सुबह उठते ही आम आदमी अपने मोबाइल की ओर लपकता है। वो देखना चाहता है कि आज का टास्क क्या है। वो जल्दी जल्दी सर्च करता है। अहा क्या बात है चार पांच नए संदेश हैं। औरंगजेब, नेहरू, कश्मीर, पहलवान और मणिपुर सभी एक साथ आ गए हैं। वो तुरंत बैठ जाता है। और पहला मैसेज फारवर्ड करता है। फिर दूसरा फिर तीसरा फिर चौथा फिर पांचवा। कभी इस ग्रुप में, कभी उस ग्रुप में। ये करते करते आधा दिन गुजर जाता है। अब वो मुंह हाथ धोने और दैनिक क्रियाओं की ओर आगे बढ़ता है। उसका दिन शुरू हो चुका है। फिर काम करने निकलता है। ऑफिस की टेबिल पर बैठते बैठते उसे याद आता है कि अभी कल के भेजे गए मैसेज फारवर्ड करना बचे हैं। वो काम में लग जाता है। वो देखता है कि उसके मैसेज और लोगों ने भी फारवर्ड कर दिए हैं। पर उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो राष्ट्र की लगातार सेवा करता जाता है।
आज हमारा देश व्हाट्सएप से चल रहा है। ये सही है कि इसने बात फैलाने में क्रांति कर दी है। अच्छी बात और बुरी बात दोनों। पहले तो केवल फोटोशॉप और वीडियो एडिटिंग भर हुआ करती थी पर अब विज्ञान बहुत तरक्की कर चुका है। अब कुछ भी दिखाया जा सकता है और कुछ भी समझाया जा सकता है। बात ये है कि जनता को इस बात के लिए तैयार कर दिया गया है। अब वो सवाल नहीं करती। धीरे धीरे उसे एक सेना में बदला गया है। सैनिक का एक ही काम होता है आदेश का पालन करना और लड़ना। तो जनता अब सवाल नहीं करती। वो आदेश का पालन करती है।
जनता की समय समय पर परीक्षा ली जाती है। ये परखा जाता है कि जनता में कोई जागृति तो नहीं आ रही । वो तर्क तो नहीं करने लगी। कहीं उसे अपना भला बुरा तो नहीं दिखने लगा। तो ऐसी परीक्षाओं से पता चल जाता है कि चिंता की कोई बात नहीं है। बात ये है कि पिछले दस सालों से ये देश इलेक्शन मोड में है। पंचायत चुनावों से लेकर संसद तक हर चुनाव की तैयारी चौबीस घंटे तीन सौ पैंसठ दिन चलती रहती है। इसीलिए परीक्षा भी चलती रहती है। कभी आदेश आता है ताली बजाओ थाली बजाओ तो जनता नाच नाच कर ताली थाली बजाती है। कभी कहा जाता है कि आसमान को मोबाइल की रोशनी से भर दो। तो आसमान जगमगा उठता है। सैटेलाइट से चमकता फोटो आ जाता है। कभी कभी कड़ी परीक्षा भी ली गई। जैसे पेट्रोल डीज़ल के दाम एक सौ दस कर दिए। गैस सिलेंडर 1200 का कर दिया मगर जनता ने चूं नहीं किया उल्टे जो लोग विरोध कर रहे थे उन्हें चुनाव में पराजित किया। आज हालत ये कर दी गई है कि सबसे गरीब आदमी भी जो दो रूपये का सामान खरीदता है वो जी एस टी देता है। यानी देश के विकास में अपना योगदान देता है। मगर विरोध नहीं करता। विरोध की अवधारणा ही समाप्त हो गई। मजदूर संगठन हैं मगर वो सब ताली थाली बजा रहे हैं। उनके व्हाट्सएप ग्रुप देख लीजिए।
बहुसंख्य जनता को शिक्षित किया गया है कि गर्व करो और घृणा करो। इसके लिए जनता को कुछ करना नहीं है। अपने दिमाग को खाली रखना है जो कि ऑल रेडी है। उसमें व्हाट्स एप और फेस बुक या ट्विटर से आए संदेश भरना है। धार्मिक और राजनैतिक घृणा के संदेशों को दिमाग में भर लो और लगातार दोहराते रहो। जब तक घृणा से ओत प्रोत न हो जाओ। इस घृणा की भी परीक्षा ली जाती है। भारत वर्ष में कई स्थानों पर जिन लोगों ने महिलाओं से दुर्व्यवहार किया उनके समर्थन में महिलाओं के जुलूस निकले। इसीलिए क्योंकि अपराधी उनके धर्म या जाति के थे। दंगों में महिलाओं के साथ क्या नहीं हुआ लेकिन बिलकिस बानो के समर्थन में कोई नहीं है और अत्याचारियों का फूल मालाओं से स्वागत हो रहा है। लेकिन जनता को कोई गुस्सा नहीं है। वो गर्व करने और घृणा करने में व्यस्त है।
ये बीमारी किस स्टेज पर है ये तब पता चलता है जब एक सिपाही चलती ट्रेन में बंदूक लेकर घूमता है और डिब्बों में जा जाकर नाम पूछ कर कन्फर्म करता है कि वो यात्री विधर्मी है और फिर उसे गोली मार देता है। कोई इन्हें नहीं बचाता। लोग वीडियो बनाते हैं। देश को समझाया जाता है कि वो तो पागल है मानसिक बीमार है। यही तो डोरीलाल भी कह रहे हैं कि लोगों को घृणा से भर भर कर पागल, दिमागी तौर पर बीमार बना दिया गया है।
आज इस देश में करोड़ों लोग बुजुर्ग, नौजवान, महिलाएं बच्चे इस डर में जी रहे हैं कि उन्हें उनकी जाति के कारण, उन्हें उनके धर्म के कारण मार न दिया जाए। वो धर्म और वो जाति जो उन्हें उस धर्म के या जाति के मां बाप के कारण मिली है। उनने चुनी नहीं है।
ये देश ऐसा नहीं था। इस देश को ऐसा मत होने दीजिए। धर्म और जाति के आधार पर बांट कर वोट मिलेंगे। सत्ता मिलेगी। लेकिन ये देश बचेगा नहीं। यदि फूल के पौधे को जहर से सींचोगे तो फूल नहीं खिलेगा, मुरझा जाएगा। इस प्यारे देश को जहरीला मत बनाओ।
सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यूं है
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है
डोरीलाल देशप्रेमी
13 08 2023
No comments:
Post a Comment