वो लगातार अपने आप को जूते मारे जा रहा था। कभी अपने मुंह पर मारता, कभी अपनी पीठ पर घुमा कर मारता। मारे ही जा रहा था। कभी पेट पर मारता। कभी पैरों पर दनादन जूते मारता। वो बड़बड़ा रहा था। ले और जूते खा। और खा। अब चैन पड़ा ? और खायेगा ?
उसकी बेचैनी देखकर डोरीलाल हतप्रभ रह गया। जूते खाने की ऐसी बेताबी देखकर डोरीलाल का मन विचलित हो गया। अरे भाई वाह। क्या बात है। मैंने उससे पूछा कि भई ये बताओ कि क्यों मार रहे हो अपने आपको जूते। उसने कहा तीन दिन हो गए मुझे जूते नहीं पड़े। हर रोज जूते खाते खाते ऐसी आदत पड़ गई है कि दो तीन दिन जूते न पड़ें तो एक भूख सी लग जाती है, एक प्यास सी लग जाती है लगता है कि कोई इस पीड़ा से मुक्ति दिला दे। 25-50 नहीं तो 2-4 ही मार दे मगर मार दे। ये भूख अब सही नहीं जाती। दिल बेताब हुआ पड़ा है। कोई तो मुझे जूते मारो।
मैंने उससे कहा कि तुम्हारी बात मुझे जंच नहीं रही है। ये बताओ कि कोई तुम्हें जूते क्यों मारेगा ? आखिर तुम भारतीय नागरिक हो। हमारा इतिहास धरती में होमो सेपियंस के आने से भी पुराना है। हम धरती पर विकसित नहीं हुए हैं हमने धरती पर सीधे अवतार लिया है। पूर्ण विकसित रूप में। हम डार्विन को नहीं मानते। हमें जूते कोई क्यों मारेगा ? बल्कि हम मारेंगे जूते। हमारी परंपरा बहुत पुरानी है। ये ऋषियों मुनियों की पावन भूमि है। हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती हैं। हमारे देश में हर नदी पवित्र है। हर पहाड़ पवित्र है। हमारे यहां पवित्र से नीचे कुछ है ही नहीं। हमारे देश की परंपराएं महान हैं। हम स्वयं बहुत महान हैं। भारत वर्ष हमारी मातृभूमि है।
मातृभूमि ? यह सुनते ही वह फिर अपने आपको जूते मारने लगा। मातृभूमि का नाम नहीं लेना। पूरी दुनिया हम पर हंस रही है। पूरी दुनिया में हमें जूते पड़ रहे हैं। लोग न जाने भारत के बारे में क्या क्या कह रहे हैं ? डोरीलाल ने उसे बहुत मुश्किल से शांत कराया। उससे पूछा कि भाई बात क्या हो गई ? उसने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री इजरायल, ईरान, अमेरिका के युद्ध के पहले इजरायल गये थे। वहां की संसद में उनको एक मैडल देकर सम्मान किया गया। वो खास तौर पर उन्हीं के लिए बनवाया गया था। इजरायली संसद में हमारे प्रधानमंत्री ने भाषण दिया। खूब तालियां बजीं। खूब मेज थप थपायी गयीं। महामहिम जोश में आ गये। बोले इजरायल और भारत की दोस्ती अजर अमर है। हमें कोई अलग नहीं कर सकता। इंडिया इज अवर मदर लैंड एंड इजरायल इज अवर फादरलैंड। अब इजरायल हमारी पितृभूमि हो गई। ये आदमी हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। अब मैं अपने आपको जूते न मारूं तो क्या करूं ?
