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Wednesday, 14 May 2025

बुद्धिमत्ता की सीमा होती है

             भय प्रेम को जन्म देता है। भय बिनु होत न प्रीति। मगर घृणा कभी प्रेम को जन्म नहीं देती। वो घृणा को बढाती जाती है। एक दिन घृणा को उस उंचाई पर पंहुचा दिया जाता है जब मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता। सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है। तब उससे कुछ भी करवाया जा सकता है। वो मार काट करता जाता है। उसे बच्चे नहीं दिखते, औरतें नहीं दिखतीं, बुजुर्ग नहीं दिखते। हाथ जोड़ कर जान की भीख मांगते मनुष्य नहीं दिखते। उसे खून पसीना एक कर बनाये घर और आंगन नहीं दिखते। इस घृणा से युद्ध जीते जा सकते हैं। चुनाव जीते जा सकते हैं और लोगों को हत्यारा बनाया जा सकता है। 

               और ऐसा नहीं है कि भारतवर्ष कोई अजूबा है। पूरी दुनिया में यही रीत है। समाज में दुश्मन का निर्माण बहुत परिश्रम से किया जाता है। बहुत मनोवैज्ञानिक खेल है। न एक दिन में ये होता है और न एक दिन में खत्म होता है। सदियों तक ये खेला चलता है। जब से दुनिया में लोकतंत्र ने जड़े जमाई हैं इस खेल का महत्व बहुत बढ़ गया है। लोकतंत्र में वोट लेना होते हैं। लाखों करोड़ों वोट लेना होते हैं। क्या लाखों करोड़ों लोगों को समझा कर वोट लिया जा सकता है ? नहीं। मगर बेवकूफ बनाकर भावनाओं में बहाकर और धर्म जाति के नाम पर इकठ्ठा करके वोट लिए जा सकते हैं। इसलिए मूर्खता एक महा अस्त्र है। इसका शिकार पानी नहीं मांगता। इसका निशाना अचूक होता है। यह सर्वव्यापी है। सर्वनाशी है। सर्व प्रभावशाली है। बुद्धि की सीमा होती है। मगर मूर्खता असीम है। मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए समझदारी इसी में होती है कि मूर्ख को माफ कर दो। उससे बहस मत करो। उसे नहीं मालूम है कि वो मूर्ख है।

                   मूर्खता घृणा की गुरू है। आप घृणा कर ही नहीं सकते यदि आप मूर्ख न हों। होशियारों का काम है आपको घृणा के उस स्तर पर पंहुचा देना जहां तर्क और बुद्धि की बातें करना बंद कर दें। तब आप घृणा के चरम को पा लेंगे। तब आप पर आग पानी भूकंप जैसी दैवी आपदाओं और ज्ञान भरी बातों जैसी मानवीय आपदाओं का कोई असर नहीं होगा। आपके चारों ओर ऐसी कोटिंग चढ़ा दी जाती है कि किसी सद्विचार या सद्बुद्धि की बात तो दूर हवा तक नहीं घुस सकती। आप भक्ति के नशे में चूर रहेंगे और दुश्मन का सृजन कर उसके विध्वंस में लगे रहेंगे। ये दुश्मन विधर्मी, विजातीय, विदेशी कोई भी हो सकता है। आपको जो नारा दिया जाए वही लगाएंगे और जिसकी पूजा करने को कहा जाए उसे पूजेंगे। इन नए भक्तों को एक ड्रेस में एक बाड़े में बांध कर रखा जाता है और एक साथ किसी पर छोड़ा जाता है।  

                       मूर्ख के आत्मविश्वास के बारे में विद्वानों ने बड़ी बड़ी बातें कहीं हैं। कहा गया है कि विश्वास कई प्रकार के होते हैं। उनका अलग अलग प्रतिशत होता है। मगर मूर्खता 100 प्रतिशत होती है। सौ टका। इसलिए ऐसा माना गया है कि एक मूर्ख सौ होशियारों पर भारी होता है। डोरीलाल ने महसूस किया कि एक मूर्ख यदि किसी बैठक में पंहुच जाए तो वह सौ दो सौ लोगों को उलझा सकता है और बैठक को फेल करवा सकता है। बल्कि करवा ही देता है। डोरीलाल ने देखा है कि कभी कभी मौके की ताक में मूर्ख चुप बैठा रह जाता है। मगर उसका वार कभी खाली नहीं जाता। वो बिलकुल अंत में वार करता है। जब सब कुछ तय हो चुका होता है। और लोग उठने उठने को होते हैं तब वो अपने मूर्खता के ब्रहमास्त्र का वार करता है और पूरी बैठक को ध्वस्त कर देता है। एक बार बैठक खत्म हो रही थी। एक महाशय आभार व्यक्त करने आ गए। सामने बैठे एक विद्वान ने अपने सहायक विद्वान से कहा - सल्फास की गोली रखे हो क्या ? तो ऐसा नहीं है कि ये धरती विद्वानों से रहित हो गई है। अभी भी मूर्खता को पहचानने वाले हैं। बस आजकल मौका कम मिलता है।  

                डोरीलाल एक बैठक में ज्ञान बघार रहे थे। कोई सुन नहीं रहा था। मैंने पड़ोस में बैठे अपने मित्र को उकसाया कि कुछ तो बोलो। मैं ही मैं बोला जा रहा हूं। उसने कहा कि जहां मेंढक ही मेंढक टर्रा रहे हों वहां चुप बैठे रहना ही वि़द्वान की निशानी है। मुझे उसका व्यंग्य समझ आ गया। ये दुष्ट मुझे मूर्ख कह रहा है। मैं चुप हो गया। मुझे काफी फायदा हुआ। चुप रहने का फायदा समझ आया। मुझे काफी होशियार होशियार सा महसूस हुआ। मुझे लगा जैसे मैं उस कक्ष से ऊपर उठ गया हूं।

                   मूर्ख तरह तरह के वेश में आता है। बल्कि लाया जाता है। मूर्ख का काम है होशियार के काम आना। वो पंडित के रूप में प्रस्तुत हो सकता है और इतना पांडित्यपूर्ण बातें कर सकता है कि आपको काफी देर से समझ आएगा कि आप मूर्ख द्वारा मूर्ख बनाये जा चुके हैं। आज के प्रगतिशील समाज में मूर्ख वैज्ञानिक के वेश में आ सकता है। अर्थशास्त्री का रूप धरकर आ सकता है। वो वैज्ञानिक या इतिहासकार के रूप में आ सकता है। कभी कभी मूर्ख होशियार के वेश में आता है। तब उसे पहचानना सबसे कठिन होता है। बड़े बड़े होशियार मूर्ख बन जाते हैं। जब वो अपना काम दिखाकर चला जाता है तब समझ आता है कि हम पर क्या गुजर चुकी है।

              डोरीलाल जी अभी वो अपना काम दिखा रहा है और आप होशियार होने की गलतफहमी पाले हुए ताली थाली बजा रहे हैं। 


डोरीलाल मूर्ख प्रेमी

09 05 2023 


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