आज पूरे देश के सारे अखबारों में जस्टिस यशवंत वर्मा की एक ही फोटो के साथ एक ही समाचार प्रकाशित हुआ है। समाचार की ड्राफ्टिंग एक ही व्यक्ति ने की है। हर अखबार ने अपनी न्यूज डेस्क से जारी बताया है। अखबार में प्रथम पेज पर चार कॉलम में प्रकाशित है। एक तरफ विवरण लिखा है। एक तरफ बॉक्स बनाकर गवाहों के बयान लिखे गये हैं। ऐसा क्यों हुआ है? ऐसा इसलिए हुआ है कि आम पाठक अखबार में छपी हर खबर को जस का तस स्वीकार कर लेता है।
अब अखबार पढ़ना एक कला हो गई है। क्योंकि अखबार छापना अब कलाबाजी हो गई है। अब आपको समाचार भर नहीं पढ़ना है समाचार क्यों छापा गया है ये भी पढ़ना है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक तीन जजों की समिति ने जांच रिपोर्ट 4 मई को दे दी थी। ये रिपोर्ट केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के पास थी। फिर आज डेढ़ महीने बाद आज अखबारों में कैसे छप गई ? तीनों में से किसने अखबारों को दी ? आज ही उस रिपोर्ट का खुलासा क्यों किया गया ? डोरीलाल अखबार पढ़ने की कला में थोड़े जानकार हो गए हैं। ज्योंहि आज अखबार में खबर छपी देखी तुरंत समझ में आ गया कि ये खबर क्यों छपी है।
ये खबर इसलिए छपी है कि 17 जून को सुप्रीम कोर्ट के वकील और राज्य सभा के सदस्य कपिल सिब्बल ने एक पत्रकार वार्ता की। उसमें जस्टिस वर्मा के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है उस पर सवाल उठाये। सवाल गंभीर हैं। कपिल सिब्बल ने पूरी घटना पर विस्तार से चर्चा की है परंतु उसका मुख्य स्वर यही है कि केवल शार्ट सर्किट से इतना बड़ा धमाका नहीं हो सकता। फायर ब्रिगेड वालों ने घटना की रिपोर्ट क्यों नहीं की ? यदि नोट मिले थे तो उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं की ? पुलिस आई तो उसने उन नोटों का पंचनामा क्यों नहीं किया ? एफ आई आर क्यों नहीं की ? इलाके की घेराबंदी क्यों नहीं की ? घर वालों को क्यों नहीं बताया कि जहां आग लगी वहां नोट मिले हैं ? विभिन्न चैनलों ने बताया कि पन्द्रह करोड़ रूपये मिले हैं। चार बोरों में भरे थे। पांच सौ के नोट थे। एक भी नोट की जब्ती नहीं है। ये पन्द्रह करोड़ किसने गिने ? ये नोट वहां किसने रखे ? रखे तो आग क्यों लगाई ? अब कहां हैं ? उनकी जब्ती क्यों नहीं की गई ? यदि जस्टिस वर्मा के स्टाफ ने उन्हें रफा दफा कर दिया तो पुलिस ने क्या किया ? एक खोजी चैनल को पूरे 9 दिन बाद जस्टिस वर्मा के घर के बाहर सड़क पर एक जला हुआ नोट मिला। क्या खोज है ?
डोरीलाल का सवाल है-यदि किसी और आदमी के साथ यह घटना घटती तो उस आदमी का क्या हश्र होता ?
जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों से इन्कार किया है। उनका कहना है कि वो एक षडयंत्र का शिकार बनाए गए हैं। उनके पास से कोई नोट नहीं मिला है। उनसे कहा गया कि आप रिटायरमेंट ले लीजिए। उनने कहा कि मैं रिटायरमेंट नहीं लूंगा। मैं इस षडयंत्र के खिलाफ लडूंगा। उनका इलाहाबाद हाईकोर्ट तबादला कर दिया गया। कपिल सिब्बल का कहना है कि जस्टिस वर्मा के सामने मैं अनेक बार खड़ा हुआ हूं। वो एक विद्वान और ईमानदार जज हैं।
कपिल सिब्बल ने कहा कि मंत्री किरण रिजजू कह रहे हैं कि वे विभिन्न दलों के सांसदों से बात कर रहे हैं कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग के बजाय जो तीन जजों की समिति की जांच की जो इनहाउस रिपोर्ट है उसी के आधार पर कार्यवाही की जाए। जस्टिस वर्मा के खिलाफ अब तक कोई महाभियोग की कार्यवाही शुरू नहीं हुई है। जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव के खिलाफ जो महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है उसमें पिछले 6 माह में राज्य सभा सचिवालय 50 सांसदों के हस्ताक्षरों की जांच नहीं कर पाया। इस तरह से वो दिन आ जाएगा जब जस्टिस शेखर यादव अगले साल के शुरू में रिटायर हो जाएंगे। जस्टिस शेखर यादव ने सांप्रदायिक भाषण दिया था। उसकी रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।
कपिल सिब्बल ने कहा है कि ये पूरा मामला न्याय व्यवस्था को लक्ष्य करके उसे बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। लोगों का न्यायाधीशों और न्याय से भरोसा उठ जाए। इसीलिए न्याय व्यवस्था पर लगातार हमले हो रहे हैं। इसका अंतिम उद्देश्य यह है कि जजों की नियुक्ति का अधिकार पूरी तरह से सरकार के हाथ आ जाए और कालेजियम सिस्टम समाप्त कर दिया जाए। जिसके कारण जजों की नियुक्ति में सरकार को पूरा अधिकार नहीं है।
न्याय, न्यायालय और न्यायाधीश पर भरोसा कम होना देश के लिए बहुत घातक है। कानून और न्यायालय ही एक नागरिक को यह विश्वास दिलाते हैं कि यदि वो सही है तो उसके साथ न्याय होगा। उसी के भरोसे वो जन्म जन्मांतर तक मुकदमे लड़ता है। हर भारतीय का जन्म मुकदमा लड़ने के लिए ही हुआ है। जब लड़ते लड़ते अशक्त हो जाता है या पैसा खत्म हो जाता है या मर जाता है तो उसकी अगली पीढ़ी यह जिम्मेदारी निभाती है। मुकदमा लड़ना एक शौक है। एक जुनून है। एक संकल्प है। लगन है। भारतीय आदमी वकील साहब से सलाह लेता है कि उसे मुकदमा लड़ना चाहिए कि नहीं ? उसके बाद उसके अंदर अजस्त्र ऊर्जा का संचार होने लगता है। मुकदमा लड़ने के लिए अस्त्र शस्त्र उठा लेता है। आज मुकदमा दायर कल अपने पक्ष में निर्णय। ये कल कभी नहीं आता। यदि किसी मनुष्य को लगता है कि उसका जीवन निरर्थक है तो वो मुकदमा लड़ने लगता है। उसका जीवन सार्थक हो जाता है। उसके बाद वो मृत्युपर्यंत कर्म ही करता रहता है। रोज शाम को वकील के पास जाता है। दिन में कोर्ट जाता है। वकील साहब को कैंटीन का समोसा खिलाता है।
भारतीय आदमी के मन में ये सवाल उठना बंद हो चुका है कि संसद से सड़क तक, लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जो कुछ हो रहा है क्या वो न्याय है ? तो फिर अन्याय क्या है ?
डोरीलाल मुकदमा प्रेमी
20 06 2025
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