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Monday, 28 July 2025

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले


             पूरे देश का भक्त समुदाय सक्ते में है। जब इस परम भक्त का ये हाल हुआ है तो हमारा क्या होगा ? विभिन्न दलों से आया प्रवासी भक्त समुदाय परेशान है। मतलब कुछ पक्का नहीं है कब साहब गुस्सा हो जाएं और कब छुट्टी हो जाए। विदाई समारोह भी न हो। सीधे गेट आउट। अब भक्त भी दो तरह के हैं। स्थायी और संविदा। स्थायी यानी ओरिजनल। ये कहीं नहीं जाएंगे। वफादार। संविदा यानी अस्थायी, कभी भी धोखा दे देंगे। (ये ऐसी हैं कि वापस पुराने पति के पास जाकर फिर पतिव्रता हो जाएंगी या किसी और घर में बैठ जाएंगी।) नया जमाना आ गया है। वफादार यानी मूर्ख। गद्दार यानी प्रेक्टिकल आदमी। एक काम सौंपो, दो कर देता है। बिकने की कीमत लेता है। पर हमेशा वफादार से ज्यादा बेहतर परफार्म करता है। 

              खबर आई है कि शाम को परम भक्त की तबियत खराब हुई और रात को इस्तीफा हुआ और दूसरे दिन दोपहर को बर्तन भांडे सूटकेस घर से बाहर फेंके जाने लगे। घर में खाना बन रहा था, गैस बंद कर दी, बर्तन खाली कर दिए और कहा बढ़ लो। कल तक तुम थे महामहिम। आज नहीं हो। आज आम आदमी हो। महामहिम को अवैध बस्ती टाइप उजाड़ दिया गया। बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। 

               चारों ओर चुप्पी है। खुद भूतपूर्व महामहिम चुप हैं। प्रधान सेवक चुप हैं। बड़े बड़े बड़बोले मंत्री चुप हैं। ये शोक का काल है क्या ? इतना सन्नाटा क्यों है भाई ? कोई कुछ बोलता क्यों नहीं ? जैसे कुछ हुआ ही नहीं। शाम तक अच्छे भले थे। फिर अचानक अंदर से अंतरात्मा पुकार उठी। उठो वत्स, जान है तो जहान है। तुम्हारी तबियत खराब है। पिछले सालों में तुमने दिल लगाकर दिन रात पार्टी की सेवा की है। पर तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी की है। जमीर नाम की कोई चीज तुम्हारे पास है नहीं। इससे पहले कि देर हो जाए, दौड़ो इस्तीफा दे दो। 

                तमाम प्रवासी भक्तों को एक झटके में अस्तित्ववाद समझ में आ गया। अपनी उपयोगिता बनाए रखो वरना महामहिम का हश्र देख लो। बंगाल में तो कई नेताओं को बहुत जल्दी समझ आ गया और कचरे में फेंके जाने की नौबत आते आते उन्होंने घर वापसी कर ली। साल भर में आना और जाना दोनों हो गया। भारतीय जनता और भारतीय लोकतंत्र इतना लचीला है कि कोई कितना ही बड़ा दलबदलू हो, अपराधी हो, निकृष्ट हो, वो माननीय बना रह सकता है। बेशर्मी अब गर्व में बदल चुकी है। 

                 शाम चार बजे तक तो बिलकुल ठीक थे। अच्छे भले थे। हंस बोल रहे थे। चेहरे से तो नहीं लग रहा था कि तबियत खराब है। पर क्या है कि दिल की परेशानी अचानक खड़ी होती है। एक फोन आ जाए और दिल का दौरा पड़ जाता है। कोई चिठ्ठी आ जाती है, कोई संदेश आ जाता है, कोई बुरी खबर आ जाती है और आदमी की सेहत खराब हो जाती है। पर उनकी सेहत तो इसके पहले भी खराब हुई थी। एक दो दिन अस्पताल में रहे और बाहर आकर सीधे सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देने लगे। इन्होंने स्पीकर पद को नई निचाई प्रदान की है। रसातल में पहुंचा दिया। 

