डोरीलाल को समझ नहीं आ रहा है कि जाएं तो जाएं कहां ? काफी लोग तो देश को छोड़कर जा चुके हैं। इस बार संसद में बताया गया कि पिछले 10 साल में 18 लाख लोग देश की नागरिकता को छोड़ कर जा चुके हैं। हर साल 2 लाख लोग देश की नागरिकता का त्याग कर रहे हैं। इन्हें देश में कोई आशा की किरण नजर नहीं आती। ये खाते पीते लोग हैं। इन्हें कहीं भी काम मिल जाएगा, नागरिकता मिल जाएगी। हमें अपना देश प्यारा है। हम कहीं नहीं जाएंगे। हमें हमारे देश में कोई काम नहीं है तो विदेश में क्या मिलेगा।
अब भई ऐसा है कि सब कोई अपना अपना देखो। अब सरकार कहां तक करे ? पढ़ना है तो पैसे का जुगाड़ करो और प्राइवेट में पढ़ो। सरकारी स्कूल कॉलेज के भरोसे न रहो। चाहे प्राथमिक शिक्षा हो चाहे उच्च शिक्षा हो। चाहे स्कूल हो या कॉलेज या यूनीवर्सिटी। हमने रेगुलर शिक्षक रखना बंद कर दिए। संविदा और अतिथि के सहारे उच्च शिक्षा हो रही है। इसलिए तकनीकी शिक्षा इतनी उच्च हो गई है कि आई आई टी रूड़की में अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन हो रहा है जिसमें देश विदेश के 150 वि़द्वान, संत और शोधकर्ता भारतीय ज्ञान परंपरा पर विचार विमर्श करेंगे। आधुनिक शिक्षा को रामायण से जोड़ा जाएगा। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। कुछ कहने से तूफान उठा देती है दुनिया। आई आई टी कानपुर में कांवड़ यात्रा निकल रही है। कांवड़ यात्रा के तकनीकी और औद्योगिक पक्ष पर अनुसंधान किया जा रहा हैगा।
वैसे भी आधुनिक शिक्षा गुलामी के दिनों की याद दिलाती है। ये मैकाले के कुकर्मों का फल है। मैकाले का मिटाना है। तो पूरी शिक्षा को ही मिटा दो। ऐसी गुलामी की शिक्षा पद्धति से तो अनपढ़ रह जाना अच्छा है। हमारे पास ज्ञान की इतनी लंबी परंपरा है। इसलिए इस शिक्षा के तंत्र को मिटा डालो। जब तक पूरा कबाड़ा न हो जाए रूकना नहीं। हर शिक्षा संस्थान को नष्ट कर दो। जिसको गरज होगी प्राइवेट स्कूल कॉलेज में पढ़ेगा। जिसके पास पैसा होगा पढ़ेगा। बल्कि जिसके पास जितना पैसा होगा उसके हिसाब से पढ़ेगा। सबसे अच्छा है कि विदेशों में चले जाओ, खूब पढाई करो और वहीं बस जाओ। जो भारत में रहेगा उसे वैसे भी पढ़ने की जरूरत नहीं है। हमारे देश में ज्ञान की लम्बी चौड़ी विशाल परंपरा है। हमें कोई पढ़ाने सिखाने की कोशिश न करे। सब लोग पढ़ लिख लेंगे तो मेहनत मजूरी कौन करेगा ?
कुछ साल स्कूलों कालेजों में नई शिक्षा नीति का बखान करते निकाल दिए गए। नई शिक्षा नीति पर स्कूल कालेज विश्वविद्यालयों में दिन रात सेमिनार हुए। नई शिक्षा नीति के बारे में सब शिक्षकों ने एक दूसरे का बताया। एक जगह जो विषय विशेषज्ञ होता था वो दूसरी जगह वही श्रोता हो जाता था। इसी अदला बदली में काफी दिन कटे। अब नया एजेंडा आया है भारतीय ज्ञान परंपरा का। तो सारे स्कूल कालेज के छात्र और शिक्षक पुरोहितों, कथा वाचकों, प्रवचन दाताओं से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। अद्भुत देश है हमारा भारत।
डोरीलाल से ज्ञान परंपरा के विद्वान बनने के एक प्रत्याशी ने पूछा कि मैं क्या करूं ? मैंने उसे बताया कि हमारा देश विद्वानों का देश है। आजकल चारों ओर ज्ञानी ही ज्ञानी हैं। एक ज्ञानी होने के लिए कुछ खास नहीं चाहिए। आपको संस्कृत के कुछ श्लोक, वेदों और पुराणों के उद्धरण और गीता का ज्ञान बघारना है। इसके अंतर्गत आप कुछ भी बोल सकते हो। जैसे आपने नहीं पढ़ी वैसे ही सामने बैठे में से किसी ने न रामायण पढ़ी है न गीता और न वेद उपनिषद। विद्वान जो भी बोलेगा वो मान लिया जाएगा। सामने बैठे श्रोतागण वहां भक्ति, कर्तव्य भावना और संगठन के आदेश से बैठे हैं।
विद्वान वक्ता को पूरे मैदान में ड्रिब्लिंग करते हुए बॉल को कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष के गोल पर ले आना है। इसके बाद पूरा खेल आपके कब्जे में होता है। गीता में कहा गया है से बात शुरू करो और फिर जो चाहे कहो। गीता की महानता का बखान करना बहुत काम करता है। इसमें ही काफी समय निकल जाता है। रामायण और रामचरितमानस के उद्धरण इसमें अच्छा बघार लगा देते हैं। इसी में योग और यज्ञ की आहुति से बात बहुत आगे निकल जाती है। इस विषय पर वक्ता से कभी कोई प्रतिप्रश्न नहीं करता न तर्क करता है। एक खुला मैदान होता है। आप अकेले खिलाड़ी होते हैं और एक ही बॉल होती है। चाहे जिस दिशा में बॉल फेंकिये। हर बार चउआ - छक्का पड़ेगा। तो इस तरह से विद्वान बना जा रहा है। जब चारों ओर अपने लोग गले में अपना गमछा डाले बैठे हों और बड़े बड़े पुलिस-प्रशासन के अधिकारी हाथ बांधे खड़े हों तो वक्ता का जोश देखने लायक होता है।
तो ऐसे ज्ञानी देश में अब वो दिन आ गया है जब दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से निराश और व्यथित होकर महिलाओं ने हाईकोर्ट के सामने प्रदर्शन किया। महापुरूष कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित करने और जमानत देने के विरूद्ध। पीड़िता और उसके साथ गई महिलाओं ने जब इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने की कोशिश की तो भारतीय पुलिस के जवानों ने अधिकारियों के आदेश से प्रदर्शनकारी महिलाओं की आवाज दबाने के लिए देर तक सीटियां बजाईं और इस हरकत को खूब एनजॉय किया। मेरे शहर जबलपुर में एक महिला नेत्री ने एक अंधी महिला का चर्च जाने के अपराध में मुंह नोच लिया। उस नेत्री से किसी ने सवाल नहीं किया। अंधी महिला से सवाल किया।
सत्ताधारी चुप हैं। ये जमीं चुप है। आसमां चुप है। देश कलप रहा है। देगची में पानी खौल रहा है। किसी दिन भाप अपनी ताकत से देगची का ढक्कन गिरा देगी।
कैसे कहूं नया साल मुबारक हो ?
डोरीलाल चुप्पी प्रेमी
31 12 2025

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