रहे हैं। इन्हें देश में कोई आशा की किरण नजर नहीं आती। ये खाते पीते लोग हैं। इन्हें कहीं भी काम मिल जाएगा, नागरिकता मिल जाएगी। हमें अपना देश प्यारा है। हम कहीं नहीं जाएंगे। हमें हमारे देश में कोई काम नहीं है तो विदेश में क्या मिलेगा। 

अब भई ऐसा है कि सब कोई अपना अपना देखो। अब सरकार कहां तक करे ? पढ़ना है तो पैसे का जुगाड़ करो और प्राइवेट में पढ़ो। सरकारी स्कूल कॉलेज के भरोसे न रहो। चाहे प्राथमिक शिक्षा हो चाहे उच्च शिक्षा हो। चाहे स्कूल हो या कॉलेज या यूनीवर्सिटी। हमने रेगुलर शिक्षक रखना बंद कर दिए। संविदा और अतिथि के सहारे उच्च शिक्षा हो रही है। इसलिए तकनीकी शिक्षा इतनी उच्च हो गई है कि आई आई टी रूड़की में अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन हो रहा है जिसमें देश विदेश के 150 वि़द्वान, संत और शोधकर्ता भारतीय ज्ञान परंपरा पर विचार विमर्श करेंगे। आधुनिक शिक्षा को रामायण से जोड़ा जाएगा। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। कुछ कहने से तूफान उठा देती है दुनिया। आई आई टी कानपुर में कांवड़ यात्रा निकल रही है। कांवड़ यात्रा के तकनीकी और औद्योगिक पक्ष पर अनुसंधान किया जा रहा हैगा।

वैसे भी आधुनिक शिक्षा गुलामी के दिनों की याद दिलाती है। ये मैकाले के कुकर्मों का फल है। मैकाले का मिटाना है। तो पूरी शिक्षा को ही मिटा दो। ऐसी गुलामी की शिक्षा पद्धति से तो अनपढ़ रह जाना अच्छा है। हमारे पास ज्ञान की इतनी लंबी परंपरा है। इसलिए इस शिक्षा के तंत्र को मिटा डालो। जब तक पूरा कबाड़ा न हो जाए रूकना नहीं। हर शिक्षा संस्थान को नष्ट कर दो। जिसको गरज होगी प्राइवेट स्कूल कॉलेज में पढ़ेगा। जिसके पास पैसा होगा पढ़ेगा। बल्कि जिसके पास जितना पैसा होगा उसके हिसाब से पढ़ेगा। सबसे अच्छा है कि विदेशों में चले जाओ, खूब पढाई करो और वहीं बस जाओ। जो भारत में रहेगा उसे वैसे भी पढ़ने की जरूरत नहीं है। हमारे देश में ज्ञान की लम्बी चौड़ी विशाल परंपरा है। हमें कोई पढ़ाने सिखाने की कोशिश न करे। सब लोग पढ़ लिख लेंगे तो मेहनत मजूरी कौन करेगा ? 

कुछ साल स्कूलों कालेजों में नई शिक्षा नीति का बखान करते निकाल दिए गए। नई शिक्षा नीति पर स्कूल कालेज विश्वविद्यालयों में दिन रात सेमिनार हुए। नई शिक्षा नीति के बारे में सब शिक्षकों ने एक दूसरे का बताया। एक जगह जो विषय विशेषज्ञ होता था वो दूसरी जगह वही श्रोता हो जाता था। इसी अदला बदली में काफी दिन कटे। अब नया एजेंडा आया है भारतीय ज्ञान परंपरा का। तो सारे स्कूल कालेज के छात्र और शिक्षक पुरोहितों, कथा वाचकों, प्रवचन दाताओं से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। अद्भुत देश है हमारा भारत।

डोरीलाल से ज्ञान परंपरा के विद्वान बनने के एक प्रत्याशी ने पूछा कि मैं क्या करूं ? मैंने उसे बताया कि हमारा देश विद्वानों का देश है। आजकल चारों ओर ज्ञानी ही ज्ञानी हैं। एक ज्ञानी होने के लिए कुछ खास नहीं चाहिए। आपको संस्कृत के कुछ श्लोक, वेदों और पुराणों के उद्धरण और गीता का ज्ञान बघारना है। इसके अंतर्गत आप कुछ भी बोल सकते हो। जैसे आपने नहीं पढ़ी वैसे ही सामने बैठे में से किसी ने न रामायण पढ़ी है न गीता और न वेद उपनिषद। विद्वान जो भी बोलेगा वो मान लिया जाएगा। सामने बैठे श्रोतागण वहां भक्ति, कर्तव्य भावना और संगठन के आदेश से बैठे हैं। 