डोरीलाल ने उसे समझाया। देखो एहसान चुकाने के जोश में ऐसा हो जाता है। फिर तुम्हें सोचना चाहिए कि अभी तो साहब की सत्ता को बारह साल ही गुजरे हैं। अभी तो 2047 तक पच्चीस साल कैसे गुजरेंगे पता ही नहीं है। कुछ भी हो सकता है। हम लोग अभी अविकसित हैं। अभी तो पितृभूमि का पता चला है। अभी तो न जाने तुम्हारे कितने भाई बहन निकल आएंगे। वसुधैव कुटुम्बकम क्यों कहा जाता है ? पूरी पृथ्वी हमारा कुटुम्ब है। अब एक बार फादरलैंड का पता चल गया है तो अब भाई बहन, मामा, चाचा सब मिल जाएंगे।
इस बार वो गंभीर हो गया। वो बोला डोरीलाल न ये बात मजाक की है और न ये देश मजाक की चीज है। मगर भारतवासी पूरी दुनिया में मजाक की चीज बना दिए गए हैं। हमारी दौ कौड़ी की औकात कर दी है। देश में इतना हिन्दू मुस्लिम कर दिया गया है कि पचासों साल लग जाएंगे इस नफरत को मिटाने में। आज हमारे देश में हर त्यौहार हंसी खुशी की जगह एक खौफ़ और शक लेकर आता है। सचाई ये है कि एक करोड़ भारतीय मुस्लिम देशों में नौकरी कर रहे हैं। वहां वो अमन चैन से हैं। जब देश में हिन्दु मुस्लिम हिन्दु ईसाई होता है, जब देश में नफरत फैलाकर वोट की फसल काटी जाती है तो पूरी दुनिया में फैले भारतीय लोग मुसीबत में पड़ते हैं। उनको शक से देखा जाता है। उन पर हमले होते हैं।
ईरान इजरायल लड़ाई से पूरी दुनिया में नए संबंध बन रहे हैं। पुराने बदल रहे हैं। मगर हमारी कोई पूछ नहीं है। क्योंकि लड़ाई के पहले ही हम खुलकर इजरायल के साथ खड़े हैं। मेडल ले लिया। फादरलैंड बना लिया। हम हत्यारों के साथ खड़े हैं। पूरी दुनिया के लोगों की सहानुभूति ईरान के साथ है। भारतवासी ईरान के साथ हैं लेकिन माई फ्रेंड डोलांड ट्रम्प के चक्कर में हमारी हालत अमेरिका इजरायल के दरबान की हो गई है।
आजादी के बाद कितनी सरकारें आई गईं, मगर भारत की नीति आत्मसम्मान और गलत को गलत कहने की रही है। कभी समझौता नहीं किया। भारत विकासशील देश है। मगर उसने कभी विकसित देशों के सामने घुटने नहीं टेके और आज हालत ये है कि अमेरिका हमें एक महीने के लिए रूस से तेल खरीदने की ’परमीशन’ दे रहा है। यूरोप के सारे देश अमेरिका से अलग खड़े हो गए मगर हम तो ट्रेड डील करके बैठे हैं।
अचानक वो रूका और उसने कहा डोरीलाल अब मुझे तुम जूते मारने से मत रोकना। मैं अपने आपको ही तो जूते मार रहा हूं। मगर तुम बताओ कि इस देश के चुनाव आयोग के लिए मैं अपने आपको जूते मारूं या न मारूं। इस देश में न्याय व्यवस्था के लिए अपने आपको जूते मारूं या न मारूं। किसान बिल, लेबर कोड, नोटबंदी, पी एम केयर फंड वाली सरकार के लिए, अपने देश के मजदूरों किसानों के लिए अपने आपको जूते मारूं या न मारूं। बढ़ती मंहगाई, भयानक बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के बावजूद चुप जनता के लिए अपने आपको जूते मारूं या न मारूं ?
मैंने कहा कि अभी जनता अयोध्या, वैष्णोदेवी, महाकाल, चारों धाम, बदरीनाथ केदारनाथ, सबरीमला, कामाख्या, के लिए चलाई गई स्पेशल ट्रेनों में घूम रही है। उसे मत छेड़ो। वो बहुत खुश है। वो अभी भी नशे में है।
मैं जानता था कि वो अपने को जूते मारता थक जाएगा। मगर कुछ नहीं बदलेगा। अब हमें जूते खाने की आदत हो गई है। अब हमें उसमें मजा आता है। गर्व होता है।
डोरीलाल जूता प्रेमी
14 04 2026

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