गमले वाली ने गमले देने के बाद कहा कि भैया, जरा हाथ लगा देना टोकनी को। मैंने तुरंत हाथ लगाया गमले की टोकनी उठवाने के लिए मगर ये क्या ? टोकनी इतनी भारी थी कि मुझसे सहारा देते तक न बना। किसी तरह पूरा दम लगाकर टोकनी उसके सिर पर रखवाई। मैंने कहा इतने गमले लेकर क्यों चलती हो ? उसने कहा क्या करूं पेट पालना है। शहर के पश्चिमी हिस्से में गमले और घड़े टोकनी सिर पर लादे बेचने के लिए ये महिलाएं मेडिकल कॉलेज और गढ़ा पुरवा से शहर की ओर पांच से आठ किमी तक चलती हैं गलियों कूचों में ले गमले, ले घडे़, चिल्लाते हुए। आजकल सीमेंट के परमानेंट गमले प्रचलन में हैं तो गमले कम बिकते हैं। मिट्टी के गमले जल्दी फूट जाते हैं। मिट्टी के घड़ों का इस्तेमाल भी कम से कम हो रहा है। घड़े के पानी की ठंडक नई पीढ़ी के लिए बेगानी और बेमानी है।
ये महिलाएं पहले तो अपने घरों में इन घड़ों - गमलों को बनाती हैं फिर इतना वजन सिर पर लादे मीलों तक गली गली घूमती हैं। जब हमारे घरों के सामने चिल्लाती हैं तो हम कह देते हैं नहीं चैये। वो एक बार मनुहार भी करती हैं ले लो न बाई। अरे नहीं चैये। पिछले साल का घड़ा रखा है। गमले रखे हैं। अभी जरूरत नहीं है।
डोरीलाल को चिन्ता है कि ये गमलों और घड़ों से भरा टोकरा इन महिलाओं के सिर पर ही क्यों रखा है ? ये इतना वजनी है कि हमारी इन वजन को उठाने में सहारा देने में भी जान निकलती है। और ये मीलों तक चलती हैं। घर के पुरूष क्यां नहीं बेचने निकलते ? उनमें तो ज्यादा ताकत होती है। उनका शरीर भी मजबूत होता है। वो तो ज्यादा वजन ढो सकते हैं। मगर नहीं निकलते।
राजस्थान के दृश्य फोटोग्राफी के लिए बहुत अच्छे होते हैं। चार चार पांच पांच मटके सिर पर रखे महिलाएं एक कतार में मीलों चली जा रही हैं। रंग बिरंगी साड़ी पहने। अहा कितना सुंदर फोटो है। रेत के टीलों के बीच हरे नीले लाल रंग। मगर पुरूष नहीं है। क्यों क्या पुरूष ये दृश्य नहीं बना सकते ? क्या वो पानी नहीं पीते ? सदियों की परंपरा है। सदियों से राजस्थान में पानी नहीं है। सदियों से महिलाएं गहरे कुओं से पानी खींच कर लंबी दूरी चलकर पानी ला रही हैं और ध्यान दें ये काम महिलाएं ही कर रही हैं।
और फिर उसके बाद बारी आती है धार्मिक और सामाजिक जुलूसों की। आज ये पूजा है कल वो प्रवचन है। मगर पहले जुलूस निकलेगा। सामने बैंड बज रहे हैं। शोर हो रहा है। उसके पीछे पीली लाल साड़ी पहने घूंघट निकाले छोटे छोटे कलश सिर पर रखे चली जा रही हैं। जुलूस की शोभा और सफलता इसी से आंकी जाती है कि इसमें कितनी नारियां कलश लेकर निकलीं। फोटो भी इसी का आता है। मगर ये केवल गिनती और समाचार के काम आती हैं। इनका कोई नाम नहीं आता। कलश यात्रा के पीछे, महाराज जी के सामने गणमान्य धर्मप्रेमी आयोजक और नेता चलते हैं। लाल भगवा उत्तरीय धारण किए हुए। कुर्ता पाजामा कुर्ता धोती पहने। मगर इनके सिर पर पगड़ी होती है। कलश नहीं होता। क्यों ? पुरूषों की कलश यात्रा क्यों न निकले ? पुरूष कोई कम धार्मिक हैं ? कोई कम श्रद्धालु हैं ?
ये तीजा, ये करवा चौथ, ये संतान सातें ये सब महिलाओं के लिए ही क्यों ?
ये इसलिए कि सदियों से महिलाओं को यही मालूम है। उन्हें ही गमले घड़े लेकर गली गली बेचना है। उन्हें कलश लेकर धार्मिक व सामाजिक जुलूसों में सामने चलना है। उन्हें कुओं से पानी भर कर लाना है। उन्हें खाना बनाना है। उन्हें बाल बच्चे पालना है। घर सम्हालना है। वे खाने कपड़े के लिए पुरूष पर निर्भर हैं। पुरूषों और महिलाओं दोनों की कंडीशनिंग हो चुकी है। दोनों को मालूम है कि ऐसे ही जीना है। यही जीवन है। ये जीवन जैसा जी रही हो वैसा ही जियो इसके लिए बीच बीच में प्रवचन सुनो। महान त्यागी नारियों और देवियों की कथाएं सुनो और अपना जीवन धन्य करो। आरती करो। महा आरती करो। और परम सत्य को जान लो कि जितना मिल रहा है बहुत है। संतोषी परम सुखी। घर में चाहे जैसी रहो मगर टेम्पो पकड़कर कभी ग्वारीघाट, कभी मेडिकल कभी पनागर जाते रहो।
डोरीलाल की चिन्ता ये है कब तक मूढ़ में कलश धरा रहेगा। जब तक ये कलश सिर पर धरा है और खुशी खुशी धरा है तबतक डोरीलाल की पुरूष सत्ता को कोई खतरा नहीं है।
डोरीलाल ’कलश प्रेमी’
03 04 2023
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