विद्वान वक्ता को पूरे मैदान में ड्रिब्लिंग करते हुए बॉल को कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष के गोल पर ले आना है। इसके बाद पूरा खेल आपके कब्जे में होता है। गीता में कहा गया है से बात शुरू करो और फिर जो चाहे कहो। गीता की महानता का बखान करना बहुत काम करता है। इसमें ही काफी समय निकल जाता है। रामायण और रामचरितमानस के उद्धरण इसमें अच्छा बघार लगा देते हैं। इसी में योग और यज्ञ की आहुति से बात बहुत आगे निकल जाती है। इस विषय पर वक्ता से कभी कोई प्रतिप्रश्न नहीं करता न तर्क करता है। एक खुला मैदान होता है। आप अकेले खिलाड़ी होते हैं और एक ही बॉल होती है। चाहे जिस दिशा में बॉल फेंकिये। हर बार चउआ - छक्का पड़ेगा। तो इस तरह से विद्वान बना जा रहा है। जब चारों ओर अपने लोग गले में अपना गमछा डाले बैठे हों और बड़े बड़े पुलिस-प्रशासन के अधिकारी हाथ बांधे खड़े हों तो वक्ता का जोश देखने लायक होता है। 

तो ऐसे ज्ञानी देश में अब वो दिन आ गया है जब दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से निराश और व्यथित होकर महिलाओं ने हाईकोर्ट के सामने प्रदर्शन किया। महापुरूष कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित करने और जमानत देने के विरूद्ध। पीड़िता और उसके साथ गई महिलाओं ने जब इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने की कोशिश की तो भारतीय पुलिस के जवानों ने अधिकारियों के आदेश से प्रदर्शनकारी महिलाओं की आवाज दबाने के लिए देर तक सीटियां बजाईं और इस हरकत को खूब एनजॉय किया। मेरे शहर जबलपुर में एक महिला नेत्री ने एक अंधी महिला का चर्च जाने के अपराध में मुंह नोच लिया। उस नेत्री से किसी ने सवाल नहीं किया। अंधी महिला से सवाल किया। 

   सत्ताधारी चुप हैं। ये जमीं चुप है। आसमां चुप है। देश कलप रहा है। देगची में पानी खौल रहा है। किसी दिन भाप अपनी ताकत से देगची का ढक्कन गिरा देगी।

कैसे कहूं नया साल मुबारक हो ?

डोरीलाल चुप्पी प्रेमी

31 12 2025

Sunday, 14 December 2025

हैप्पी न्यू इयर सोनम वांगचुक

कल तुम्हारी पेशी है। तुम्हें भी मालूम है कि इस पेशी में क्या होगा ? पहले की पेशियों में जो हुआ है उससे समझ आ गया है कि ये पेशियां चलती रहेंगी। तुम्हारा हैप्पी न्यू इयर वहीं जोधपुर में ही होगा। जैसा कि इतिहास बता रहा है कि तुम अभी कई हैप्पी न्यू इयर वहीं जेल में बिताओगे। अस्सी दिन से ज्यादा हो चुके हैं। पिछली पेशी के बारे में अखबारों में ये खबर छपी कि सोनम वांगचुक को 72 दिन जेल में हो चुके हैं। अखबारों में इससे ज्यादा कुछ नहीं छपा। ये 72 या अब 82 दिन तो राष्ट्रीय शर्म के हैं। ये शब्द अब अपना महत्व खो चुका है। किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

पिछली पेशी में सोनम वांगचुक के वकील ने मांग की कि हुजूर सोनम वांगचुक जोधपुर जेल में बंद हैं। एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दिया जाए। सरकारी वकील साहब ने कहा कि हुजूर इससे तो बहुत ही गलत परंपरा शुरू हो जाएगी। हर ऐरा गैरा अपराधी ये मांग करेगा। आप लोग कहां तक सुनेंगे। अखबारों में बस इतना छपा है। हुजूर ने क्या कहा ये नहीं छपा है। इसीलिए ये जघन्य अपराधी जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को बड़ा खतरा है अपना पक्ष रख सकेगा, इसका खुलासा नहीं हो सका है। अगली पेशी की तारीख दे दी गई है। ऐरे गैरे अपराधी के साथ यही सलूक होना चाहिए। किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

आजकल वीडियो में अदालत की कार्यवाही दिखाई देती है। एक विशाल कक्ष है जिसमें 2 कुर्सिंयों में एक ओर न्यायाधीश बैठे हैं। दूसरी ओर एक भीड़ है जिसमें वकील, सहायक वकील, और पीड़ित या उनके रिश्तेदार खड़े हैं। माइक लगे हैं जिसमें बारी बारी से वकील साहबान आकर अपने मुवक्किल का पक्ष रखते हैं। सोनम वांगचुक नाम के अपराधी का मुकदमा उसकी पत्नी गीतांजलि लड़ रही है। वो निरीह घबराई महिला कभी वकीलों को देख रही थी, कभी जज साहबान को। वो हतप्रभ थी। ये बात क्या चल रही है ? वो बहुत उम्मीद से आई थी। सोनम वांगचुक का मुकदमा इस देश के नागरिकों को लड़ना चाहिए। लेकिन लड़ रही है उसकी पत्नी, अकेली। किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