                 देसी जानवर को पाला ही इसलिए जाता है कि वो आज्ञाकारी होता है। ज्योंहि छू बोला वो दौड़ पड़ता है। गेंद फेंको वो दौड़कर उठा लाता है। उसे अंग्रेजी कमांड पसंद आते हैं। इस मामले में देसी नस्ल को विदेशी नस्ल के बजाये बेहतर माना जाता है। देसी कुछ भी खा लेता है। मटन दो तो मटन खा लेगा और लौकी दो तो वो भी खुशी खुशी खा लेगा। नहीं दो तो भूखा रह लेगा। चूं न करेगा। उसे इसी में गर्व महसूस होता है कि वो इतने बड़े मालिक के घर में बंधा है। ऐसे जानवरों को खरीद कर नहीं लाया जाता। ये सड़क पर मिल जाते हैं। ये सीधे चरणों से लिपट जाते हैं। इन्हें दया करके लाया जाता है। आउटहाउस में रखा जाता है। ये घर की और मालिक की रखवाली बहुत अच्छी करते हैं। ये गेट से बाहर निकलकर भी काट खाने को दौड़ पड़ते हैं। इसलिए इनको बहुत उपयोगी माना जाता है। ये बहुउदद्श्यीय होते हैं। इनके नाम भी देसी होते हैं। मोती, कालू, झबरा वगैरह। इन्हें कभी कभी विदेशी नस्ल के पुराने जानवरों के साथ खाना दिया जाता है। उन्हें लगता है कि उनकी बड़ी इज्जत है। सुंदर सुंदर उच्च घराने के जानवर मालिक की गोद में खेलते हैं। पर इन्हें दूर रखा जाता है। ये गेट के पास, चौकीदारों के पास होते हैं। ये कारों में नहीं बैठाये जाते। न कारों से झांकते हुए आम लोगों को दर्शन देते हैं। ये कारों के पीछे चिल्लाते हुए दौड़ भर सकते हैं।

                   जिस दिन इनका काम खत्म होता है, इन्हें जंगल में छोड़ दिया जाता है या जहर दे दिया जाता है। ये लावारिस सड़कों पर घूमते रहते हैं। सबको बताते रहते हैं कि बंगले में क्या क्या होता है। मालिक कितना दुष्ट है। हंटर मारता है। वो तो हम ही थे कि हंटर भी खाते थे और पैरों में लौटते भी थे। फिर भी हमें निकाल दिया। हमें बताया भी नहीं कि हमारी सेवा में कौन सी कमी रह गयी। 

                   यहां इनकी कहानी खत्म हो जाती है। ऊंची नस्ल वाले कहते हैं कि हमें गली सड़क से उठाये इन जानवरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इनकी निष्ठा भरोसे की नहीं होती। ऐसे जिंदगी भर जूठन खाने के लिए जीभ लपलपाते रहते हैं। पर कभी भी धोखा दे जाते हैं। एकाध लात पड़ी तो तुरंत बुरा मान जाते हैं। पहले तो खुद आकर गले में पट्टा पहन लिया। चेन बंधवा ली। पैरों में लोट लिए और अब आत्म सम्मान जाग रहा है। अरे तुम जैसे जानवरों का क्या आत्म सम्मान। हमने जिसके पीछे छू कराया तुम उसके पीछे दौड़े। हमने जिसको कहा तुमने उसको काटा और आज आत्म सम्मान की बात। ये नहीं चलेगा। चलो निकलो यहां से। 

                  ऐसी मौत न मरो कि चार लोग न जुटें। कोई शोकसभा न हो। कोई श्रद्धांजलि न दे। 

डोरीलाल आबरू प्रेमी

 26 07 2025


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