डोरीलाल की मुलाकात एक प्रतिभाशाली छात्र से हुई। वो विदेश में जाकर विद्या ग्रहण करना चाहता था। डोरीलाल इस तरह के ब्रेनड्रेन के सख्त खिलाफ हैं। डोरीलाल ने उसे बहुत समझाया।
डोरीलाल - भारत विद्वानों का देश है। हमारे देश में ज्ञान की लंबी परंपरा है। फिर तुम विद्याध्ययन के लिए विदेश क्यां जाना चाहते हो ?
छात्र - आपको मालूम नहीं है हर साल भारत वर्ष से लाखों छात्र विदेशों में पढ़ने जा रहे हैं। हम इस परंपरा से ही तो परेशान हैं। परंपरा का हम क्या अचार डालें। हम तो वर्तमान में पढ़ रहे हैं। मैं तो अमेरिका जाऊंगा। वहां परंपरा तो नहीं है पर ज्ञान है।
डोरीलाल - देखो, हमारे शास्त्रां में सब कुछ लिखा है। हमारी ज्ञान परंपरा बहुत महान है। तुम उस ज्ञान से हवाई जहाज भी बना सकते हो। मेक इन इंडिया तो तुम जानते ही हो।
छात्र - पर डोरीलाल जी, हमारे विश्वविद्यालय में, हमारे कालेजों में न प्रोफेसर हैं न लेक्चरर, हमारे यहां अतिथि शिक्षक हैं। वे भी बैठे से बेगार भली के फार्मूले पर पढ़ा रहे हैं। आप तो ये बताओ कि लाखों की तनखाह वाले प्रोफेसर की जगह 5-10 हजार रूपये में कोई क्यों पढ़ायेगा और क्या पढ़ायेगा ?
डोरीलाल-देखो हर वर्ष केन्द्र और राज्य सरकारें हजारों करोड़ रूपये शिक्षा पर खर्च कर रही है। इससे नए नए भवन बन रहे हैं। उपकरण खरीदे जा रहे हैं। हर कालेज यूनीवर्सिटी में बड़े बड़े स्वागत द्वार बनाए जा रहे हैं। हर कालेज में विशालकाय मूर्तियां लगाई जा रही हैं। स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष हर कालेज यूनिवर्सिटी में सेमिनार आयोजित होते हैं जिसमें देश भर की विद्वान आकर पेपर पढ़ते हैं और एकदूसरे की तारीफ करते हैं। अब कालेज यूनीवर्सिटी में सत्यनारायण की कथा, यज्ञ वगैरह के आयोजन हो रहे हैं। पंडे पुजारी विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में मंचासीन होते हैं। सेमीनार के शुरूआत और अंत में कलश यात्रा निकाली जाती है। इससे शिक्षा का वातावरण निर्माण होता है। सब शिक्षा को उन्नत बनाने के लिए किया जा रहा है। जब उचित समय आएगा तब शिक्षक भी भरती किए जाएंगे। अभी से वेतन पर व्यर्थ खर्च करना उचित नहीं है।
छात्र-आप हमारा मुंह न खुलवाओ। पढ़ाने के लिए शिक्षक चाहिए कि भवन ? आपने इस बार का केन्द्र सरकार का यशस्वी बजट नहीं बांचा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रिसर्च सबका बजट हजारों करोड़ रूपये कम कर दिया गया है। यूजीसी का बजट 4600 करोड़ था अब 2300 करोड़ हो गया है। यूनिवर्सिटी को कहा गया है कि अपने खर्चों के लिए पैसों का जुगाड़ खुद करो।
डोरीलाल-तुम फिर उत्तेजित हो गए। देखो विश्वगुरू बनने की दिशा में हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। देखो अभी तक विश्वविद्यालय में वाइस चांसलर हुआ करता था। ये अंग्रेजों की परंपरा थी। ये हमने बंद कर दिया है। अब वो कुलगुरू कहलाते हैं। जब कुलगुरू होगा तो भारत को विश्वगुरू बनने से कोई रोक सकता है ?