दो तीन पेशियां तो मुकदमा स्वीकार करने में ही निकल गईं। फिर मांग उठी कि सोनम वांगचुक ने अपना बयान लिखा है वो उसे पेश करने नहीं दिया जा रहा। कहा गया कि कर लो पेश। फिर एक दो पेशी में सोनम वांगचुक की पत्नी ने बताया कि उसे जोधपुर में अपने पति से मिलने नहीं दिया जा रहा है। तो कहा गया कि अच्छा चलो मिल लो। ये भी बताया गया कि सोनम वांगचुक को एक अकेले कमरे में रखा गया है। जहां मनुष्य जाति से उसका संबंध समाप्त हो गया है। अदालत ने यह बात भी सुन ली। फिर गीतांजलि वांगचुक ने बताया कि उसके साथ जो लोग आए हैं उन्हें परेशान किया जा रहा है और उनके साथ मारपीट की जा रही है। उनका पीछा किया जा रहा है और उनका जीना हराम है। गीतांजलि जब जोधपुर में पति से मिलने गयी तो उसके चारों ओर पुलिस लगी थी और उसे सीधे जेल ले जाया गया जहां दो आदमी उनके सिर पर खड़े रहे जब वो वांगचुक से मिलीं। वहां से उन्हें सीधे पुलिस के घेरे में वापस ट्रेन में बैठा दिया गया। जोधपुर में नागरिकों से मिलने नहीं दिया गया। भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सब आजाद हैं। मगर किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

सोनम वांगचुक का अपराध क्या है ? उसे क्या करना चाहिए था जो उसने नहीं किया। उसने लद्दाख के लोगों की मांग उठाई जो वर्तमान सत्ताधारी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में उठाई थी। लद्दाख में छठवीं अनुसूची लागू हो। इससे लद्दाख के लोगों को स्वायत्तता मिलती है। इसका उद्देश्य अपनी अनूठी संस्कृति, पर्यावरण, जल जंगल जमीन(जैसे ग्लेशियर) व भूमि अधिकारों की रक्षा और स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से कानूनी/आर्थिक शक्तियां प्राप्त करना है। इस मांग के लिए सोनम ने हर तरह से अपनी बात पंहुचाई। सबसे बड़ी बात कि सोनम वांगचुक वर्तमान सत्ता के साथ रहे। मगर जब छठवीं अनुसूची की मांग नहीं सुनी गई तो उन्होंने सैकड़ों लद्दाखियों के साथ लेह से दिल्ली तक पदयात्रा की। दिल्ली में उनसे कोई नहीं मिला। और वो सारे पदयात्री सड़कों पर पड़े रहे। और किसी को ज्ञापन सौंप कर वापस चले गए। फिर कुछ दिन इंतजार के बाद उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। खुले आसमान के नीचे गिरती बर्फ में पड़े रहे। कोई सुनवाई नहीं हुई। इस बीच लद्दाखियों ने हड़ताल और बंद का आव्हान किया। इसे सोनम वांगचुक ने नहीं किया था। इस आंदोलन में गोली चली। लोग मरे। सोनम वांगचुक ने बार बार शांति की अपील की। भटके नौजवानों को शांति मार्ग अपनाने का आव्हान किया।
इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो गया। इसलिए सोनम वांगचुक जेल में हैं। उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा है। कई पेशी तो इसी में निकल गईं कि बताओ सोनम वांगचुक का अपराध क्या है ? उन पर आरोप क्या है ? सोनम वांगचुक जेल में है किसी को जल्दी नहीं है। न सरकार को, न अदालतों को। मगर वंदे मातरम पर बहस चल रही है। किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

पेशियां चलती रहेंगी। गीतांजलि और उनके साथी दिल्ली की सड़कां पर लुटते पिटते रहेंगे। अब सत्ता को सब बातें पता चल गईं हैं। उसका स्कूल अवैध है। उसे विदेशी धन मिलता है। उसका पाकिस्तान से संबंध है। शायद बुलडोजर स्कूल के गेट पर खड़ा है। किसी को किसी बात से शर्म नहीं आती।

ये सोनम वांगचुक की परीक्षा नहीं है। ये देश की न्याय व्यवस्था की परीक्षा है। ये देश की सत्ता की परीक्षा है। और ये हम सब नागरिकों की परीक्षा है। हमारे चुप रहने की पराकाष्ठा की परीक्षा है।

डोरीलाल शर्म प्रेमी
13 12 2025

न्याय का बैडमिन्टन

डोरीलाल जी, बैडमिन्टन के खेल के बारे में कुछ प्रकाश डालिये।             बैडमिन्टन एक खेल है जिसमें एक कोर्ट होता है। एक या दो खिलाड़ी आमने स...