हम पति पत्नी सड़क किनारे खड़़े किसी ऑटो वाले का रास्ता देख रहे थे। एक दो आकर जाने से इंकार कर चुके थे। सड़क में रोशनी कम थी और सड़क सुनसान थी। लग रहा था कि कितने जल्दी यहां से निकल जाएं। तभी वो आया। उसने ऑटो रोक दिया। हमने उसे बताया कि स्टेशन के पास फलां होटल जाना है। उसने कहा छोड़ देंगे।
’’कितने पैसे’’
’’पचासई दे देना, चलो’’
हम लोग बैठ गये। तीन दिनों से इस शहर में हैं। इस जगह का कभी सौ कभी सत्तर दे रहे थे। हमने सोचा ये सही रहा। सस्ता मिल गया। ऑटो चला जा रहा था। वो नौजवान था। साधारण हाफ शर्ट के उपर एक बंडी सी पहने था। उसके अंदर न जाने क्या उमड़ घुमड़ रहा हो, अचानक वह पल्टा। बोला - अंकल जी ये सब क्या चल रहा है देश में हिन्दु मुसलमान। कैसा मच गया है ? अब मेरे दिमाग की घंटी बजी। हम मियां बीवी ने अंजान बनते हुए कहा ’’क्या हुआ ?’’ उसने कहा ’’ आज का पेपर नहीं पढ़े आप ? इलाहाबाद में कैसे गोलियां चल गईं ?
’’अरे हां मालूम है वो अतीक अहमद को मार डाला है न’’ मैंने कहा
’सब राजनीति के खेल हैं, वोट के लिए ये लोग कुछ भी कर सकते हैं।’’ मैंने ऐसा कह कर बात समेटी। और चुप हो गया। वो भी चुप हो गया।
अब मेरे अंदर मंथन शुरू हो गया। ये बच्चा जो ऑटो चलाता है शायद अपना घर भी यही चलाता होगा। रात को टी वी में खबर देखकर या वाट्सअप या पेपर पर देखकर ये घर से न निकला होगा। घर में भाई बहन मां बाप ने बात की होगी। कल कुछ भी हो सकता है। सब घरों में दुबके होंगे। दिन में अम्मी ने पड़ोस में धीरे धीरे बात की होगी। जब दिन ढलने लगा होगा तो लगा होगा कि शायद आज का दिन तो निकल गया। तब इस बच्चे ने कहा होगा कि ऑटो का किराया तो लगेगा ही, अम्मी मैं दो चार घंटे ऑटो चला कर आता हूं। अम्मी कुछ नहीं होगा। तुम चिंता मत करो। ये डरते डरते निकला होगा। अम्मी ने दरवाजे के पास खड़े होकर बच्चे को देखा होगा। मन ही मन दुआ कर रही होगी। मेरा बच्चा अच्छा भला लौट आए।
वो घर से चौकन्ना निकला होगा। चारों तरफ देखते हुए। तभी हम लोग दिख गये। इसलिए उसने हमसे कहा पचासई दे देना। मतलब ऐसी रकम कि सवारी बिदक न जाए। होटल आया तो होटल पर छोड़ा। हमने उसे पैसे दिए। वो बमुश्किल बाइस साल का होगा। मैंने उससे कहा ’बेटा, घबराओ मत, दुनिया में अच्छे लोग बहुत ज्यादा हैं। ये बुरा समय है। हिम्मत से काम लो। सम्हल कर काट लो। बहुत जल्द समय बदलेगा। सब ठीक हो जाएगा।’’
डोरीलाल चिन्तित है हर धर्म हर जाति के उस बच्चे बच्ची नौजवान अधेड़ बुजुर्ग महिला पुरूष के लिए जो घर से अपनी पढ़ाई, कोचिंग रोजगार या व्यापार के लिए निकलता है और घर में बैठी मां, अम्मा, अम्मी, मम्मी दिन रात धड़कते दिल से उनकी बाट जोहतीं दरवाजे पर खड़ी रहती है। ये कैसा डरा हुआ भारत है।
राजनीतिज्ञ जानते हैं कि किसी एक शहर में एक घटना पूरी दुनिया और पूरे देश पर कैसा असर डालती है। हम लोग अपनी अपनी कालोनियां, मोहल्लों और घरों में, फ्लैटों, में सुरक्षित बैठे हैं। लेकिन जो लोग मेहनत मजदूरी से रोज कमाते खाते हैं वो लोग इतने सुरक्षित नहीं हैं। अपनी कारों में सुरक्षित एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले कुछ हजार हैं। बाकी अपना अपना काम धंधा करने वाले मेहनत मजदूरी करने वाले लाखों करोड़ों हैं। इन्हें घर से बाहर निकलना ही है। इन्हें जोखिम उठाना ही है। ये गरीब लोग ही दंगों फसादों में मारे जाते हैं।
देश और दुनिया को ’’हम लोग’’ ओर ’’वो लोग’’ में बांट दिया गया है। घर और मोहल्ले बंट गये हैं। धर्म बंट गये हैं। जातियां बंट गईं हैं। शहरी और ग्रामीण बंट गये हैं। आदिवासी और गैर आदिवासी बंट गये हैं। कहीं हम लोग रहते हैं कहीं वो लोग रहते हैं। कहीं वो लोग इबादत या प्रेयर करते हैं कहीं हम लोग पूजा करते हैं। मगर सब लोग एक सा गेहूं चावल सब्जी मुर्गा मटन खाते हैं। एक सा पानी पीते हैं। हम लोग भी और वो लोग भी। एक सी मिलावट और धूल धुआं खाते हैं। एक दाम का पेट्रोल खरीदते हैं और एक सी दवाईयां खाते हैं और एक सी बीमारियां से मरते या बचते हैं। हमारी नफरत का हर कुछ दिनों में नवीनीकरण होता रहता है। ज्योंहि हम कुछ भूलने लगते हैं और मिलजुल कर रहना शुरू करते हैं जिंदगी के बुनियादी सवालों को उठाना शुरू करते हैं कि फिर कोई नया फसाद सामने आ जाता है। फिर इस घृणा का रूपांतरण चुनावों में होता है। इकतरफा वोट पड़ते हैं।
छेड़िये इक जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ
दोस्त मेरे मजहबी नगमात को मत छेड़िये - अदम गांडवी
डोरीलाल शांतिप्रेमी
20 04 2023
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