वो शान से सीना ताने खड़ा था। उसके लबे लंबे हाथ लटक रहे थे। सामने आंख में पट्टी बांधे हाथ में तराजू लिए वो खड़ी थी। वो उसे लगातार घूरे जा रहा था। देवी की आंखों में पट्टी बंधी थी इसीलिए उसे कोई घूर रहा है यह पता नहीं चल रहा था । फिर उसे किसी के घूरने की परवाह भी नहीं थी। उसके लिए समय का भी कोई मायने नहीं था। उसे कोई फर्क नही पड़ता था। सदियां गुजर गईं, उसकी पट्टी जस की तस बंधी थी। ये पट्टी अंग्रेज बांध गये थे। उन्होंने तब की प्रजा को तब ही बता दिया था कि न्याय अंधा होता है और कानून के हाथ लंबे होते हैं। कानून कभी भी किसी को भी पकड़ सकता है और कहीं भी पकड़ सकता है। न्याय अंधा होने के कारण इस पकड़े जाने को देख नहीं पाता है।
लंबे हाथ वाले ने आंख में पट्टी बांधे वाली देवी से पूछा कि आप ये नाटक क्यों कर रही हैं ? जब आपकी आंखे अच्छी भली हैं तो आप आंखों में पट्टी बांधे अंधा होने का नाटक क्यों कर रही हैं ? मैं इन लंबे लंबे हाथों से मनुष्य योनि में जन्म लिए लोगों को - अपराधियों, निरपराधियों को पकड़ पकड़ के आपके सामने लाता हूं किस लिए ? इसलिए कि मेरे को पावर नहीं है इन्हें सजा देने का। इसलिए आपके पास लाता हूं और अपराधी और निरपराधी का फैसला बिना देखे कर देती हैं। एक तो आप टाइम बहुत लेती हैं। दिन महीने साल गुजर जाते हैं, आपको अपराधी को सजा देने की कोई जल्दी ही नहीं। अब यदि ऐसा ही चला न तो हम आपके पास आएंगे ही नहीं खुद ही सजा दिया करेंगे। बुलडोजर चढ़ा देंगे। मजाक बना कर रख दिया है। और उस पर से आपको कुछ कह भी नहीं सकते। आप ऐसी छुई मुई हैं कि जरा सा कुछ कहा नहीं कि आपका अपमान हो जाता है। आंखों से दिखता नहीं पर अपमान बड़ी जल्दी समझ आ जाता है , हैं ?
देवी को इस कानून के बच्चे की बकर बकर से परेशानी होने लगी थी। उनका बस चलता तो तराजू एक तरफ रख कर आंखे खोलकर इसे सीधे अंदर करवा देतीं। मगर फिर उन्होंने गुस्से को काबू किया और बोली - सुनो मिस्टर बहुत देर से सुन रही हूं। पहली बात तो ये है आंखां में पट्टी बहुत सोच समझ कर लगाई गई है। यदि हम कानून और अपराधी को देख लें अपनी आंखों से तो कभी न्याय न कर पायें। कैसे कैसे लोगों को तुम लोग पकड़ लाते हो सजा दिलवाने के लिए ? कैसे आते होंगे ये लोग अदालतों में ? कैसे करते होंगे ये वकील और उसकी फीस का इंतजाम ? हजारों तो तुम्हारे पकड़े हुए निर्दोष जेलों में इसलिए बंद हैं क्योंकि उनके पास न जमानत की रकम है न जमानतदार। कितनों की सजा पूरी हो गई मगर छूटे ही नहीं। कितनों को मालूम ही नहीं कि उनका अपराध क्या है ? मगर बंद हैं, मुकदमा चल रहा है। बीस पच्चीस साल जेल काटने के बाद जब हमारे सामने मुकदमा हमारे सामने आता है तब हमें पता चलता है कि आदमी निर्दोष है। कानून का काम होना चाहिए आदमी को अपराधी न बनने देना मगर तुम्हारा सिस्टम ऐसा है कि कानून का काम शुरू ही होता है तब जब आदमी पक्का अपराधी बन जाए।
और फैसलों में देरी से कितना फायदा होता है। अपराधी या तो पक्का अपराधी बन जाता है या अपराध से तौबा कर लेता है। अपराधी फैसला होने के पहले ही अपने किए की पूरी सजा भुगत लेता है। जब तक मुकदमा चलता है तब तक अपराधी ने पार्टी बदल ली तो वो हमारे फैसले के बिना ही निर्दोष हो जाता है। आजकल अदालतों का रोल काफी घट रहा है। अब न्याय की देवी के अलावा सबको कानून मालूम है। अब तो अपराधी भी न्याय की देवी के न्याय को सीधे चेतावनी दे रहे हैं और न्याय की समीक्षा कर रहे हैं।
राजस्थान की एक अदालत ने एक 80 वर्षीय व्यक्ति को एक साल की सजा दी है। उस पर आरोप है कि सन् 1982 में आज से 40 साल पहले उसने 100 रूपये की रिश्वत ली थी। मुम्बई में एक मानव अधिकार कार्यकर्ता जेल में रखे गये हैं। उन पर अन्य आरोपों के अलावा ये संगीन आरोप है कि उनके घर से लियो टाल्सटॉय की किताब ’वार एंड पीस’ (’युद्ध और शांति’) जब्त की गई है। फादर स्टेन स्वामी की उम्र 84 वर्ष थी। उन्हें पार्किन्सन डिसीज़ थी। उन्हें पानी आदि पीने के लिए स्ट्रा चाहिए था। नहीं दिया गया। उसके लिए हाईकोर्ट में कई पेशियां हुईं। कानून अड़ा रहा कि स्ट्रा न दिया जाए। बाद में शायद दिया गया। मगर जमानत नहीं दी गई। वो मर गये। वो आदिवासियों के कानूनी अधिकारों के लिए लड़ते थे।
तो डोरीलाल चिन्तित हैं तो रहे आएं। कानून के हाथ लंबे हैं तो लंबे हैं। और न्याय की देवी की आंख में पट्टी बंधी है तो बंधी है।
डोरीलाल न्याय प्रेमी
27 03 2023
No comments:
Post a Comment