भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल सभी बैठे थे। आसमान से नीचे की ओर देख रहे थे। 23 मार्च का दिन था। सामने सारे अखबार पड़े हुए थे। टी वी चालू था। उसमें से जोर जोर से आवाजें आ रहीं थीं। सभी क्रांतिकारी बार बार अखबार पलट रहे थे। कहीं किसी ने याद किया हो। किसी अखबार में तो हो, चैनलों में भी कहीं नहीं था। डोरीलाल ने उनसे पूछा कि आप लोग कुछ परेशान से दिख रहे हैं, बात क्या है ? भगतसिंह बोले हम लोग याद कर रहे हैं कि हमारी शहादत के समय तो ये कहा जाता था
’शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’
आज तो लगता है कि कोई याद नहीं करता।
डोरीलाल ने उन्हें बताया कि आप जिस धरती नाम के उपग्रह की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे हैं वहां अब कोई उम्मीद नहीं करना चाहिए। आप लोगों के समय जिन देशों में थोड़ा बहुत लोकतंत्र था वो दूसरे देशों पर राज कर रहे थे। जैसे तैसे देश आजाद हुए तो लोकतंत्र का पौधा लहलहाया और अब आज हर देश में सत्तर पचहत्तर साल होते होते लोकतंत्र दम तोड़ रहा है। धरती पर लोकतंत्र आखिरी सांसें गिन रहा है। हर देश का नेता अमृत पी चुका है। रूस के पुतिन ने सन् 1936 तक के लिए अपने राजा होने का ऐलान कर दिया है। आपके देश भारतवर्ष में 1947 तक की व्यवस्था हो चुकी है। अमेरिका में जो राजा बना है उसका पता ही नहीं चल रहा कि वो कब समझेगा कि वो प्रेसीडेंट है गली का गुंडा नहीं। यूरोप में सरकारें ही बदल रही हैं वो तय ही नहीं कर पा रहीं कि जाना किधर है।
भाई डोरीलाल जी आप तो बड़ी इंटरनेशनल बातें कर रहे हो। सीधे मुद्दे पर आओ न। अपने भारत की बात करो।
आप लोग इतने प्रखर दिमाग के हो इसलिए क्रांतिकारी बने और फिर शहीद हुए। डोरीलाल की चोरी आपने पकड़ ली। बात ये है कि जब आपको डर लगे तो आप इंटरनेशनल बातें करो। नहीं तो कबीर तुलसी की बातें करो। भक्तिकाल में चले जाओ। पर मुद्दे की बात न करो। आप लोग अंग्रेजों से लड़ते थे। वो सीधे फांसी पर चढ़ा देते थे या गोली मार देते थे। तब भी आप विरोध करते थे। अब आज नया जमाना है। अब कोई झंझट में नहीं पड़ता। हर कोई चुप है। आप के समय में छोटे छोटे अखबार निकलते थे। उन्हें बंद करवा दिया जाता था। फिर नए अखबार निकलते थे मगर लड़ते रहते थे। जेल जाते थे। कालापानी भोगते थे। फांसी चढ़ जाते थे। मगर आज हालात बदल गये हैं। आज अखबार समाचारों के लिए नहीं निकाले जाते। अब देश आजाद है तो सब गुलाम हो गए हैं। आज 23 मार्च को किसी अखबार में तुम्हें शिद्दत से याद नहीं किया जाएगा। कुछ दीवाने लोग अभी भी हैं जो तुम्हारी मूर्ति पर फूल चढ़ायेंगे, जुलूस निकालेंगे, सभा करेंगे। बाकी अब देश में इवेन्ट मैनेजरों का राज है। कोई आश्चर्य नहीं की तुम्हारी शहादत के दिन महाआरती होने लगे। और उसमें लाखों लोग शामिल होकर भजन गायें।
’’पर भाई अब तो देश आजाद है। हम लोगों ने, गांधी, नेहरू, पटैल, मौलाना आजाद सबने मिलकर ये आजादी हासिल की है। इसे बचा कर रखना चाहिए। इतना बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन हुआ था तब देश आजाद हुआ है।’’
दिक्कत ये है जो लोग इतने बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं थे, जो आजादी के विरोधी थे, जो अंग्रेजों के साथ थे वो अब आजादी के 75 साल में बहुत ताकतवर हो गए हैं। आजादी के आंदोलन के नायक नेहरू को रोज बेइज्जत किया जाता है। गांधी पर रोज हमले हो रहे हैं। आजादी की लड़ाई को सब भूल जाएं इसलिए आज आजाद भारत में औरंगजेब पर बात होती है। ये देश आज औरंगजेब की कब्र पर लड़ रहा है। जो सत्ता में हैं, जिनके ऊपर हर नागरिक और हर संपत्ति की रक्षा करने की जिम्मेदारी है वो युद्ध की भाषा बोल रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में गली चौराहों के जैसी लड़ाई चल रही है।
हम लगातार पीछे की ओर बढे़ जा रहे हैं। सम्राट अशोक, चन्द्रगुप्त, पुष्यमित्र शुंग, हर्ष के राज का आंखों देखा हाल बताने वाले इतिहासकार गली गली घूम रहे हैं। कहीं देश के लोगों को अपना खाली पेट और खाली हाथ याद न आ जाएं इसलिए उन्हें दिन रात धर्म के नशे में रखा जा रहा है। हम आजादी और आजादी की लड़ाई को भूल जाएं, गांधी नेहरू को भूल जाएं इसके लिए संसद में प्रधान सेवक 1857 की क्रांति और दांडी मार्च की बराबरी महाकुंभ से करते हैं और ये देश सुनता है। कोई कुछ नहीं बोलता क्योंकि सब चाहते हैं भगतसिंह पड़ोसी के घर में पैदा हो। 1857 की लड़ाई में हिन्दु मुसलमान एक होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े और मारे गए। लड़ाई के बाद लाखों भारतीय अंग्रेजों ने मार डाले, गांव के गांव खत्म कर दिए गए। 1857 से सीधे डांडी मार्च पर आ गये। नमक सत्याग्रह। गांधी के नेतृत्व में लाखों लोग नमक कानून का विरोध करने के लिए अंग्रेजों की लाठी डंडे खाते रहे। और जनता को शिक्षित किया जा रहा है कि 1857 और डांडी मार्च और महाकुंभ सब एक है। महाकुंभ में डुबकी लगाने वालों ने डुबकी लगाकर आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है। अब देश फिर एक बार आजाद हो गया है और औरंगजेब, अकबर, बाबर को कब्रों से खोदकर बाहर निकाला जाए और पूरे देश को आग और धर्मयुद्ध में झांक दिया जाए। देशवासी हमेशा डर में जियें और आपस में लड़ें। इसी से विकास होगा और खुशहाली आएगी।
आप क्रांतिकारी लोग अपनी कुर्बानी को कम से कम कुछ समय के लिए भूल जाओ। वक्त बदलता है। नया जमाना आएगा। आखिर सन् 1944 में हिटलर को कहां मालूम था कि 1945 में उसे आत्महत्या करना पड़ेगी।
डोरीलाल भगतसिंह प्रेमी
24 03 2025
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