वो तीन थे। उन्हे कतार में खड़ा कर दिया गया था। तीनों के हाथ में झोले थे। टी टी ई ने पहले से शुरू किया। थप्पड़ घूसे दे दनादन। इतना कि उसका झोला गिर पड़ा। उसमें एक अलूमूनियम का डब्बा दौड़ता हुआ खुल गया। वो खाली था। फिर निकल आए कुछ कपड़े। एक नई सस्ती साड़ी। एक धोती नई। कुछ छोटे बच्चों के कपड़े। गालियां बदस्तूर जारी थी। उन्हीं के बीच निकले कुछ वाक्यों से अब उनका अपराध जाहिर हुआ। वो भारतीय रेल के प्रतिनिधि की हैसियत से इन लोगों को बिना टिकिट यात्रा करने के अपराध में सजा दे रहा था। पूरा डब्बा लबालब यात्रियों से भरा था। वो सब टिकिट लिए हुए थे। वो सकपकाये हुए थे। भारतीय रेल कही किसी अपराध में उन्हें भी न सूट दे। ये तीन बिना टिकिट पाये गये चौकिंग में। बीच में जब कुछ देर का गैप आया तो एक ने दूसरे से पूछा - टिकिट काहे नहीं लिये ? उसने कहा - घर जाना था। कपड़े खरीदने मे सारे पैसे खर्च हो गए।
डोरीलाल हरदा से इटारसी लौट रहे थे। यदि आपके पास जनरल टिकिट है और आप स्लीपर क्लास में चढ़ गये तो आप बिना टिकिट माने जाने जाएंगे और आपके साथ वही सलूक किया जाएगा जो बिना टिकिट वाले के साथ किया जाना चाहिए। इसलिए डोरीलाल जनरल डिब्बे में खड़े खड़े तमाशाए अहले करम देख रहे थे।
डोरीलाल को इस बात की प्रसन्नता है कि भारत वर्ष में जनरल हमेशा जनरल होता है। हम नई नई रेल गाडियों की घोषणा सुनते हैं। उनमें नई नई सुविधाओं की बात सुनते हैं। आजकल हम वंदे भारत की घोषणा सुन रहे हैं। कई शहरों को भाग्यशाली बताया जा रहा है क्योंकि उनके शहर से होकर वंदे भारत गुजरेगी। इसकी सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें खाना मिलेगा। भारतवर्ष के वीर सपूत बहुत प्रसन्न हैं। इसके पहले भी राजधानी, शताब्दी और यहां तक कि जनशताब्दी में खाना मिलता रहा है। वन्दे भारत का किराया कितना है। नहीं बताएगे। सुविधा ट्रेनों का किराया कितना है ? आम किराये से तीन चार गुना ज्यादां। नाम है सुविधा।
सब कुछ गरीबों के नाम पर होता है। लालू यादव ने गरीबों के लिए एसी ट्रेन ही चला दी। गरीब रथ। ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं तो उनने चलाई दुरंतो। हर रेलमत्री ने रेलों के नाम अपने स्मारक बनाए हैं।
गरीब लोग गरीबी हटाओ के नाम पर अमीरों को वोट देने के काम आते हैं। इनका इतना ही उपयोग है। ये जनरल लोग हैं। जनरल डिब्बे में टिकिट लेकर घुस सकते है। उसमें जानवरों की तरह ठुंसे रह सकते हैं। जनरल डिब्बे घटते जा रहे हैं और जनरल डिब्बों में चढ़ने वाले बढते जा रहे हैं। वैसे ये लोग अपने गांव में क्यों नहीं रहते ? क्यों मुम्बई दिल्ली हरियाणा पंजाब की सैर करते रहते हैं? ये लोग तीर्थयात्रा पर क्यों नहीं जाते ? उसके लिए तो व्यवस्था है।
अब बस। पर जाते जाते मंहगाई का बचाव करने वालों को यह बता दूं कि सीनियर सिटीजन्स की रेल रियायत में केवल 1600 करोड़ रूपये खर्च होते हैं। वो न देकर आपको वंदे भारत में बैठा रहे हैं। वंदे मातरम।
आपका डोरीलाल ’रेलप्रेमी’
12 02 2023
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