डोरीलाल जी, बैडमिन्टन के खेल के बारे में कुछ प्रकाश डालिये।
बैडमिन्टन एक खेल है जिसमें एक कोर्ट होता है। एक या दो खिलाड़ी आमने सामने होते हैं। बीच में एक जाली लगी रहती है। इनके बीच में एक शटल काॅक (चिड़िया) होती है। दोनों तरफ से खिलाड़ी चिड़िया को अपने रैकेट से मारते हैं। शटल काॅक जमीन पर गिरना नहीं चाहिए, गिरी तो फाउल। इस तरह चिड़िया इस पार से उस पार आती जाती रहती है। खेल में एक रेफ्री होता है जो स्कोर, फाउल वगैरह बताता है। खेल में कई सैट होते हैं। जो ज्यादा सैट जीतता है वो जीत जाता है। बैडमिन्टन एक मनोरंजक खेल है। इसमें शटल काॅक के अलावा सभी को बहुत मजा आता है।
बैडमिन्टन के खेल का महत्व बैडमिन्टन का खेल केवल अमीर लोग खेलते हैं। गरीब लोग देखने की औकात भी नहीं रखते। जब कोई गरीब अमीर हो जाता है तो वह सबसे पहले बैडमिन्टन खेलता है। जब कोई डिप्टी कलेक्टर, कलेक्टर बनता है तो वो रैकेट खरीदता है और क्लब जाकर बैडमिन्टन खेलता है। बैडमिन्टन खेलने से पता चलता है कि खिलाड़ी का समाज में क्या स्टेटस है। आम लोग क्रिकेट, फुटबाल, कबड्डी, खो खो जैसे गरीबों के खेल खेलते हैं। अमीर लोग लाॅन टेनिस, गोल्फ और बैडमिन्टन खेलते हैं। कमरे में बैठ के ब्रिज खेलते हैं। जब तक देश परतंत्र था तब तक नंगे भूखे लोग राजनीति का खेल खेला करते थे मगर जबसे भारत विकसित हो गया है अब राजनीति भी अमीरों का खेल है। गरीब और पढ़े लिखे का तो पर्चा भरना भी मंजूर नहीं है। महिला का तो बिलकुल भी नहीं। रेफ्री और सत्ता का खिलाड़ी एक तरफ है। रेफ्री ने कह दिया फाउल है। गरीब खिलाड़ी ने बड़े रेफ्री की ओर देखा। बड़े रेफ्री को सांप सूंघ गया। अभी तक बेहोश है। सर्वोच्च कोर्ट ने कहा कि हम बैडमिन्टन कोर्ट के रेफ्री को कुछ नहीं बोल सकते। वो सुप्रीम हैं। वो आदरणीय है। हम उनके सामने कहां लगते हैं। आगे देखो बाबा।
न्याय का बैडमिन्टन न्यायालय और बैडमिन्टन में समानता के कारण न्यायालय को कोर्ट कहा जाता है। कोर्ट में एक ओर जज साहब और दूसरी ओर वकील साहब होते हैं। कभी कभी कोर्ट में दो जज बैठते हैं। बैडमिन्टन में इसे मैन्स डबल्स कहा जाता है। जब महिला और पुरूष मिलकर खेलते हैं तो उसे मिक्सड डबल्स कहते हैं। केस की सुनवाई में जज साहब और वकील साहब के बीच शटल काॅक दोनों ओर से शाॅट खाती रहती है। खिलाड़ी उसे गिरने नहीं देते। शाम को शटल काॅक को सहेज कर आलमारी में रख दिया जाता है। सालों तक जब ये खेल चलता है तो फिर शटल काॅक अपनी मौत आप मर जाती है।
शटल काॅक न्यायालय की आलमारी में करोड़ों शटल काॅक जमा हैं। अपने खेले जाने का इंतजार कर रही हैं। कोर्ट बदलते हैं। खिलाड़ी बदलते जाते हैं मगर शटल काॅक नहीं बदलती। वो कुटती रहती है। शटल काॅक की नियति यही है। वो कुटेगी। हर कोर्ट में कुटेगी और खिलाड़ी खेलते रहेंगे।
डोरीलाल जी अब अपना व्यंग्य रखिये अपनी जेब में और बताइये कि भारत के हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान और बड़े बड़े वकील साहबान लंदन जाकर (कानून और न्याय मंत्रालय के प्रायोजित सरकारी पैसे से और कार्पोरेट पूंजीपतियों के प्राईवेट पैसे से) बैडमिन्टन खेल रहे हैं तो इसमें पाप क्या है ? क्या उन्हें अमीर होते हुए भी बैडमिन्टन खेलने का हक नहीं ?
डोरीलाल ने कहा कि सरकार ने कहा है कि हमारे मंत्री जिनका नाम चीफ जस्टिस के साथ मुख्य अतिथि और उद्घाटनकर्ता के रूप में छपा है वो उस दिन बीकानेर में थे। जो फोटो वीडियो वगैरह दिखाये जा रहे हैं वो हैं असली लेकिन पुराने इवेंट के हैं। लंदन में फोटो खींचने की मनाही कर दी गई है। इवेंट के पोस्टर में प्रायोजक के रूप में न्याय व कानून मंत्रालय और कई कार्पोरेट्स के नाम लिखे हैं। इससे इन्कार नहीं किया गया है। जिनका नमक खाया जाएगा उनका बजाया जाएगा।
जज और वकील साहबान लंदन जाकर बैडमिन्टन खेल कर पुरानी पड़ चुकी परंपराओं और अंधविश्वासों को तोड़ देना चाहते हैं। ये अंधविश्वास है कि जज, वकील और वादी प्रतिवादी आपस में मिल बैठकर ले देकर मामला नहीं निपटा सकते। कानूनी बहसों और कानूनी धाराओं, दृष्टांतों का समय जा चुका है। ये मत भूलिये पूरे विपक्ष को सस्पेंड करके हमने कानून की किताबें निर्विरोध बदली हैं। आज इस हाथ दे और उस हाथ ले वाली प्रेक्टिकल एप्रोच अनिवार्य हो गई है। आज सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज है, कार्पोरेट के अरबों खरबों के मामले फंसे हैं। यदि जज, सरकार, कार्पोरेट सब आमने सामने बैठ जाएं। वकील साहबान बिचैलिए हैं ही, तो सालों का काम मिनटों में निपट सकता है। आखिर आज भी हो तो यही रहा है। पर्दे के पीछे सरकार खड़े होकर निर्णय बता देती है और अदालत निर्णय की घोषणा कर देती है। न्यायाधीशों के निर्णय एक औपचारिकता हो गए हैं। लंदन बैडमिंटन टूर्नामेंट के बाद उम्मीद है कि अब वकील को जज को केवल इतना बताना होगा कि मीलार्ड कल रात बात हो गई। सौदा तय हो गया है या सरकार ने आपसे ये निर्णय देने को कहा है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय ये मनुष्य जाति में नैसर्गिक हैं। न्यायाधीश भी मनुष्य हैं। उसी तरह जैसे संसद सदस्य और विधायक भी मनुष्य हैं। उन्हें समाज से अलग काट कर ईमानदार और निष्पक्ष होने की उम्मीद रखना पाप है। लंदन में सरकार -कार्पोरेट-वकील-न्यायाधीश टूर्नामेंट भारत में सुलभ न्याय की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
जो कुछ करो, पूरी बेशर्मी से करो, खुल्लमखुल्ला करो।
डोरीलाल बैडमिन्टन प्रेमी 15.06.2026 See less