छात्र- कहीं कुलगुरू पर महिला से छेड़छाड़ की जांच चल रही है कहीं कुलगुरू टर्मिनेट किए जा रहे हैं। क्या बात करते हो डोरीलाल जी। आप लोगों के जमाने में वाइस चांसलर की पोस्ट का कितना सम्मान होता था। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से शहर गौरवान्वित होता था। छात्र अपने प्रोफेसर का नाम गर्व से लेते थे और कहते थे कि हम उनके छात्र रहे हैं। शहर में सभा समारोहों में उन्हें अतिथि बनाते थे। उनके व्याख्यान होते थे।
डोरीलाल-देखो प्रोफेसर और छात्रा के संबंधों के किस्से शिक्षा जगत को बदनाम करने के लिए फैलाए जाते हैं। ये सहज मानवीय वृत्ति है। शोध कार्य के दौरान ऐसा हो जाता है। शोध भटक जाती है। जैसे तुम मुद्दे से भटक रहे हो।
छात्र-चलिए मुद्दे पर आते हैं। अंधाधुंध फीस वसूली की जाती है। पढ़ाई होती नहीं। परीक्षा होती नहीं। परीक्षा होती है तो रिजल्ट नहीं आता। भारत में नौजवान केवल कांवड़ यात्रा के लायक बचे हैं। तो वही करते हैं। इंजीनियरिंग कालेजों में इंजीनियरों का अतिउत्पादन हो गया। मेडिकल कालेजों की फीस करोड़ों में पंहुच गई है। केवल अमीर लोग अच्छी शिक्षा पायेंगे। अब हर सक्षम आदमी अपने बच्चों को विदेश में पढ़ने भेज रहा है। गरीब और गरीब के बच्चे काम करने के लिए बने हैं तो करेंगे। उनकी किस्मत।
विदेशों में न जाने कितनी यूनीवर्सिटी हैं। वास्तव में वो भी दुकानें हैं। वो भारत जैसे देशों से छात्रों को भरती करती हैं। स्कॉलरशिप भी देती हैं। ये शिक्षा का बिजनेस मॉडल है। बहुतों को तो वहीं नौकरी मिल जाती है। बाकी भारत में गरीबों के लिए ज्ञान परंपरा, नई शिक्षा नीति, कुंभ, बाबर, टीपू सुल्तान, औरंगजेब, लव जिहाद, अयोध्या, मथुरा, काशी, हिन्दु मुसलमान जैसे मुद्दे हैं ही जिनके भरोसे भूखे पेट रहकर भी जीवन जिया जा सकता है।
डोरीलाल - तुम बहुत कड़वा बोलते हो। यदि तुम इसी तरह बोलते रहे तो तुम अंदर हो जाओगे। आलरेडी बहुतेरे अंदर हैं। जमानत तक नहीं मिलती। तुम्हें निकलवाने के लिए कोई वकील खड़ा नहीं होगा क्योंकि इस देश का सबसे मंहगा वकील अभी अदालत में एक छात्र की डिग्री न दिखाने के दिल्ली विश्वविद्यालय के निर्णय के बचाव में तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। दुनिया भर में संस्थान गर्व से बताते हैं कि अमुक हमारे विश्वविद्यालय का छात्र था। ये रही उसकी डिग्री। मगर विश्वगुरू के यहां उल्टी गंगा बह रही है। छात्र भी छुपा रहा है और विश्वविद्यालय भी छुपा रहा है। हम डिग्री नहीं दिखाएंगे। भैया तुम तो जाओ विदेश में ही पढ़ो। जब डिग्री मिल जाए तो शान से सबको दिखाना। छुपाना नहीं।
डोरीलाल डिग्रीप्रेमी
10 03 2025
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