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Wednesday, 6 August 2025

वह तोड़ती पत्थर


                

                भारतीय नारी पत्थर तोड़ रही है। निराला ने उसे इलाहाबाद के पथ पर देखा था। वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर। निराला की प्रसिद्ध पंक्ति है। निराला ने ऐसा क्यां कहा था ? सदियों से भारतीय नारी पत्थर तोड़ रही है। उसके सामने पत्थर का विशाल पहाड़ है जिसे भेदना असंभव है। पर वह इस पत्थर को लगातार तोड़ने की कोशिश कर रही है।

              अभी अभी अदिति शर्मा ने इस्तीफा दे दिया। उसने उसी दिन इस्तीफा दे दिया जिस दिन जिला जज राजेश कुमार गुप्ता को पदोन्नत करके मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में जज बनाया गया। ये लोग कौन हैं ? अदिति शर्मा शहडोल में जूनियर सिविल जज हैं/थीं। उनके वरिष्ठ जिला जज राजेश कुमार थे। अदिति शर्मा उन छः महिला जजों में शामिल थीं जिन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। फिर हाईकोर्ट ने चार को बहाल कर दिया पर अदिति और सरिता चौधरी को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट में महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने बर्खास्त महिला जजों को बहाल किया। अदिति शर्मा ने जिला जज राजेश कुमार गुप्ता पर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। उन्होंने लगातार इस दुर्व्यवहार के विरूद्ध लड़ाई लड़ी। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक गुहार लगाई। पर कहीं कभी कोई सुनवाई नहीं हुई। अदिति शर्मा के आरोप गंभीर थे। उनके आरोपों की न जांच हुई न सुनवाई हुई बल्कि राजेश कुमार गुप्ता का नाम हाईकोर्ट जज के लिए कालेजियम को भेजा गया तब भी अदिति शर्मा ने इसका विरोध किया।

                 अपने त्यागपत्र में अदिति शर्मा ने लिखा “मैं इस संस्था को बिना किसी पदक, बिना किसी उत्सव और बिना किसी कड़वाहट के छोड़ रही हूँ - केवल इस कड़वे सच के साथ कि न्यायपालिका ने मुझे निराश किया। लेकिन इससे भी बदतर - यह खुद ही विफल रही। यह त्यागपत्र खात्मा नहीं है। यह विरोध का एक बयान है। इसे अपने संग्रहालय में एक यादगार के रूप में रहने दें कि मध्य प्रदेश में एक महिला न्यायाधीश थीं जिन्होंने न्याय के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था, और उस व्यवस्था ने उसे तोड़ दिया जिसने इसका प्रबल प्रचार किया था,“ उन्होंने लिखा। गुप्ता की पदोन्नति को “न्याय शब्द के साथ एक क्रूर मज़ाक“ बताते हुए, शर्मा ने कहा कि यह कदम “न्यायपालिका की अपनी बेटियों की सुरक्षा करने में विफलता“ को दर्शाता है और महिला अधिकारियों को संकेत देता है कि “सच्चाई की क़ीमत ख़ामोशी से ज़्यादा भारी होती है।“

               महात्मा गांधी कहते थे कि अन्याय का विरोध न करना और उसे माफ कर देना कायरता है। अदिति शर्मा ने कायरता नहीं दिखाई।

               अब जबकि आरोपी जज को प्रमोशन मिला, अदिति ने कहा कि “संस्था को मेरी नहीं, अपनी साख की चिंता करनी चाहिए थी।“ 28 जुलाई के मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए अपने त्यागपत्र में अदिति ने लिखा-“संस्था ने मुझे नहीं, खुद को विफल किया है। “मैं न्याय मांग रही थी, बदला नहीं। लेकिन जब उत्पीड़क को सम्मान मिला, मैं टूट गई। अब न बहाली, न मुआवज़ा और न ही कोई माफी इन जख्मों को भर सकती है।” अदिति ने कहा कि “मैंने निरंतर उत्पीड़न सहा है, न केवल शरीर या मन का, बल्कि मेरी गरिमा, मेरी आवाज़ और एक महिला न्यायाधीश के रूप में मेरे अस्तित्व का, जिसने बोलने का साहस किया।“

              उल्टा, आरोपित जज को हाईकोर्ट में पदोन्नत कर ’सम्मान का मंच’ दे दिया गया। अदिति ने लिखा “उन्हें न्यायमूर्ति कहा जा रहा है, ये उस शब्द के साथ क्रूर मजाक है।“ उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने न बदले की भावना से, न व्यक्तिगत द्वेष से काम लिया, बल्कि संस्थान की गरिमा को बचाने की कोशिश की। लेकिन जब उस संस्थान ने ही उन्हें ठुकरा दिया, तो वह अब ‘एक पीड़ित, एक महिला और एक इंसान’ के तौर पर पद छोड़ रही हैं।

              शर्मा ने चेतावनी दी थी कि गुप्ता की पदोन्नति “कॉलेजियम प्रणाली के ऊपर एक लंबी, काली छाया डालेगी“ और बाकी लोग अपने ताकतवर साहबों के खिलाफ शिकायत करने से बचेंगे। शर्मा ने अंत में लिखा, “इस पत्र को उन फाइलों में जगह दो, उन गलियारों में फुसफुसाने दो जहां ठंडी चुप्पी छाई रहती है। उन्होंने न्यायपालिका से यह देखने को कहा कि वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करती है जो “सच बोलने का साहस करते हैं।“

               अदिति शर्मा अकेली है। उसके साथ कोई खड़ा नहीं है। उसके बावजूद उसने वो हिम्मत दिखाई जो बड़े बड़े महाबली महापुरूष नहीं दिखा सके। अदिति शर्मा ने अपना अस्वीकृति में उठा हाथ उठा दिया। उसके त्यागपत्र ने पूरी प्रणाली को आईना दिखा दिया। अदिति ने चुपचाप इस्तीफा नहीं दिया। उसने सभी को संबोधित खुला खत लिखा। बहुत सोच विचार कर एक एक शब्द चुनकर उन्होंने अपने पत्र को इतना अर्थपूर्ण बना दिया है कि और किसी बात को कहने की जरूरत न रही।

                 सब चुप हैं। डरे हुए हैं। भारतवर्ष को अब इसकी आदत पड़ चुकी है। पुरूष तो किसी पीड़ित महिला का साथ दें न दें महिलाएं भी महिलाओं के सम्मान के लिए खड़ी नहीं होतीं। जब महिला खिलाड़ी लड़ रही थीं तब भी विश्वगुरू भारत वर्ष की महिलाएं और पुरूष उनके साथ नहीं खड़े हुए। जब कठुआ में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था तो महिलाओं का जुलूस बलात्कारियों के लिए निकला था, लड़की के लिए नहीं। बिल्कीस बानो अकेले लड़ी। आज भी लड़ रही है। उसके साथ तीस्ता सीतलवाड अंत तक खड़ी रही। उसकी भरपूर सजा उसे आज तक मिल रही है। बिल्किस बानो केस में समय से पहले रिहा हुए बलात्कारियों, हत्यारों के सार्वजनिक अभिनंदन में महिलाएं भी शामिल होती हैं।

                  अदिति तुम्हें सलाम। तुमने अन्याय सहने से इन्कार किया। तुमने झुकने से इन्कार किया।

सितम की राह पर रखते चलो सरों के चिराग़ 


के जब तक सितम की स्याह रात चले।

डोरीलाल न्याय प्रेमी

04 08 2025 

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